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‘हमेशा देखें अखंड भारत का सपना ‘

'पाञ्चजन्य सुशासन संवाद' में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय विमर्श कार्य प्रमुख एवं प्रचार टोली सदस्य श्री मुकुल कानिटकर ने विभाजन की विभीषिका पर अपने विचार

Written byमुकुल कानिटकरमुकुल कानिटकर
Aug 24, 2026, 01:42 pm IST
inसंघ @100, राजस्थान, पाञ्चजन्य इवेंट
श्री मुकुल कानिटकर

श्री मुकुल कानिटकर

जयपुर में हुए ‘पाञ्चजन्य सुशासन संवाद’ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय विमर्श कार्य प्रमुख एवं प्रचार टोली सदस्य श्री मुकुल कानिटकर ने विभाजन की विभीषिका पर अपने विचार रखे। प्रस्तुत हैं मुख्यांश:

हम जिस भू-खंड को आज भारत कहते हैं, वह प्राचीन काल में ‘जम्बूद्वीप’ के नाम से प्रसिद्ध था, जिसे उपमहाद्वीप भी कहा जाता है। उस विशाल जम्बूद्वीप के खंड-खंड होते हुए आज केवल एक तिहाई भूभाग को ही हम भारत मानकर चल रहे हैं। राजनीतिक मानचित्र पर जो भारत हम देखते हैं (कश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात से गुवाहाटी तक) वह पूरे जम्बूद्वीप का केवल एक तिहाई हिस्सा है; शेष दो तिहाई भाग बंट गया। इसलिए 1946-47 में जो विभाजन हुआ, जब पश्चिम पाकिस्तान और पूर्व पाकिस्तान भारत से अलग हुए, वह भारत का पहला विभाजन नहीं, बल्कि अंतिम विभाजन था।

स्मृति ही इतिहास की चेतना

जब मैं विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन का सचिव था, तब हमने एक मासिक विमर्श शृंखला ‘विभाजन विभीषिका दिवस’ की घोषणा की। उद्घाटन भाषण में वक्ता ने कहा, ‘‘आज इस्राएल इतने शत्रुओं द्वारा घिरा होने के बावजूद शक्तिशाली इसलिए है, क्योंकि हमने अपने ऊपर हुए अत्याचारों को भुलाया नहीं है। हर यहूदी मां अपने पुत्र को याद दिलाती थी कि वे अगले शुक्रवार जेरुसलेम अवश्य जाएंगे।’’ स्मृति को और अपने इतिहास को याद रखने का यही कर्तव्य ‘विभाजन विभीषिका दिवस’ के पीछे का उद्देश्य है। 1

4 अगस्त को केवल विभाजन का स्मरण करना और भारत पुन: अखंड बने इसका संकल्‍प लेना या केवल इतिहास के लिए आवश्‍यक नहीं है। यह केवल इतिहास समझने के लिए या हमसे जो छुपाया गया उसे पुनः स्मरण करने के लिए ही नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के भारत के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है। विभाजन भारत के इतिहास की अत्यंत दुखद घटना है। न जाने कितने परिवार टूटे, घर बिखरे। जो लोग जीवित भारत में आ भी गए, उन हिंदू भाइयों-बहनों की कितनी जड़ें कट गईं और कितने नाते-रिश्ते टूट गए। कितनी महिलाओं पर अत्याचार हुए, कितने बलात्कार हुए। लाखों की संख्या में लोग मारे गए। यह एक बहुत बड़ी विभीषिका है। यदि हम इसका स्मरण नहीं करते हैं, तो हम अपने सारे पूर्वजों के साथ द्रोह करते हैं। इसलिए अगस्त माह में 1 से 15 तारीख तक हम इस विभाजन की विभीषिका का स्मरण करें।

