#विभाजन : बरसों की सुनियोजित परिणति
October 21, 2026
  • Read Ecopy
  • Circulation
  • Advertise
  • Careers
  • About Us
  • Contact Us
Android appiPhone AppArattai
Panchjanya
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Copy
    • Subscribe & Read Ecopy
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Copy
    • Subscribe & Read Ecopy
Panchjanya
panchjanya android mobile app
  • होम
  • भारत
  • विश्व
  • संघ @100
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विश्लेषण
  • मत अभिमत
  • रक्षा
  • धर्म-संस्कृति
  • पत्रिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
  • Print Edition
  • Ecopy
होम भारत

#विभाजन : बरसों की सुनियोजित परिणति

विभाजन केवल 1947 में खिंची एक राजनीतिक रेखा नहीं था, बल्कि वह लंबे समय से आकार ले रही राजनीतिक, सांप्रदायिक और औपनिवेशिक प्रक्रियाओं का भयावह परिणाम था। पृथक निर्वाचन से लेकर द्विराष्ट्र सिद्धांत, मुस्लिम लीग की राजनीति, प्रत्यक्ष कार्रवाई और 1946-47 के रक्तरंजित दंगों तक घटनाओं की एक लंबी श्रृंखला ने अखंड भारत को विभाजित किया। इस त्रासदी की पृष्ठभूमि समझना आज भी उतना ही आवश्यक है

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Aug 21, 2026, 08:44 am IST
inभारत
बंटवारे के दाैरान भारत की सीमा की ओर बढ़ते हिदू शरणार्थी

बंटवारे के दाैरान भारत की सीमा की ओर बढ़ते हिदू शरणार्थी

स्वतंत्रता के अमृत काल में भारत विभाजन की पृष्ठभूमि को समझना प्रत्येक भारतीय के लिए नितांत आवश्यक और मार्गदर्शी है। यह 1947 की वह भयावह त्रासदी थी, जिसने अखंड भारत के भौगोलिक विभाजन के साथ-साथ सभ्यता, संस्कृति और संसाधनों को भी बांट दिया और करोड़ों लोगों के विस्थापन एवं नरसंहार का मार्ग प्रशस्त किया।

इस ऐतिहासिक त्रासदी की जड़ें अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की कुटिल नीति में थीं, जिसने 1909 के पृथक निर्वाचक मंडल के माध्यम से हिंदू-मुस्लिम दूरियों को बढ़ावा दिया। मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग द्वारा प्रतिपादित ‘द्विराष्ट्र सिद्धांत’ ने इस विभाजन की नींव रखी, जबकि सत्ता के बंटवारे पर आम सहमति न बन पाने से 1946 में भयानक सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं घटित हुईं।

भारत-पाकिस्तान के बीच वर्तमान कड़वाहट, चार युद्ध और कश्मीर विवाद की जड़ें इसी विभाजन में निहित हैं। यह इतिहास हमें सांप्रदायिक राजनीति के विनाशकारी परिणामों और मजहबी कट्टरता के खतरों से अवगत कराता है। विशेष रूप से हिंदुओं के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि वे आपसी संघर्ष और शत्रु-बोध की मानसिकता से मुक्त होकर सतर्क रहें, क्योंकि इतिहास गवाह है कि धोखा और अचेतनता का परिणाम सदैव अतुलनीय क्षति के रूप में मिला है। अतः, इस दर्दनाक अध्याय का अध्ययन न केवल अतीत को समझने के लिए, बल्कि भविष्य में ऐसी त्रासदी की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए भी अनिवार्य है।

