1947 का विभाजन केवल भारत की सीमाओं का विभाजन नहीं था, बल्कि यह करोड़ों लोगों के जीवन, स्मृतियों, घरों और सपनों के बिखरने की त्रासदी भी थी। विभाजन ने उन शहरों को भी गहरे घाव दिए, जो कभी भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक समृद्धि के प्रतीक हुआ करते थे। इन्हीं शहरों में एक था लाहौर- एक ऐसा नगर, जो विभाजन से पहले अखंड भारत के प्रमुख औद्योगिक एवं व्यापारिक केंद्रों में गिना जाता था।
1940 के आसपास के औद्योगिक सर्वेक्षणों के अनुसार, लाहौर में 250 से अधिक बड़े कारखाने संचालित थे। अविभाजित पंजाब के कुल औद्योगिक उत्पादन में लाहौर की हिस्सेदारी लगभग 3-4 प्रतिशत थी, जबकि पंजाब में होने वाले कपास प्रसंस्करण का लगभग 20–25 प्रतिशत कार्य इसी शहर में होता था। व्यापार, उद्योग और रोजगार के अवसरों से समृद्ध यह शहर उत्तर भारत के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था।
लेकिन 1947 की विभाजन विभीषिका ने इस समृद्ध शहर की तस्वीर बदल दी। दंगे, हिंसा, पलायन और विस्थापन ने वर्षों से बसे परिवारों को अपनी जड़ों से उखाड़ दिया। जो लाहौर कभी साझा इतिहास, संस्कृति और आर्थिक गतिविधियों का केंद्र था, वह अचानक सीमाओं के उस पार चला गया। लाहौर को खोना केवल एक भू-भाग को खोना नहीं था; यह उन घरों, बाजारों, कारखानों, स्मृतियों और उस साझा विरासत को खोना था, जिसे पीढ़ियों ने मिलकर बनाया था।
हमने खोया…
लाहौर

1947 से पहले लाहौर अखंड भारत के सबसे प्रमुख औद्योगिक एवं व्यापारिक नगरों में से एक था। 1940 के आसपास हुए औद्योगिक सर्वेक्षणों के अनुसार, यहाँ 250 से अधिक बड़े कारखाने संचालित थे। अविभाजित पंजाब के कुल औद्योगिक उत्पादन का लगभग 3–4% योगदान अकेले लाहौर से आता था। यह शहर उत्तर भारत के औद्योगिक विकास का प्रमुख केंद्र माना जाता था। अविभाजित पंजाब में होने वाली कपास प्रसंस्करण (Cotton Processing) का लगभग 20–25% कार्य लाहौर में होता था।
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