हमारे देश के साथ किस प्रकार अन्याय हुआ, ‘टू-नेशन थ्योरी’ किस प्रकार चली, और यह आज हमें इतिहास में इस प्रकार बताया जाता है कि हिंदू-मुसलमानों के बीच दंगे हुए, दोनों तरफ जनहानि हुई, दोनों तरफ प्राणहानि हुई। यह अत्यंत बड़ा असत्य है। इसमें कोई संतुलन ही नहीं है। जिस तरह से हिंदुओं, सिखों, बौद्धों और जैनियों की वर्तमान पाकिस्तान, पूर्व के पंजाब और हमारे पूर्व के बंगाल में हत्‍याएं हुईं, पूरे विश्व में ऐसा कोई उदाहरण नहीं है। विश्व के किसी दूसरे नरसंहार या वंश-निर्मूलन के साथ उसकी तुलना नहीं हो सकती। ‘यह दोनों तरफ हो रहा था’-यह कहना अत्यंत असत्य है। यह एकतरफा, पूरी प्रकार से मजहब के आधार पर की गई हत्याओं की श्रृंखला थी। ट्रेनें भरकर शवों को भेजा गया। जब गोपाल पाठा जैसे कुछ वीरों ने सुहरावर्दी का विरोध किया, तो उन्हें चुप बैठाने के लिए नोआखाली में उपवास किए गए।

आज भी रिस रहा घाव

स्वतंत्र भारत के ‘उपहार’ के रूप में हमारे रेलवे स्टेशनों पर गाड़ियां आकर लगीं, जिनमें सारे के सारे यात्री मृत थे। अनेक लोग अपना जीवन बचाकर, जैसे-तैसे पहने हुए कपड़ों के साथ, सारे जीवन की जमा-पूंजी को वैसा ही छोड़कर, जितना कुछ बांधकर अपनी पीठ पर ला सके, उतना लेकर, जैसे-तैसे परिवार को बचाते हुए दोनों तरफ से सीमा पार करके भारत में आए। राजस्थान के सीमावर्ती क्षेत्रों में आज भी ऐसे लोगों को हम जानते हैं। मैं 9 वर्ष जोधपुर रहा। वहां सिंधी परिवार के ऐसे अनेक लोग थे, जिनके रिश्तेदार या संबंधी आज भी पाकिस्तान में रहते हैं और उत्सवों के समय उनका आना-जाना रहता था। ऐसे अनेक लोगों से मिलना हुआ। आज भी किस प्रकार के अत्याचार हिंदुओं पर पाकिस्तान में होते हैं, ये हम बार-बार सुनते हैं। इसलिए विभाजन समाप्त नहीं हुआ है। विभाजन का घाव आज भी रिस रहा है। यह अचानक आया हुआ विभाजन नहीं था कि 1946 में घोषणा कर दी, रेडक्लिफ की लाइन बन गई, मानचित्र के ऊपर पेन चलाकर भारत और पाकिस्तान को काट दिया। नहीं।

इसकी जड़ें 1905 के बंगाल विभाजन में दिखाई देती हैं। लियाकत अली जैसे लोगों, मोहम्मद अली जैसे भाइयों और सर सैयद अहमद खान जैसे तथाकथित विद्वानों के द्वारा, जिन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना की, उनके द्वारा ‘टू-नेशन थ्योरी’ का प्रतिपादन किया गया। यह 19वीं शताब्दी के अंत और 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में किया गया। अंग्रेजों द्वारा प्रारंभ की गई जनगणना से ही यह विभेद प्रारंभ हुआ था। और इसलिए इस्लाम को मानने वाले हिंदुओं के साथ नहीं रह सकते-यह ‘टू-नेशन थ्योरी’ देने का काम इन मुस्लिम नेताओं ने किया। अंग्रेजों ने निश्चित रूप से उसको खाद-पानी डाला था। लेकिन हिंदुओं, सावरकर या हिंदू महासभा को जो दोष दिया जाता है, वह पूर्णतः असत्य है। ‘टू-नेशन थ्योरी’ को न तो संघ ने स्वीकार किया, न हिंदू महासभा ने और कई वर्षों तक कांग्रेस ने भी नहीं किया। उस समय कांग्रेस हिंदुओं की तरफ से अंग्रेजों के साथ बातचीत कर रही थी। बड़ी संख्या में जनहानि होने का एक कारण यह भी था।