वीर परंपरा और विदेशी आक्रमण

भारत भूमि सदैव वीर प्रसूता रही है। प्रारंभिक काल में हुए फारसी, सिकंदर, पहलव, कुषाण और हूण जैसे आक्रमणकारी प्रारंभिक सफलता के बाद भी अंततः परास्त हुए और भारतीय संस्कृति में विलीन हो गए। लेकिन तलवार के बल पर मजहबी साम्राज्य स्थापित करने के उद्देश्य से आए इस्‍लामी आक्रांताओं का पूर्ण भारतीयकरण नहीं हो सका, जिससे दीर्घकालीन संघर्ष का इतिहास प्रारंभ हुआ। अरब और तुर्की आक्रमणों की सोच स्पष्ट थी-‘दारुल कुफ्र’ (काफिरों की भूमि) को ‘दारुल इस्लाम’ (इस्लाम की भूमि) में परिवर्तित करना।

इस सिद्धांत के अनुसार, दुनिया को दो क्षेत्रों में बांटा गया- मुस्लिम शासित क्षेत्र ‘दारुल इस्लाम’ और शेष क्षेत्र ‘दारुल कुफ्र’ या ‘दारुल हर्ब’ (युद्ध की भूमि)। यह सोच निरंतर प्रवहमान है, जिसका उदाहरण गाम्बिया का 57वें इस्लामिक देश के रूप में उभरना है। आज भी जिहाद की विचारधारा इसी सोच की विरासत है। परन्तु वास्तविकता यह है कि केवल ‘दारुल अमन’ (शांति का निवास) या ‘दारुल इंसान’ (मनुष्यों का निवास) जैसी अवधारणाएं स्वीकार्य होनी चाहिए। अब ऐसे विभाजनकारी शब्दों को त्यागकर मानवतावादी दृष्टिकोण अपनाने का समय आ गया है, क्योंकि यही भारत विभाजन की त्रासदी से प्राप्त कठोर सीख है।

शत्रु बोध की कमी और आंतरिक संघर्ष

भारत पर हुए अरब और तुर्की आक्रमणों का मुंहतोड़ जवाब दिया गया। लगभग 500 वर्षों तक बप्पा रावल, उनके वंशज, मिहिर भोज और अन्य राजपूत राजाओं ने अरबों के भारत में पैर जमने नहीं दिए। वहीं, वर्तमान अफगानिस्तान में हिंदू शाही वंश के राजाओं ने 200 वर्षों तक तुर्कों को सफल नहीं होने दिया। मौलाना अल्ताफ हुसैन हाली ने ठीक ही कहा है कि इस्लाम का निडर बेड़ा सात समुद्र पार कर गया, परंतु अंत में गंगा के मुहाने पर आकर डूब गया। परंतु शत्रु बोध की कमी, आपसी संघर्ष और विश्वासघात ने इस्लामी सफलता को बल दिया। जब भी इस्लामी आक्रांता कमजोर पड़े, उन्होंने अन्य मजहबी आक्रांताओं को भारत आमंत्रित किया-जैसे राणा सांगा के समय बाबर को और पेशवाकाल में अहमदशाह अब्दाली को।

712 में मोहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में सिंध पर अरब विजय ने भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लामी शासन की नींव रखी। इसके बाद महमूद गजनवी और मोहम्मद गोरी के आक्रमणों ने उत्तर भारत में सल्तनत और मुगल साम्राज्य की स्थापना की। भारत को ‘दारुल हर्ब’ से ‘दारुल इस्लाम’ में परिवर्तित करने के प्रयास हुए, परंतु आक्रांता पूर्णतः सफल न हो सके। मंदिर विध्वंस और जजिया जैसे करों ने पंथों के बीच वैचारिक दूरियां बढ़ाईं, जो आगे चलकर विभाजन की पृष्ठभूमि बनीं। अंग्रेजों ने इस स्थिति को अपनी ‘बांटो और राज करो’ नीति में ढालकर विभाजन को अवश्यंभावी बना दिया।

