पीढ़ी के लिए लगाओ पेड़पर्यावरण संरक्षण : पीढ़ी के लिए लगाओ पेड़
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पर्यावरण संरक्षण : पीढ़ी के लिए लगाओ पेड़

प्रकृति संरक्षण के प्रति जनचेतना जगाने के लिए जुलाई महीने में पूरे देश में प्रतिवर्ष बड़े पैमाने पर वन महोत्सव के आयोजन किए जाते हैं। इसका लक्ष्य देशवासियों को अधिक से अधिक पेड़ लगाने के लिए प्रोत्साहित करना है, ताकि विकास के नाम पर कटने वाले पेड़-पौधों की भरपाई हो सके

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
Jul 21, 2026, 12:19 pm IST
inविश्लेषण, पर्यावरण, उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वृक्षारोपण करते हुए

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वृक्षारोपण करते हुए

यह अच्छी बात है कि भारत में पौधारोपण निरंतर चलता रहता है। इस कड़ी में उत्तर प्रदेश का उल्लेख करना आवश्यक है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासनकाल में 2017 से 2025 के मध्य उत्तर प्रदेश में 242 करोड़ पौधे लगाए गए हैं। यह कीर्तिमान है। इस विशाल अभियान से राज्य के हरित आवरण में ऐतिहासिक वृद्धि हुई है। निःसंदेह ऐसे आयोजन पर्यावरण संरक्षण के प्रति सरकारी उत्तरदायित्व के सफल निर्वहन का प्रतीक हैं। पर समझने वाली बात यह है कि क्या ऐसे आयोजनों का उद्देश्य केवल वृक्षों की पौध लगाने तक ही सीमित होना चाहिए! कई सर्वेक्षण इस बात की पुष्टि करते हैं कि प्रतिवर्ष रोपे गए पौधों में आधे से अधिक उचित देखरेख के अभाव में दम तोड़ देते हैं। इसलिए इस पर विचार अवश्य होना चाहिए।

पर्यावरण संरक्षण का शुभारंभ

सिंधु घाटी की सभ्यता में प्राप्त मुहरों पर अंकित चित्रों से स्पष्ट है कि सिंधु घाटी के निवासी वृक्षों की पूजा किया करते थे। देश में वृक्षारोपण द्वारा पर्यावरण संरक्षण का शुभारंभ करने का श्रेय ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में सम्राट अशोक को जाता है। अशोक के शिलालेखों से ज्ञात होता है कि उन्होंने प्रकृति की महत्ता को स्वीकारते हुए न केवल मंदिर व धार्मिक स्थलों तथा राजमार्गों पर बड़े पैमाने पर त्रिवेणी- (पीपल, बरगद, नीम), पंचवटी (नीम, पीपल, बरगद, जामुन, आंवला) और हरिशंकरी (बरगद, पीपल, पाकड़) का वृक्षारोपण कराया था, वरन् वन्य जीव-जंतुओं के शिकार पर प्रतिबंध लगाया था। बताते चलें कि पर्यावरण संरक्षण के तहत बीती सदी में हुए उत्तराखंड का चिपको आंदोलन और राजस्थान का विश्नोई आंदोलन आज भी पर्यावरण-प्रेमियों को उत्साहित करता है।

वन महोत्सव अभियान

देश में वृक्षारोपण अभियान की शुरुआत 1947 में वनस्पति शास्त्री एमएस रंधावा द्वारा की गई थी। इसके बाद 1950 में खाद्य और कृषि मंत्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने इस आयोजन को वन महोत्सव सप्ताह का रूप देकर इसके लिए प्रतिवर्ष जुलाई का पहला सप्ताह निर्धारित किया। इस आयोजन का लक्ष्य देशवासियों को अधिक से अधिक पेड़ लगाने के लिए प्रोत्साहित करना था; ताकि औद्योगिकीकरण के लिए कटने वाले पेड़-पौधों की भरपाई हो सके। पर इस अभियान की असलियत आज हम सबके सामने है।