भरोसे में रह गए लोग

उस समय पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और कश्मीर में रहने वाले हिंदू भाइयों और परिवारों को यह विश्वास ही नहीं हो रहा था कि विभाजन होगा। गांधी जैसे इतने बड़े नेता जब कहते हैं कि ‘‘मेरी लाश के ऊपर विभाजन होगा, मेरी मृत्यु होगी, मेरा शव पहले कटेगा, फिर विभाजन होगा’’-उसमें विश्वास कर लिया।

नेहरू ने भी यही बात कही थी। कांग्रेस के सारे नेता विभाजन के विरुद्ध मत दे रहे थे। विभाजन नहीं होगा, इसकी गारंटी दे रहे थे। और उसके कारण अनेक हिंदू, जो साल-डेढ़ साल पहले अपनी सारी संपदा बेचकर बहुत अच्छी तरह से स्थलांतरित हो सकते थे, जो हुआ नहीं। लोग पंजाब, सिंध, कश्मीर, बलूचिस्तान में इस विश्वास से बने रहे कि भारत के टुकड़े नहीं हो सकते। लाहौर तो हिंदू बहुल था। 60% से अधिक, लगभग 80% जनसंख्या हिंदुओं की थी। ऐसा कहते हैं कि जिस समय विभाजन स्वीकार किया गया, मौलाना आजाद ने कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में विभाजन के उस करार पर हस्ताक्षर किया।

गांधी जी को अंधेरे में रखा गया

अमृतसर की राजकुमारी प्रीतम कौर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि महात्मा गांधी को अंधेरे में रखते हुए कांग्रेस ने विभाजन को मौलाना आजाद के हस्ताक्षर से मान्‍यता दी थी। मौलाना आजाद पर गांधी जी बहुत क्रुद्ध हुए थे। हम नहीं जानते, लेकिन कांग्रेस ने जब विभाजन को स्वीकार किया, तब भी अनेक लोगों को यह विश्वास था कि लाहौर भारत में रहेगा। लाहौर के हिंदुओं के मन में यह विश्वास था। इसी प्रकार कराची, सिंध के अनेक प्रदेश, नगर और गांव हिंदू बहुल थे। राजस्थान से जुड़े ऐसे अनेक गांव आज भी हैं, जहां के प्रधान चौधरी हैं। लेकिन बाद में उनके साथ क्या हुआ, यह भी विभाजन की त्रासदी का हिस्सा है। एक समय आज के पाकिस्तान में, विशेषकर पश्चिमी पंजाब और पश्चिमी पाकिस्तान में, हिंदुओं की जनसंख्या लगभग 23 से 25 प्रतिशत तक थी। आज वहां हिंदुओं की संख्या बहुत ही कम रह गई है। बांग्लादेश में भी हिंदुओं की स्थिति देखी जा सकती है। दोनों ओर प्रचंड वंश-निर्मूलन और नरसंहार हुआ। हिंदुओं को समाप्त कर दिया गया।

बंगाल की अनकही विभीषिका

बंगाल का विभाजन अत्यंत हृदयविदारक था। कोलकाता में हुए डायरेक्ट एक्शन के बारे में हमने ‘बंगाल फाइल्स’ में थोड़ा-बहुत देखा है। मैं ‘थोड़ा-बहुत’ इसलिए कह रहा हूं क्योंकि जिस प्रकार का अत्याचार और अनाचार हुआ, उसे कैमरे पर दिखाना असंभव है और सभा में उसका वर्णन करना भी कठिन है। इतनी क्रूरता और अमानवीयता के साथ हिंदू परिवारों का नरसंहार किया गया।