1857 का स्वतंत्रता संग्राम और ब्रिटिश नीति परिवर्तन

यूरोप में आधुनिक युग और पुनर्जागरण के साथ उपनिवेशवाद, वाणिज्यवाद और साम्राज्यवाद की प्रवृत्ति विकसित हुई। ईस्ट इंडिया कंपनी ने प्लासी (1757) और बक्सर (1764) के युद्धों के बाद भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव रखी। 1818 में मराठों के प्रतिरोध के बावजूद भारत में ब्रिटिश सर्वोच्चता स्थापित हो गई और मुगल शासन का अंत कर दिया गया। हालांकि शाह वलीउल्ला देहलवी (1703-1762) ने मुस्लिम साम्राज्य की पुनर्स्थापना के लिए वहाबी आंदोलन चलाया। सैयद अहमद बरेलवी (1776-1831) ने आक्रामक रुख अपनाया, परंतु महाराजा रणजीत सिंह की सेना ने 1831 में बालकोट के युद्ध में उन्हें परास्त किया। इस युद्ध में अंग्रेजों ने सिखों के विनाश के लिए वहाबियों को हर प्रकार से मदद की, पर दांव उल्‍टा पड़ गया। वहाबियों ने अंग्रेजों के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया और यह आंदोलन 1870 तक चला।

1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों ने मुसलमानों को दोषी ठहराया और उनका दमन किया। परंतु वहाबी आंदोलन से उन्हें मुस्लिम प्रतिरोध की क्षमता का पता लग गया था। 1871 में डब्ल्यू. डब्ल्यू. हंटर ने ‘द इंडियन मुसलमान्स’ नामक पुस्तक में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध मुस्लिम प्रतिरोध के मूल कारणों का विश्लेषण किया। हंटर ने मुस्लिम उग्रता के विश्लेषण में सहानुभूति अपनाई और उनकी शिकायतों को उचित ठहराया। उसने सुझाव दिया कि कुरान के आदेशों की व्याख्या करके ब्रिटिश विरोध के आक्रोश को दूर किया जा सकता है। हंटर ने यह भी बताया कि अंग्रेजों ने पहले कहां गलती की और भविष्य में कौन-से नए रुख अपनाने होंगे। यह पुस्तक अंग्रेजों की नीति निर्माण में मील का पत्थर साबित हुई और ‘बांटो और राज करो’ की नीति को मजबूत करने में सहायक बनी।

अलीगढ़ आंदोलन और ब्रिटिश समर्थन

जेम्स मिल की पुस्तक ‘द हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इंडिया’ (1817) ने भारतीय इतिहास को ‘हिंदू’, ‘मुस्लिम’ और ‘ब्रिटिश’ कालखंडों में विभाजित कर दिया, जिससे सांप्रदायिकता को बढ़ावा मिला और अंग्रेजों का शासन दीर्घजीवी बनाने की नींव रखी गई। 1857 की क्रांति के पश्चात सर सैयद अहमद खान के अलीगढ़ आंदोलन को अंग्रेजों का समर्थन प्राप्त हुआ। लॉर्ड नॉर्थब्रुक ने 10,000 रुपये की आर्थिक सहायता दी और आंदोलन में प्रिंसिपल आर्चबोल्ड, थिओडोर बैक जैसे अंग्रेजों ने योगदान दिया। इस आंदोलन ने हिंदू-मुस्लिम के बीच खाई पैदा की, जिससे द्विराष्ट्र सिद्धांत को बल मिला और मोहम्मद इकबाल ने इसकी वकालत शुरू की। दरअसल, 1906 में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना अंग्रेजों द्वारा निर्देशित एक राजनीतिक चाल थी, जिसका उद्देश्य कांग्रेस की बढ़ती राष्ट्रीय शक्ति को कमजोर करना और मुस्लिम बहुसंख्यक वर्ग को कांग्रेस से दूर रखना था। शिमला में लॉर्ड मिंटो से मिली मुस्लिम लीग वास्तव में अंग्रेजों का एक नाटक था।

