यह श्लोक राष्ट्रभक्ति और सामाजिक दायित्व की भावना को रेखांकित करता है। इसका अर्थ और भावार्थ इस प्रकार है:
स्वदेशे कष्टमापन्ने उदासीनास्तु ये नराः।
नैव च प्रतिकुर्वन्ति, ते नराः शत्रुनन्दनाः॥
भावार्थ :
जब देश संकट में पड़ा हो, तब जो लोग उदासीनभाव से दूर खड़े देखते हैं और प्रतिकार का कोई प्रयास नहीं करते, वे शत्रुओं को ही आनन्द देने वाले होते हैं, अर्थात् उनको देखकर शत्रुओं को बड़ी प्रसन्नता होती है।

