चटगांव, सिलहट और वीरगांव जैसे क्षेत्रों में भी भारी अत्याचार हुए। चटगांव में उस समय लगभग 90 प्रतिशत हिंदू थे। आज वह बांग्लादेश में है। सिलहट भी हिंदू बहुल क्षेत्र था। आज भी असम और आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले अनेक बंगाली मूल के लोगों में बड़ी संख्या सिलहटी लोगों की है और वे सिलहटी भाषा बोलते हैं।

कहा जाता है कि सिलहट को भारत में शामिल करने के लिए आंदोलन हुआ था। इसके बाद अंग्रेजों ने वहां जनमत संग्रह कराया। लेकिन हिंदुओं ने इस विश्वास में मतदान नहीं किया कि हम तो 80-90 प्रतिशत हैं, इसलिए सिलहट भारत में ही जाएगा। मतदान केवल लगभग 60 प्रतिशत हुआ और हिंदू जनमत संग्रह हार गए। इस प्रकार सिलहट भारत से बाहर चला गया। चटगांव भी भारत का हिस्सा नहीं रहा। वीरगांव भी भारत से बाहर चला गया, जो सिलीगुड़ी के पास है। वहां आज भी बड़ी संख्या में हिंदू रहते हैं। यदि वीरगांव भारत में होता तो आज जिसे हम ‘चिकन नेक’ कहते हैं, वह इतनी संकरी पट्टी नहीं होती।

नागरिकता और विभाजन की विरासत

सीएए को लेकर हुए विरोध और प्रदर्शनों को भी इसी पृष्ठभूमि में देखने की आवश्यकता है। 1947 से लेकर 2014 तक विभाजन के समय भारत आए और बाद में मजहबी अत्याचार के कारण भारत आते रहे हिंदुओं तथा अन्य समुदायों को नागरिकता देने के लिए नागरिकता कानून में परिवर्तन किए गए। लेकिन इसे भी इस्लाम विरोधी बताया गया। कष्ट इस बात का है कि विरोध करने वालों में केवल मुसलमान नहीं थे, बल्कि हमारे अपने हिंदू भाई भी थे।

नई पीढ़ी को बताएं इतिहास

विभाजन की विभीषिका का स्मरण धीरे-धीरे कम होता गया है। आज की पीढ़ी, जिसे जेनरेशन जेड, जेनरेशन अल्फा और मिलेनियल जैसे नाम दिए जाते हैं, उसे यह इतिहास भी ठीक से नहीं बताया गया। उनके सामने जब इन विषयों की बात की जाती है तो वे कहते हैं कि आप सांप्रदायिकता क्यों फैला रहे हैं? हिंदू-मुस्लिम क्यों कर रहे हैं? हिंदू-मुस्लिम करना उद्देश्य नहीं है। उद्देश्य अपने पूर्वजों के साथ हुए अन्याय और अत्याचार का स्मरण करना है। अपने उन बंधुओं के साथ आज भी हो रहे अन्याय और अत्याचार को समझना है। यदि हम इसका स्मरण नहीं करेंगे तो एक दिन हमारे साथ भी वही हो सकता है।

इतिहास पढ़ने की आवश्यकता

डोमिनिक लापिएर ने अपनी पुस्तक ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ में माउंटबेटन के पत्रों आदि का उल्लेख करते हुए अंग्रेजों के षड्यंत्र को सामने रखा है। लेकिन केवल अंग्रेजों का षड्यंत्र नहीं था। उतना ही बड़ा षड्यंत्र मुस्लिम लीग का भी था। जिस मुस्लिम लीग ने भारत का विभाजन किया,वही मुस्लिम लीग आज केरल में सत्ता में है। वह यूडीएफ की सबसे बड़ी सहयोगी है। वहां कांग्रेस के विधायकों की संख्या और मुस्लिम लीग के विधायकों की संख्या में बहुत कम अंतर है। इतने अधिक विधायक मुस्लिम लीग के टिकट पर चुनकर आए हैं। वही मुस्लिम लीग पूरे भारत में इसी प्रकार विभाजन की मानसिकता को आगे बढ़ाती दिखाई देती है और कहती है कि हम पूरा ‘वंदे मातरम्’ नहीं गाएंगे। ऐसा क्यों है? क्योंकि हम विभाजन को भूल गए हैं। क्योंकि हम अपने पूर्वजों के कष्ट को भूल गए हैं। क्योंकि हम अपने पूर्वजों के साथ हुए अन्याय और अत्याचार को भूल गए हैं। इसलिए स्वतंत्रता का आनंद मनाते हुए, स्वाधीनता दिवस पर विजय का तिरंगा फहराते समय उन बंधुओं के रक्त का भी स्मरण करना चाहिए जो विभाजन के समय बहा। उन माताओं के साथ हुए अन्याय को भी स्मरण करना चाहिए, जो हमारे ही पूर्वजों की माताएं थीं।