देवबंद और बरेलवी जैसे आपसी प्रतिस्पर्धी मजहबी आंदोलनों की राजनीतिक प्रतिक्रियाएं विभाजित थीं, जिसका प्रभाव मुस्लिम राजनीति पर पड़ा और एक बड़े धड़े ने मुस्लिम लीग व पाकिस्तान का समर्थन किया। अंग्रेजों ने सुनियोजित तरीके से भारतीय इतिहास लेखन में सांप्रदायिकता को आगे बढ़ाया और सांप्रदायिक त्रिकोण का निर्माण किया, जिसका आधार अंग्रेज स्वयं बने। यद्यपि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना अंग्रेजों ने की थी, परंतु त्रिबली के आने से कांग्रेस की ताकत बढ़ने लगी और राष्ट्रत्व प्रबल हो रहा था। इसलिए कांग्रेस की बढ़ती राष्ट्रीय शक्ति को कमजोर करने और राष्ट्रीय आंदोलन को विभाजित करने के लिए अंग्रेजों ने ‘बांटो और राज करो’ की नीति अपनाई, जिसके तहत 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना हुई।

मार्ले-मिंटो सुधार और पृथक निर्वाचन

वर्ष 1909 के भारतीय परिषद अधिनियम (मार्ले-मिंटो सुधार) ने मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन प्रणाली की शुरुआत करके भारत में सांप्रदायिक राजनीति की नींव रखी। इस प्रावधान ने मजहब के आधार पर समाज और राजनीति को विभाजित कर दिया,
जिससे भविष्य में देश का विभाजन अपरिहार्य हो गया। इस अधिनियम के तहत मुस्लिम मतदाताओं के लिए अलग क्षेत्र तय किए गए, जहां केवल मुस्लिम उम्मीदवार ही खड़े हो सकते थे और सिर्फ मुस्लिम लोग ही उन्हें वोट दे सकते थे। जब पृथक निर्वाचन प्रणाली को मंजूरी दी जा रही थी, तब लॉर्ड मार्ले ने लॉर्ड मिंटो को पत्र लिखकर चेतावनी दी थी, ‘‘हम अजगर के दांत बो रहे हैं और इसका परिणाम कड़वा होगा।’’

1916 में लखनऊ में कांग्रेस और मुस्लिम लीग का समझौता आगे चलकर घातक सिद्ध हुआ। जहां एक ओर इस समझौते ने मुस्लिम लीग को वैधानिकता प्रदान की, वहीं दूसरी ओर पृथक निर्वाचन प्रणाली पर भी मोहर लगा दी। इंद्र विद्यावाचस्पति लिखते हैं, ‘‘कांग्रेस के उस समय के नेताओं ने समझा था कि जो समझौता हो रहा है, वह सौदे का अंतिम अध्याय है, पर वस्तुतः वह केवल पहला अध्याय निकला और उसके अंतिम अध्याय का शीर्षक बना पाकिस्तान।’’

1919 के भारत शासन अधिनियम ने 1909 की पृथक निर्वाचन प्रणाली का विस्तार किया और इसे सिखों, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियन और यूरोपियों तक बढ़ा दिया। जब समुदायों को अलग वोट देने का अधिकार मिला, तो नेता मत-मजहब के आधार पर वोट मांगने लगे, जिससे समाज में दूरियां बढ़ती गईं। इन प्रावधानों ने ऐसा राजनीतिक ढांचा तैयार किया, जिसके कारण आगे चलकर 1932 का सांप्रदायिक पंचाट और अंततः 1947 का देश का विभाजन अनिवार्य सा हो गया।

खिलाफत आंदोलन और कांग्रेस की भूमिका

महात्मा गांधी और कांग्रेस का खिलाफत आंदोलन को समर्थन देना बहुत भारी पड़ा। प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद तुर्की के साथ किए गए सेवर्स की संधि के अंतर्गत खलीफा का अपमान और इस्लामी क्षेत्र के बंटवारे को लेकर भारतीय मुस्लिम नाराज हो गए। अली बंधुओं ने अंग्रेजों का विरोध करने के निश्चय किया, जिसे खिलाफत आंदोलन के नाम से जाना जाता है।

