गत 30 सितंबर को मुंबई के ऐतिहासिक ताज होटल में आयोजित पाञ्चजन्य के छत्रपति संवाद ने भारत की उद्यमिता, स्वदेशी, सेवा, संस्कार और राष्ट्रीय संकल्प की यात्रा को समझने का अवसर दिया। यह स्थान आधुनिक भारतीय उद्यम और आत्मविश्वास का प्रतीक है। जमशेदजी टाटा की कल्पना से 1903 में आकार लेने वाला ताज भारतीय उद्यम की विश्वस्तरीय आकांक्षा का उदाहरण था। 26 नवंबर 2008 के आतंकी हमलों में यही होटल आतंक की भयावहता और भारतीय दृढ़ता का साक्षी बना। आघात कितने भी गहरे हों, षड्यंत्र कितने भी बड़े हों, भारत रुकता नहीं है। यही भावना इस आयोजन के मूल में रही।
2022 में इसी स्थान पर मुंबई संकल्प के नाम से पहले कार्यक्रम का आयोजन हुआ था। इस विचार को आगे बढ़ाने से पहले रतन टाटा जी से भी चर्चा हुई थी। टाटा समूह की यात्रा केवल एक उद्योग घराने की कहानी नहीं। उसमें राष्ट्र निर्माण की बड़ी दृष्टि दिखाई देती है। 1893 में जमशेदजी टाटा और स्वामी विवेकानंद की समुद्री यात्रा के दौरान हुई भेंट ने भारत में वैज्ञानिक अनुसंधान की आवश्यकता पर संवाद को आगे बढ़ाया। जमशेदजी के बड़े स्वप्नों में भारतीय इस्पात उद्योग, जलविद्युत, विज्ञान संस्थान और विश्वस्तरीय होटल शामिल थे। ताज में विद्युत संयंत्र, बिजली से चलने वाली लिफ्ट और वैकल्पिक विद्युत व्यवस्था जैसी सुविधाएं थीं। यह केवल होटल नहीं, भारतीय उद्यमशीलता और आत्मविश्वास का प्रतीक भी बना।
पाञ्चजन्य के संवाद समागम दूसरे मीडिया सम्मेलनों से इस अर्थ में अलग हैं कि उनका उद्देश्य केवल चर्चा करना या सुर्खियां बनाना नहीं है। इनका लक्ष्य समाज के भीतर चल रहे प्रश्नों को मंच देना और भविष्य के भारत से जुड़ी जिज्ञासाओं पर बातचीत करना है। सत्ता और राजनीति से आगे समाज की आकांक्षाओं, पहचान और उसके सामने खड़ी चुनौतियों को समझना भी जरूरी है। समाज को खांचों में बांटने के बजाय उन प्रश्नों के उत्तर खोजना जरूरी है, जिनसे सामूहिक समझ विकसित हो सके। इसी क्रम में गुजरात, भुवनेश्वर, जयपुर और छत्तीसगढ़ सहित देश के अलग अलग हिस्सों में पाञ्चजन्य ने संवाद के मंच सजाए हैं।
मुंबई में आयोजित छत्रपति संवाद भी इसी यात्रा की महत्वपूर्ण कड़ी रहा। इसमें भविष्य के भारत, राष्ट्रीय विचार, सामाजिक बदलाव, मनोरंजन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे विषयों पर विचार विमर्श हुआ। 2047 तक भारत कैसा होगा और विकसित भारत के संकल्प को साकार करने में समाज की क्या भूमिका होगी, यह चर्चा का प्रमुख विषय था। अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मशताब्दी वर्ष के संदर्भ में उनके विचारों और पाञ्चजन्य के प्रथम संपादक के रूप में उनकी भूमिका को स्मरण करने का अवसर भी मिला। 14 जनवरी 1948 को आरंभ हुए पाञ्चजन्य से उनका जुड़ाव उस पत्रकारिता की याद दिलाता है, जिसमें समाचार के साथ राष्ट्रीय जीवन के प्रश्न भी महत्वपूर्ण रहे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष में उसकी यात्रा और उसे लेकर उठने वाले प्रश्नों पर संवाद की आवश्यकता भी सामने आई।
आज मनोरंजन जगत केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है।
सिनेमा और ओटीटी जैसे माध्यम समाज की संवेदना को प्रभावित करते हैं, नई धारणाएं गढ़ते हैं और पहचान को देखने का नजरिया भी बदलते हैं। इसलिए नए सिनेमा की दिशा, रचनात्मक स्वतंत्रता और ओटीटी से जुड़ी सामाजिक जिम्मेदारी पर विचार जरूरी है। इसी तरह शिक्षा और स्वास्थ्य समाज की दो बुनियादी आवश्यकताएं हैं, जिनसे हर परिवार का भविष्य जुड़ा है। प्रश्न यह है कि क्या इन्हें केवल लाभ की दृष्टि से देखा जाए, या भारत की सेवा परंपरा, सामाजिक दायित्व और लोककल्याण की भावना को भी केंद्र में रखा जाए। शिक्षा समाज के प्रबोधन का माध्यम है, जबकि स्वास्थ्य पीड़ा में खड़े मनुष्य की सेवा का क्षेत्र है। व्यक्ति और समाज के कल्याण को साथ देखने की यही दृष्टि भारतीय चिंतन का आधार रही है।
छत्रपति संवाद में सत्ता, सेवा, संस्कार और संघ जैसे विषयों को एक ही मंच पर लाने का प्रयास इसी व्यापक सोच का हिस्सा रहा। विभिन्न क्षेत्रों में अपने कार्य से पहचान बनाने वाले अनुभवी लोगों ने इन विषयों पर विचार रखे। उद्देश्य किसी एक निष्कर्ष को दोहराना नहीं, बल्कि जिज्ञासाओं को समझना, प्रश्नों पर खुलकर चर्चा करना और सामाजिक विमर्श को अधिक सार्थक बनाना रहा।
भारत की यात्रा केवल अतीत के गौरव की कहानी नहीं है। यह उन संकल्पों की यात्रा भी है, जो कठिन परिस्थितियों में लिए गए और जिन्हें पीढ़ियों ने अपने परिश्रम, सेवा और समर्पण से आगे बढ़ाया। मुंबई का ताज होटल इस यात्रा का सजीव प्रतीक है। उसके इतिहास में उद्यम का स्वप्न भी है, आतंक का आघात भी और पुनरुत्थान की शक्ति भी। इसी ऐतिहासिक स्थल पर आयोजित पाञ्चजन्य का छत्रपति संवाद अतीत की प्रेरणा से वर्तमान के प्रश्नों को समझने और भविष्य के भारत की दिशा पर सहज संवाद करने का प्रयास रहा।

