भारत माता की कटी भुजाओं का स्मरण करना चाहिए। सप्तसिंधु में से कट गई चार नदियों का स्मरण करना चाहिए। हम पंजाब कहते हैं, लेकिन उसकी पांच नदियों में से तीन ही आज भारत में हैं। मूलतः यह सप्तसिंधु का क्षेत्र था, लेकिन उसका बड़ा हिस्सा कट गया। ‘जन गण मन’ में आज भी ‘उत्कल’ और ‘वंग’ का उल्लेख है, लेकिन वह वंग आज पूरा हमारा नहीं है। स्वामी विवेकानंद की कुलदेवी मां ढाकेश्वरी आज भारत में नहीं हैं। भारत के अनेक लोगों की कुलदेवी हिंगलाज माता भी आज भारत में नहीं हैं। जहां पाणिनी ने संस्कृत की अष्टाध्यायी लिखी और पतंजलि ने योगसूत्र लिखे, वह लाहौर आज भारत में नहीं है। जहां कभी आर्य समाज का मुख्यालय था, वह लाहौर आज भारत में नहीं है। व्यास महर्षि की तपस्या के कारण जिस नदी का नाम व्यास पड़ा, वह नदी भी आज भारत के वर्तमान भूभाग में नहीं है। इसलिए हमें अपनी शपथ को स्मरण करना है। रावी की शपथ को स्मरण करना है।

अखंड भारत का संकल्प

जंबूद्वीप में से 27 देश खड़े हुए। उन सबके बीच एक संघ की कल्पना की जा सकती है। जिस प्रकार यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका है, उसी प्रकार यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ जंबूद्वीप या यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ भारत की कल्पना सामने रखी जा सकती है। एक दिन हमारी आंखों के सामने भारत जीते-जी अखंड होगा। इस स्वप्न को मन में धारण करना चाहिए। यह ऋषियों की वाणी और परंपरा से जुड़ा हुआ स्वप्न है। आज पाकिस्तान की स्थिति भी अत्यंत खराब है। जिस प्रकार 11 अगस्त को बलूचिस्तान ने अपने आपको स्वतंत्र घोषित करने की बात कही, जिस प्रकार पख्तूनिस्तान में गतिविधियां चल रही हैं और पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर में भी असंतोष दिखाई देता है, इन सब घटनाओं को देखते हुए 2047 से पहले, अर्थात स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूर्ण होने से पहले, विभाजन समाप्त करने का संकल्प लेना चाहिए। इसलिए सभी लोगों को विभाजन की विभीषिका का स्मरण करना चाहिए।

Topics: सुशासनसक्षम नागरिकसभ्यता एवं आध्यात्मआत्मबोध(इतिहास एवं विरासतसांस्कृतिक आत्माउद्यमशीलतासुराजभारतीय अवधारणानागरिक अधिकार एवं कर्तव्यराष्ट्र निर्माणसमस्या-समाधानविभाजन की विभीषिकासंस्कृतिक संवादआत्मनिर्भरतासंस्कारित समाज
मुकुल कानिटकर
मुकुल कानिटकर
अखिल भारतीय प्रचार टोली सदस्य, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ [Read more]
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