खिलाफत आंदोलन (1919-1924) भारतीय कम अंतरराष्ट्रीय मुद्दे से अधिक जुड़ा था। इसका उद्देश्य तुर्की में खलीफा के सम्मान और शासन को स्थापित करना था, न कि भारत की आजादी। गांधी जी ने इस आंदोलन का समर्थन किया और उन्हें एक अवसर दिखाई दिया कि यदि स्वराज का आंदोलन भी शुरू किया जाए, तो हिंदू-मुस्लिम मिलकर अंग्रेजों पर दबाव डाल सकेंगे। यही सोचकर उन्होंने अगस्त 1920 में असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया, हालांकि चौरी-चौरा की घटना के बाद इसे वापस लेना पड़ा। वास्तव में, यह पहला और अंतिम अवसर था जहां राष्ट्रीय आंदोलन को मुस्लिम वर्ग का सबसे बड़ा समर्थन मिला। इसके पश्चात सविनय अवज्ञा या भारत छोड़ो आंदोलन में उतना मुस्लिम समर्थन कभी प्राप्त नहीं हुआ। मोपला दंगे इसी का दुष्परिणाम थे।

भारत सरकार अधिनियम 1935 ने मुस्लिम बहुल प्रांतों को स्वायत्तता देकर और मुस्लिम लीग को राजनीतिक रूप से मजबूत करके भारत के विभाजन की पृष्ठभूमि तैयार की। इस अधिनियम ने मुसलमानों के अलावा सिखों, ईसाइयों और दलितों के लिए भी अलग मतदाता मंडलों का दायरा बढ़ाया, जिससे भारतीय समाज में धार्मिक आधार पर दूरियां गहरी हुईं और राष्ट्रीय एकता कमजोर हुई।

प्रांतीय स्वायत्तता के तहत प्रांतों में द्वैध शासन खत्म किया गया। 1937 के चुनावों के बाद राजनीतिक वास्तविकताओं ने मुस्लिम लीग को अपनी पहचान मजबूत करने का मौका दिया। इससे मजहब आधारित राजनीति को कानूनी और प्रशासनिक मान्यता मिली और दो-राष्ट्र सिद्धांत को अप्रत्यक्ष बल मिला। अधिनियम की व्यवस्थाओं ने यह अहसास कराया कि अल्पसंख्यक समुदाय अलग पहचान के बिना सुरक्षित नहीं हैं, जिसके आधार पर आगे चलकर पाकिस्तान की मांग को वैचारिक बल मिला।

‘पाकिस्तान’ शब्द का उद्गम

कैंब्रिज विश्वविद्यालय में चौधरी रहमत अली ने 1933 में ‘नाउ ऑर नेवर’ पर्चे में पहली बार ‘पाकिस्तान’ शब्द का इस्तेमाल किया। उसने उत्तर-पश्चिम भारत के पांच क्षेत्रों (पंजाब, अफगान प्रांत, कश्मीर, सिंध और बलूचिस्तान) को मिलाकर इस अलग मुस्लिम राष्ट्र की कल्पना की थी। यही शब्द आगे जाकर फलीभूत हुआ।

1937 के चुनाव में मुस्लिम लीग को सफलता नहीं मिली। कांग्रेस ने आठ राज्यों में अपनी सरकार बनाई। 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध प्रारंभ होने के पश्चात कांग्रेस ने अपने मंत्रिमंडलों से त्यागपत्र दे दिया। मुस्लिम लीग के नेताओं को समझ में आया कि बिना धार्मिक रंग और अलग राष्ट्र की मांग के लीग को फिर से खड़ा नहीं किया जा सकता। 1940 के लाहौर अधिवेशन में, जिसकी अध्यक्षता जिन्ना ने की थी, फजलुल हक ने पाकिस्तान को प्रस्ताव प्रस्तुत किया, जो 23 मार्च 1940 को पारित हुआ। इसी कारण 23 मार्च को पाकिस्तान दिवस मनाया जाता है।