पहचान नहीं पा रहे पेड़ को

सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्तमान में देश में 33 प्रतिशत वन क्षेत्र के मानक के इतर मात्र 24.62 प्रतिशत में ही वन मौजूद हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों की मानें तो देश में वनों का प्रतिशत संतोषजनक न होने का प्रमुख कारण उचित देखरेख का अभाव और वृक्ष-वनस्पतियों की प्रकृति (स्वभाव) के प्रति आधारभूत समझ न होना है।
समझना होगा कि प्रत्येक प्रजाति के पेड़-पौधों का अपनी प्रकृति के अनुरूप एक नियत स्थान की जलवायु और मिट्टी-पानी से एक गहरा जुड़ाव होता है। इन नियमों का ध्यान रखने पर ही पौधे सही तरह से पनप पाते हैं।

पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से किस क्षेत्र में कौन-सी प्रजाति के पौधे रोपने चाहिए; आजादी के बाद हुए पौधरोपण कार्यक्रमों में इस गंभीर विषय पर विचार ही नहीं किया गया। उत्तराखंड का उदाहरण हमारे सामने है। देश की जानी-मानी पर्यावरण विज्ञानी सुनीता नारायण के अनुसार, ”पांच दशक पहले हिमालय की तलहटी में घटते वनों की चिंता में हजारों हेक्टेयर भूमि में सागौन का वनीकरण करते समय यह बड़ी चूक हुई थी। सागौन मूल रूप से दक्षिण भारत का वृक्ष है जहां की ऊष्ण जलवायु इसकी पारिस्थितिकी को नियंत्रित करती है।

आज हिमालयी वातावरण में सागौन के वनों के कारण वहां की पर्यावरणीय पारिस्थितिकी अस्त-व्यस्त हो गई है। इसी तरह मध्य हिमालय में चीड़ व मैदानी क्षेत्रों में यूकेलिप्टस जैसी प्रजातियों की भरमार की प्रमुख वजह पर्यावरण पोषण के बजाय इनका आर्थिक उपयोग ज्यादा है। जहां हिमालय के वनों की आग के लिए सबसे ज्यादा घातक चीड़ है, वहीं मैदानी क्षेत्रों में यूकेलिप्टस पानी का दुश्मन बना हुआ है। वनों के आर्थिक लाभ से इतर इनसे प्राप्त शुद्ध प्राणवायु तथा मिट्टी व भूजल संचयन आदि पर्यावरण शुद्धि के योगदान का कोई सीधा आंकड़ा तैयार नहीं किया जाना वाकई चिंतनीय है।

आर्थिक लाभ ही वन शिक्षा का केंद्र

खेद की बात है कि घोर पर्यावरणीय संकट के वर्तमान समय में भी वनों के आर्थिक लाभ ही वन शिक्षा का केंद्र बने हुए हैं। इस अनदेखी का नतीजा है कि देश में 1988 से लेकर 2010 तक तकरीबन 1200 करोड़ हेक्टेयर वनों का सफाया हो चुका है। समझना होगा कि हर तरह के विकास की मूल जड़ें पारिस्थितिकी से ही जुड़ी होती हैं।

वर्षा के पानी का सबसे उम्दा संरक्षण वनों से ही संभव है। हवा, पानी और हमारे भोजन का सर्वाधिक नाता पेड़-पौधों से ही है। इसलिए पेड़ काटने का अर्थ है पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर कुल्हाड़ी चलाना। यह धरती केवल हमारे रहने के लिए ही नहीं है, असंख्य जैव-अजैव जीवों, पशु-पक्षियों तथा पेड़-पौधों, वनस्पतियों के लिए भी है। पक्षियों को बसेरा देने वाले वृक्षों की बहुत सी ऐसी प्रजातियां हैं, जो पक्षियों के पेट से निकले बीजों से ही पनपती हैं। धरती का असली श्रृंगार ही ये पेड़-पौधे हैं। जितने ये कम होंगे, उतना ही जीवन पर संकट गहराता जाएगा।

