हम लोग स्यालकोट के निडाला गांव में हंसी-खुशी से रह रहे थे। किसी का किसी से कोई मन-मुटाव नहीं था। लेकिन एक दिन अचानक हमारे पड़ोस के कुछ लोग घर आए। उन्होंने पिताजी से गांव छोड़ देने के लिए कहा। परिवार के 15 लोग आनन-फानन में कुछ कपड़े, नगदी और जेवर-गहने लेकर घर से निकल पड़े।
हमें कश्मीर की सीमा तक बैलगाड़ी से कुछ पड़ोसियों ने छोड़ा। वहां हम लोग जम्मू कैंप में रुके। उस समय तो मैं सात साल का बच्चा था। मेरे दो भाई और सात बहनें थीं। हम लोग सभी बैलगाड़ी में बैठकर खुश हो रहे थे कि घूमने जा रहे हैं। लेकिन रास्ते में दंगे के कारण मारे गए लोगों के शव और घायल लोगों को देखकर मन पसीज गया।
हम लोग वह मंजर देखकर भीतर तक कांप गए। हमें ना खाना-पीना अच्छा लगता और न ही नींद आती। रात में भी हम लोग घबराकर आधी नींद में जाग जाते थे। वह सफर बेहद ऊबाऊ और उदासी भरा था। हर तरफ कोलाहल और दुख भरा माहौल था। हर चेहरे पर डर और भय का साया था।
रास्ते में हम लोग भी बहुत परेशान हुए थे, क्योंकि सियालकोट से आते हुए हमारे कुछ रिश्तेदार खंडूर में इकट्ठे हुए। वे लोग मनावर से आ रहे थे। मनावर से खंडूर आते हुए रास्ते में पिताजी के मौसेरे भाई को दंगाइयों ने मार दिया था। उन दिनों चारों ओर से बुरी खबरें ही आतीं, जिन्हें सुनकर एक पल को सभी कांप जाते।
जम्मू से हमें सेना की गाड़ी से अमृतसर में पहुंचाया गया। कई दिनों तक गुरुद्वारे में रहने के बाद हम रेलगाड़ी से अंबाला होते हुए, बरेली पहुंचे, क्योंकि दादा जी अपने व्यापार के सिलसिले में बरेली आते-जाते थे। उन्हें इस शहर के बारे में पता था और कुछ लोग जानते-पहचानते भी थे।
हमारे कुछ रिश्तेदार भी 1938 में ही सियालकोट से बरेली आकर बस गए थे। अंततः हम लोगों ने बरेली के कटरा मनराय की एक सराय में शरण ली। कुछ दिनों बाद हमारे निडाला गांव के कुछ लोग बरेली आए। तब उनसे पता चला कि हमारे गांव निडाला के घर, मवेशियों और संपत्तियों को दंगाइयों ने अग्नि में स्वाहा कर दिया था। हमारी विरासत को खाक में मिला दिया। पिताजी ने हिम्मत जुटाकर एवं लोगों की मदद से बरेली में कपड़े का व्यवसाय शुरू किया। धीरे-धीरे जिंदगी पटरी पर आने लगी।