वेवेल योजना के चलते शिमला सम्मेलन में जिन्ना की हठधर्मिता ने यह दिखा दिया कि मुस्लिम हितों की रक्षक केवल मुस्लिम लीग है। भारत के मुसलमानों को लगने लगा कि जिन्ना ही उनके हितों का रक्षक है, जिसका लाभ 1946 के चुनाव में मिला। इसमें उसने केंद्रीय विधानसभा में 30 स्थान और प्रांतीय विधानसभा में 425 सीटें जीतीं। कुल मिलाकर समस्त मुस्लिम आरक्षित सीटों में से 90% सीटें मुस्लिम लीग को मिलीं, जिनमें सर्वाधिक संख्या उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल आदि क्षेत्रों से थी। मुस्लिम लीग को समझ में आ गया कि सांप्रदायिकता के ज्वार के बिना वह सत्ता पर सवार नहीं हो सकती, इसलिए सत्ता की प्राप्ति अलग देश की मांग से ही पूरी हो सकती थी। यह उन्माद इतना छा गया कि मुस्लिम लीग अब अपनी मनमानी पर उतारू हो गई।

कैबिनेट मिशन योजना और प्रत्यक्ष कार्रवाई

1946 में कैबिनेट मिशन योजना ने पाकिस्तान की मांग को सीधे स्वीकार न करके प्रांतों का सामूहिकरण किया, जिन्हें एबीसी श्रेणियों में विभाजित किया गया। इसमें कहा गया कि कोई भी प्रांत अपना संविधान बना सकता है, केंद्र का संविधान अलग होगा और प्रांत का अलग। कांग्रेस ने कहा कि इससे पाकिस्तान बनने की संभावना है, लेकिन जिन्ना ने स्पष्ट रूप से पाकिस्तान की मांग की। कैबिनेट मिशन ने ऐसा करने से इनकार कर दिया, तब जिन्ना ने कहा कि ‘हम लड़कर लेंगे पाकिस्तान’ और 16 अगस्त 1946 को प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस का आह्वान किया गया। बंगाल में जबरदस्त दंगे हुए और हजारों हिंदुओं की हत्या कर दी गई।

इस नरसंहार को देखकर स्पष्ट दिखाई देने लगा कि बिना मुस्लिम राष्ट्र के भारत में शांति संभव नहीं है। अंग्रेज एवं कांग्रेस के नेता भी भयभीत हो गए और उन्हें लगने लगा कि भारत के विभाजन के बिना कुछ भी संभव नहीं है। बंगाल की सरकार, जो मुस्लिम लीग के समर्थन से चल रही थी, ने इन दंगों को रोकने के लिए कोई प्रयास नहीं किया।

1946-47 के सांप्रदायिक दंगे अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति, द्विराष्ट्र सिद्धांत, अंतरिम सरकार की असफलता और राजनीतिक विवादों से बढ़े। मुस्लिम लीग अब किसी भी कीमत पर पाकिस्तान चाहती थी। बंगाल के नोआखाली में भयानक दंगे हुए, इसके जवाब में बिहार, पंजाब और उत्तर प्रदेश में हजारों लोग मारे गए। सरकार मूक दर्शक की तरह बैठी रही, क्योंकि उन्हें समझ में आ गया था कि उनके पास पाकिस्तान बनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं जो इन दंगों को रोक सके। इन दंगों ने तय कर दिया कि भविष्य में हिंदू-मुस्लिम एक साथ रहना संभव नहीं है। गांधी जी, जो 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय कह रहे थे कि ‘मैं भारत की रेत से तूफान खड़ा कर सकता हूं’ हताश हो गए और कहने लगे कि ‘जब नेहरू-पटेल विभाजन चाहते हैं तो मैं क्या कर सकता हूं।‘ यह विवशता बताती है कि कहीं न कहीं लोगों ने हृदय से इस विभाजन को स्वीकार कर लिया था।