प्राणदायी वृक्ष-वनस्पतियां

हम भारतीयों की सनातन संस्कृति का विकास वन प्रांतों में ही हुआ है। इसीलिए भारतीय संस्कृति ‘अरण्य संस्कृति’ कहलाती है। हमारा समूचा वैदिक साहित्य वृक्ष-वनस्पतियों की महिमागान से भरा पड़ा है। वेदों का स्पष्ट संदेश है कि मानव शुद्ध प्राणवायु में श्वास ले, शुद्ध जलपान करे, शुद्ध अन्न-फल का आहार ग्रहण करे, शुद्ध मिट्टी में खेले-कूदे और कृषि करे, तब ही वेद प्रतिपादित उसकी आयु ‘जीवेम् शरदः शतम्’ हो सकती है। वैदिक चिंतन कहता है कि वृक्ष-वनस्पतियां तो भगवान नीलकंठ का ही रूप हैं, क्योंकि वे हमारे द्वारा निष्कासित विषेली गैसों को पीकर हमारे जीवित रहने के लिए अमृतमयी प्राणवायु हमें देते हैं। अतः वृक्षों को सींचना भगवान सदाशिव को जल चढ़ाने के समान है। ज्ञात हो कि हमारे वैदिक ऋषियों ने वृक्ष पूजा और प्रार्थना के जो नियम-उपनियम बनाए थे उनके पीछे मूल भावना पर्यावरण संरक्षण की ही थी। वैदिक शांतिपाठ में ‘औषधय: शांति वनस्पतय: शांति:’ जैसे उद्घोष इसी का प्रमाण हैं। हमारा संपूर्ण आयुर्वेद विज्ञान प्रकृति की इसी देन पर आधारित है।

ऋषियों द्वारा वन में रहते हुए धर्मग्रंथों की रचना करने का मूल कारण वहां का शांत और सुरम्य वातावरण था, जो न केवल सृजन करते समय उनके मन को एकाग्र रखने में सहायक होता था, अपितु उनके आवास व आहार का प्रबंध भी इन वनों से सहज ही हो जाता था। इन वृक्ष-वनस्पतियों के जलमातायें भी स्वच्छ व सदानीरा रहती थीं। यही नहीं, इनके फूलों या लताओं के रस से स्याही व लकड़ी से कलम बनाकर ऋषिगण भोजपत्र पर अपनी रचनाएं लिपिबद्ध करते थे। विष्णु पुराण में एक वृक्ष लगाना 100 पुत्रों की प्राप्ति से बढ़कर माना गया है। तिलक के लिए चन्दन सर्वमान्य है।

पुराकाल में यदि अपरिहार्य कारणों से किसी वृक्ष को काटना पड़ता था तो वृक्ष से क्षमा मांगने का प्रावधान था। पीपल और बरगद को काटना ब्रह्म हत्या के समान माना गया है। अनेक पेड़ों के संबंध विभिन्न देव शक्तियों से जोड़े गए हैं। जैसे पीपल को विष्णु, बरगद को भगवान शंकर और पाकड़ को ब्रह्मदेव का प्रतीक कहा गया है। कदम्ब को कृष्ण का, तुलसी को विष्णुप्रिया और नीम को निमारी देवी की संज्ञा दी गई है। जिस वृक्ष पर पक्षियों के घौसले हों तथा जो देवालय और श्मशान भूमि पर खड़े हों, वेदों में उन्हें न काटने की सख्त हिदायत दी गई है।

