दुर्मदानां परिध्वंसे यत् सुदर्शनचक्रवत्।
लोकसंघटनं लोके नूनमायुघमैश्वरम्।।
भावार्थ :
दुर्मदों का विनाश करने में जो सुदर्शन चक्र की तरह है, समाज का वह ‘संगठन’ निश्चित ही समाज में ईश्वरीय आयुध है।
आज के समय में प्रासंगिकता
यह श्लोक केवल धार्मिक या ऐतिहासिक संदर्भ में ही नहीं, बल्कि आधुनिक नागरिक और सामाजिक जीवन में भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है:
अधर्म और असामाजिक तत्वों पर नियंत्रण: ‘दुर्मद’ का अर्थ उन शक्तिशाली लोगों से है जो अहंकार और अन्याय के मार्ग पर चलते हैं। जब समाज असंगठित होता है, तो अराजक तत्व उस पर हावी हो जाते हैं। संगठित समाज एक साथ खड़े होकर ही अन्याय और भ्रष्टाचार का विरोध कर सकते हैं।
लोकतांत्रिक शक्ति : लोकतंत्र में जनता का संगठन ही सबसे बड़ी ताकत है।
आंतरिक सुरक्षा और नागरिक एकता: जब नागरिक आपस में बंटे होते हैं, तो देश बाहरी या आंतरिक खतरों से कमजोर होता है। सुदर्शन चक्र रूपी यह संगठित शक्ति समाज में शांति और धर्म (सही व्यवस्था) की रक्षा करती है।

