माउंटबेटन योजना

माउंटबेटन अंतिम वायसराय के रूप में भारत आए, जिनका उद्देश्य भारत का विभाजन करना था। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध 3 जून योजना प्रस्तुत की, जिसे विभाजन योजना और कुछ लोगों ने ‘मनबाटन योजना’ भी कह दिया। इस योजना के तहत भारत और पाकिस्तान का निर्माण कर दिया गया। असम के सिलहट जिले और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत में जनमत संग्रह की बात कही गई, जो अंत में पाकिस्तान में मिल गए। 3 जून की योजना को इंग्लैंड की संसद में मतदान के लिए 15 जुलाई को हाउस ऑफ़ कॉमंस में प्रस्तुत किया गया प्रस्तुत किया गया और 18 जुलाई को ब्रिटिश सम्राट के हस्ताक्षर हो गए। 18 जुलाई 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम पारित हो गया और भारत विभाजित हो गया।

विडंबना देखिए, भारत के 90% मुसलमानों ने 1945-46 में पाकिस्तान के पक्ष में वोट दिया, लेकिन जब बंटवारे के दौरान पाकिस्तान जाने की बारी आई, तो केवल लगभग 72 लाख मुसलमान (कुल मुस्लिम आबादी का 16-18%) भारत से पाकिस्तान गए। बाकी 82-84% मुसलमान भारत में ही रहे। तथाकथित सेक्युलर और वामपंथी लेखक विभाजन का भार हिंदुओं पर डालते हैं, परंतु सच तो यह है कि हिंदू और उनके संगठन राष्ट्र की रक्षा और बचाव के मुद्रा में रहे। हिंदू सदैव अखंड भारत के पक्ष में रहे।

हिंदुओं के लिए विभाजन अत्यंत कष्टकारी और दुखदाई रहा, क्योंकि उन्हें अपनी स्वतंत्रता और राष्ट्र को बचाने के लिए अंग्रेजों और मुसलमानों से संघर्ष करना पड़ा। हिंदुओं का चौतरफा नुकसान हुआ।

यदि वीर सावरकर, लोकमान्य तिलक, पंडित मदन मोहन मालवीय, डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार और माधव सदाशिव गोलवलकर ने इसकी पृष्ठभूमि को न समझा होता, तो परिणाम और भी गंभीर और घातक होते। विद्वानों का मत है कि यदि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 10 वर्ष पूर्व अर्थात् 1915 में हो गई होती, तो भारत का विभाजन संभव नहीं था।

Topics: विभाजन की विभीषिकाभारत का विभाजनविभाजनशिमलाजिन्नामाउंटबेटनपाञ्चजन्य विशेषराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
Share
Tweet
SendShareSend
Subscribe Panchjanya YouTube Channel
Download Panchjanya mobile apps: Google Play Store  / App Store

संबंधित समाचार

श्री मोहन भागवत, सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

Regime Change : ‘सत्ता परिवर्तन’ का वैश्विक खतरा और सरसंघचालक मोहन भागवत की चेतावनी

संजय गुप्त जी (प्रधान संपादक, दैनिक जागरण)

संघ नहीं होता तो हिन्दू जीवन-पद्धति का वर्तमान स्वरूप बचाना मुश्किल होता: संजय गुप्त

Sarsanghchalak Mohan Bhagwat Vijayadashmi

‘सस्ती लोकप्रियता के लिए समाज में फूट न डालें’- सरसंघचालक मोहन भागवत जी

Sarsanghchalak Mohan Bhagwat Vijayadashmi

सत्ता परिवर्तन के लिए बांग्लादेश, फ्रांस, नेपाल और अल्बानिया जैसी कोशिशें भारत में की जा रही हैं : श्री मोहन भागवत