उतारें प्रकृति का कर्ज

‘लोक भारती’ नामक संस्था बीते तीन दशक से पर्यावरण संरक्षण की दिशा में जन जागरूकता फैलाने में जुटी हुई है। संस्था के अखिल भारतीय संगठन मंत्री बृजेंद्रपाल सिंह कहते हैं, “भारतीय संस्कृति का मूल सूत्र है–हम प्रकृति से हैं, प्रकृति हम से नहीं। हम समाज के लोगों में यही मूल भाव विकसित करते हैं। ‘लोक भारती’ लोगों को भारत की उन सनातन परंपराओं को अपनाने को प्रेरित करती है, जो आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर पूरी तरह खरी हैं।” वे कहते हैं, “लोक भारती का मूल लक्ष्य समाज के लोगों को पर्यावरण संरक्षण के साथ भारतीय संस्कृति की उन उन्नत जीवन-मूल्यों को अपनाने को उत्प्रेरित करना है जिन पर चलकर सदियों पहले भारत विश्वगुरु बना था।”

वे कहते हैं, “हम प्रकृति से ऑक्सीजन लेते हैं, यह प्रकृति का कर्ज है हम पर। इस कर्ज को उतारने के लिए क्या हमने पौधा लगाया! क्या हमने अपने पूर्वजों की स्मृतियों को जीवंत रखने के लिए पेड़ लगाए! इसके लिए हम लोगों में जागृति पैदा करते हैं और उनको वृक्षारोपण अभियान से जोड़ते हैं। अपने मंगल वाटिका रोपण अभियान के तहत हम लोगों को ‘हरिशंकरी’, ‘पंच पल्लव’ और ‘आरोग्यत्रयी’ के रोपण को प्रोत्साहित करते हैं। ‘हरिशंकरी’ के तहत पीपल, बरगद और पाकड़ ये तीन पौधे ‘एक ही थाले’ में लगाए जाते हैं।” वृक्षायुर्वेद के अनुसार ये तीनों पौधे सनातन धर्म की तीन प्रतिनिधि शक्तियों ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश के प्रतीक माने गए हैं।

इनमें पीपल भगवान विष्णु का स्वरूप माना गया है, यह साधना का वृक्ष है। भगवान बुद्ध को इसी वृक्ष के नीचे संबोधि (बुद्धत्व) प्राप्त हुआ था। पीपल सर्वाधिक प्राणवायु देने वाला तथा जीव-जंतुओं को वर्ष भर भोजन उपलब्ध कराने वाला वृक्ष है। इस त्रयी में दूसरा पौधा है बरगद। यह भगवान शिव का स्वरूप है। बरगद को कभी क्षय न होने के कारण ‘अक्षय वट’ भी कहते हैं। इसमें जल संग्रहण की अपार क्षमता होती है। तीसरा पौधा है पाकड़। संस्कृत में इसे ‘प्लक्ष’ कहते हैं। यह ब्रह्माजी का प्रतीक है।

इसे घर के उत्तर दिशा में लगाना बहुत शुभ माना गया है। यह वृक्ष छाया, वर्षाजल संचयन, जीव-जंतुओं को आश्रय एवं भोजन उपलब्ध कराता है। इसी तरह ‘पंच पल्लव’ रोपण के तहत भगवान राम के वनवास काल के आश्रयस्थल पंचवटी के प्रमुख वृक्षों- पीपल, बरगद, अशोक, बेल तथा आंवला को रोपित कराया जाता है। इसी तरह ‘आरोग्यत्रयी’ समूह के तीन पौधे हैं- नीम, जामुन और सहजन। इनके नाम से ही इनकी औषधीय महत्ता परिलक्षित होती है।

Topics: नीमप्राणवायुबेलवैदिक चिंतनअशोकवृक्षायुर्वेदपर्यावरण संरक्षणवन महोत्सववृक्षारोपणचिपको आंदोलनपारिस्थितिकी तंत्रमंगल वाटिका रोपणपंचवटीजामुनपाञ्चजन्य विशेषपीपलआंवलाबरगद
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