देहरादून जिले की कालसी तहसील स्थित हरिपुर में यमुना तट पर प्राचीन तीर्थ की स्मृतियां फिर आकार ले रही हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हरिपुर घाट का लोकार्पण, मां यमुना की 21 फीट ऊंची प्रतिमा का अनावरण और यमुना-कृष्ण मंदिर का शिलान्यास किया। हरिपुर और आसपास के हनोल, मैन्द्रथ, ठडियार, लाखामंडल, कालसी तथा जगतग्राम जैसे स्थल क्षेत्र की धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत से जुड़े रहे हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में चारधाम यात्रा का एक प्रमुख मार्ग हरिपुर से जुड़ा था और यमुना स्नान के बाद ही यात्रा पूर्ण मानी जाती थी।
मथुरा से हस्तिनापुर और कुरुक्षेत्र होते हुए तीर्थयात्री हरिपुर पहुंचते तथा यमुना जल लेते थे। इसी धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को देखते हुए लोक पंचायत ने 2016 में हरिपुर के पुनर्विकास की परिकल्पना की थी। इसमें हरिद्वार की तर्ज पर घाट निर्माण, मां यमुना की प्रतिमा व भव्य मंदिर, यमुना आरती, कुलदेवताओं का कुंभ स्नान, छह वर्ष में धार्मिक मेले, यमुनोत्री यात्रा का हरिपुर से प्रारंभ, हरिपुर धाम का पुनर्निर्माण, आसपास के तीर्थस्थलों का जीर्णोद्धार तथा कांवड़ यात्रा का यमुना तक विस्तार शामिल था। इनमें से कई कार्य पूरे हो चुके हैं और शेष कार्यों को आगे करने की योजना है।
जौनसार-बावर की तलहटी में बसा हरिपुर रामायण काल के यामुन देश, महाभारतकालीन कुलिंद और बाद के जौनसार-बावर क्षेत्र से जुड़ा माना जाता है। जिस प्रकार गंगा का प्रमुख तीर्थ हरिद्वार है, उसी प्रकार हरिपुर को यमुना का प्रथम प्रमुख घाट माना जाता है। यहां यमुना, अमलावा, नौरा और टौंस (तमसा) नदियों का संगम क्षेत्र बनता है, जिस कारण इसे पवित्र एवं यज्ञ क्षेत्र माना गया; इसकी धार्मिक परिधि लाखामण्डल तक बताई जाती है। हरिपुर में यमुना को बालरूप में प्रवाहित माना जाता है।
जौनसार-बावर की तलहटी में स्थित हरिपुर को रामायणकालीन यामुन देश, महाभारतकालीन कुलिंद और बाद के जौनसार-बावर क्षेत्र से जुड़ा माना जाता है। गंगा के लिए हरिद्वार की तरह इसे यमुना का प्रथम प्रमुख घाट कहा जाता है। यहां यमुना, अमलावा, नौरा और टौंस (तमसा) नदियों का संगम क्षेत्र है, इसलिए इसे पवित्र यज्ञ-क्षेत्र माना गया। इसकी धार्मिक परिधि लाखामण्डल तक बताई जाती है। हरिपुर में यमुना को बालरूप में प्रवाहित माना जाता है।

यज्ञ और सांस्कृतिक विरासत
हरिपुर के निकट जगतग्राम में तीन गरुड़ाकार अश्वमेध यज्ञ-वेदिकाएं मिली हैं। बाड़वाला और अम्बाड़ी में भी ऐसी वेदिकाओं का उल्लेख है। शीलवर्मन द्वारा जगतग्राम-बाड़वाला क्षेत्र में अश्वमेध यज्ञ कराने का उल्लेख मिलता है तथा पुराणों में इसे ‘हरी क्षेत्र’ कहा गया है।
अपने यात्रा वृत्तांत में चीनी यात्री ह्वेनत्सांग ने हरिपुर के वैभव, बौद्ध मठों और मंदिरों का वर्णन किया है। कल्प ऋ षि मंदिर, ‘अशोक की लाठ’ और बुद्धपुरी जैसे स्थल इसकी प्राचीन धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान के संकेत हैं। स्थानीय मान्यता है कि गुरु गोविंद सिंह कल्प
ऋ षि से मिलने हरिपुर आए थे। हरिपुर कुलिंद, कुलुथ (कुल्लू) और त्रिगत (कांगड़ा) के बीच संपर्क-केंद्र भी रहा। चार नदियों के संगम और तिब्बत तक व्यापारिक मार्गों के कारण यहां व्यापार होता था। तिब्बत से स्वर्ण चूर्ण व रांगा आता था, जबकि नमक और खाद्यान्न वहां भेजे जाते थे।
परंपरा से जुड़ा क्षेत्र
लाखामण्डल पांडवों के अज्ञातवास से जुड़ा माना जाता है। अज्ञातवास के दौरान वेदव्यास पांडवों से मिलने तीन बार इस क्षेत्र में आए थे। हरिपुर के निकट व्यासभूड़ को उनकी साधना-स्थली माना जाता है। कुल्लू से हाटकोटी, हनोल और कथियान होते हुए गोराघाटी तथा लाखामण्डल के रास्ते केदारनाथ जाने की परंपरा भी इस क्षेत्र से जुड़ी है। लाखामण्डल के निकट भटाड़ गांव में केदारनाथ शैली का मंदिर है और मान्यता है कि केदारनाथ जाने से पहले पांडवों ने वहां कई दिन बिताए थे।
आज लाखामण्डल शिवनगरी के रूप में प्रसिद्ध है और यहां अनेक शिवलिंग हैं। हरिपुर को यमुनोत्री और जौनसार-बावर का प्रवेश द्वार माना जाता है। एक मार्ग यमुना के साथ यमुनोत्री की ओर जाता है, जबकि दूसरा टौंस नदी से त्यूनी और हनोल के महासू मंदिर तक पहुंचता है। हनोल से जुड़ी महासू देवताओं और किरमिर राक्षस की कथा क्षेत्र की प्रमुख धार्मिक परंपरा है। महाभारत में यमुना के नाम कालिंदी से जुड़े होने के कारण इसे कुलिंद कहा गया। बाद में यह सिरमौर रियासत का प्रमुख केंद्र रहा और लगभग 200 वर्षों तक कालसी-हरिपुर क्षेत्र राजधानी माना गया।
तीर्थ, संस्कृति और रोजगार
यदि हरिपुर, आसपास के तीर्थों को समग्र धार्मिक-सांस्कृतिक परिपथ के रूप में विकसित किया जाए, तो यमुनोत्री, जौनसार-बावर, हनोल, लाखामण्डल, कालसी और जगतग्राम को इससे जोड़ा जा सकेगा। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था, हस्तशिल्प, परिवहन, आतिथ्य और पर्यटन से जुड़े रोजगार को गति मिल सकती है। यमुना तट पर हरिपुर का पुनरुत्थान केवल घाट या मंदिर निर्माण की कहानी नहीं, बल्कि एक ऐसे प्राचीन तीर्थ की स्मृति को पुनर्जीवित करने का प्रयास है, जो कभी धर्म, संस्कृति, व्यापार और यात्रा का महत्वपूर्ण केंद्र था।
