संजय गुप्त जी (प्रधान संपादक, दैनिक जागरण)

तमाम विरोध और चुनौतियों के बीच कैसे आगे बढ़ता रहा संघ? जानिए

संजय गुप्त जी (प्रधान संपादक, दैनिक जागरण)

राजनीतिक महत्वाकांक्षा से पैदा हो रही सामाजिक बीमारी, हिंदू एकता और समरसता के लिए संघ जरूरी: संजय गुप्त

Load More

ताज़ा समाचार

श्री मोहन भागवत, सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

Regime Change : ‘सत्ता परिवर्तन’ का वैश्विक खतरा और सरसंघचालक मोहन भागवत की चेतावनी

आज का श्लोक : मनुष्य में प्रगति की राह में सबसे बड़ी बाधा ‘आलस्य’ है

आज का राशिफल

आज का राशिफल: जानें सभी 12 राशियों का भविष्यफल

कल का पंचांग

कल का पंचांग: तुला राशि में सूर्य, बुध और शुक्र की युति, जानें लग्न परिवर्तन और दिशाशूल का समय

संजय गुप्त जी (प्रधान संपादक, दैनिक जागरण)

संघ नहीं होता तो हिन्दू जीवन-पद्धति का वर्तमान स्वरूप बचाना मुश्किल होता: संजय गुप्त

Sarsanghchalak Mohan Bhagwat Vijayadashmi

‘सस्ती लोकप्रियता के लिए समाज में फूट न डालें’- सरसंघचालक मोहन भागवत जी

Sarsanghchalak Mohan Bhagwat Vijayadashmi

सत्ता परिवर्तन के लिए बांग्लादेश, फ्रांस, नेपाल और अल्बानिया जैसी कोशिशें भारत में की जा रही हैं : श्री मोहन भागवत

Dr Mohan Bhagwat Warning On AI

वंदे मातरम आज भी देता है एकता की प्रेरणा: सरसंघचालक मोहन भागवत

सरसंघचालक श्री मोहन भागवत का उद्बोधन: “हिंदू भाव में पूरे विश्व को जोड़ने की शक्ति है”

प्रतीकात्मक तस्वीर

दशहरा 2026: रावण दहन से नहीं, अपने भीतर की बुराइयों पर विजय से सार्थक होगा विजयादशमी का पर्व

Load More
  • Privacy
  • Terms
  • Cookie Policy
  • Refund and Cancellation
  • Delivery and Shipping

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies

  • Search Panchjanya
  • होम
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • सामाजिक समरसता
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • पर्यावरण
      • नागरिक कर्तव्य
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विभाजन-विभीषिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
    • सुशासन संवाद
    • सागर मंथन
    • मुंबई संकल्प
    • अष्टायाम
    • गुरुकुलम
    • साबरमती संवाद
    • आधार इन्फ्रा
  • वेब स्टोरी
  • ऑपरेशन सिंदूर
  • विश्लेषण
  • लव जिहाद
  • खेल
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • स्वास्थ्य
  • धर्म-संस्कृति
  • पर्यावरण
  • बिजनेस
  • साक्षात्कार
  • शिक्षा
  • रक्षा
  • कला-साहित्य
    • पुस्तकें
    • पुस्तक समीक्षा
  • सोशल मीडिया
  • विज्ञान और तकनीक
  • मत अभिमत
  • श्रद्धांजलि
  • संविधान
  • आजादी का अमृत महोत्सव
  • पॉडकास्ट
  • पत्रिका
  • हमारे लेखक
  • Read Ecopy
  • प्रसार विभाग – Circulation
  • About Us
  • Contact Us
  • Careers @ BPDL
  • Advertise
  • Privacy Policy

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies