विभाजन का समय मेरी आयु 15 बरस थी। हमलोग रावलपिंडी के कुरी रोड पर रहते थे। हमारे बाऊ जी सूखे मेवे और कपड़े का व्यवसाय करते थे। उनदिनों उनकी गिनती बड़े थोक व्यापारियों में होती थी। हमारे घर में शहर के बड़े-बड़े प्रतिष्ठित लोगों का आना-जाना था। हमारे घर में बहुत रौनक रहती थी। हम कभी सोच भी नहीं सकते थे कि हमारा घर भी इस तरह उजड़ जाएगा।
वैसे तो विभाजन की घोषित होते ही पाकिस्तान से लोगों का पलायन शुरू हो गया था। हम अपने पड़ोसियों को अपना समझते थे लेकिन विभाजन होते ही लोगों की मानसिकता बहुत बदल गई थी। लोगों का विश्वास एक-दूसरे पर टूटने लगा था। देखते ही देखते पड़ोसी-ही-पड़ोसी के खून का प्यासा हो गया था। डर और आंतक का ऐसा महौल बन गया था कि हमारे बाऊ जी बंदूक अपने पास रखने लगे थे।
मुझसे तीन छोटे भाई थे। मुझे याद आता है कि एक दिन बाऊ जी बहुत घबराए हुए लगे। उन्होंने घर में घुसते ही कहा कि अब हमें भी यहां से जाना ही पड़ेगा। वह रावलपिंडी छोड़ना नहीं चाहते थे। आज भी उनके वे शब्द और उदास चेहरा नहीं भूलता। एक क्षण में घर का माहौल बदल गया था। सभी निःशब्द थे।
आज भी कभी अकेले बैठती हूं, तो पिता जी के वे शब्द कानों में गूंजते हैं। शुरू-शुरू में तो मैं सिर्फ याद करके परेशान हो जाती थी। लेकिन, धीरे-धीरे मैंने खुद को समझाया कि अब बीता समय वापस लौटकर नहीं आता। वह शहर तो छूटा ही, घर-द्वार के साथ हमारे रिश्ते-नाते, सखी-सहेलियां, खेल-खिलौने सभी छूट गए। हालांकि अब तो बहुत लंबा समय बीत चुका है। लेकिन कुछ यादें मिटाए नहीं मिटती, ऐसी ही विभाजन की वो लकीरें हैं, जो आठ दशक के बाद भी हमारे दिलों पर वैसे ही खींची हुई हैं।
हमलोग पाकिस्तान से आने वाली आखिरी रेल में सवार हुए थे। रेल के डिब्बे खचाखच भरे हुए थे। हर कोई हैरान, परेशान नजर आ रहा था। हमारे दादी, दादा, तीनों चाचा-चाची, सात बुआ-फूफा, उनके बच्चे सभी लोग-कुल मिलाकर 25 लोग हमारे परिवार के रेल में सवार थे। उस समय भी घर से निकलते हुए, बाऊ जी घर पर ताला लगा कर आए थे। उन्हें उम्मीद थी कि वह जल्दी ही रावलपिंडी लौटकर जाएंगे। लेकिन, उसके बाद रेलगाड़ी की आवाजाही बंद हो गई थी।
हमलोग रावलपिंडी से अटारी के रास्ते चार-पांच दिनों का सफर तय करके कुरुक्षेत्र पहुंचे। वहां से दिल्ली आए। हमारे नाना जी 1940 में ही दिल्ली आ गए थे। उनकी दुकानें चांदनी चौक में थी। उन्होंने हम लोगों के रहने की व्यवस्था एक धर्मशाला में करवाई। उन्हीं की सहायता से बाऊ जी ने यहां फिर से अपना व्यवसाय शुरू किया।
मेरे बाऊ जी उस जमाने के 11वीं तक पढ़ाई की थी। रावलपिंडी में मैंने भी सातवीं तक पढ़ाई की थी। लेकिन यहां आने के बाद मेरी पढ़ाई छूट गई। भय के वातावरण के कारण हमें घर से बाहर निकलने नहीं दिया जाता था। जबकि, कैंप में रहने वालों को सरकार की ओर से दसवीं पास की डिग्री बांटी गई। मुझे आज भी दुख होता है कि अगर देश का माहौल शांतिपूर्ण होता तो मैं आगे की पढ़ाई कर पाई होती है।
















