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शौर्य की प्रतीक अनूठी विरासत

उत्तर प्रदेश में बलिया की धरती पर हर बारहवें वर्ष होने वाली लाठी पूजा की अनूठी परम्परा आज भी शौर्य, आस्था और लोकजीवन के अद्वितीय संगम का संदेश देती है

Written byमहंत कौशलेन्द्र गिरिमहंत कौशलेन्द्र गिरि
Jul 14, 2026, 01:22 pm IST
inउत्तर प्रदेश
लाठियां लेकर परिक्रमा करते श्रद्धालु

लाठियां लेकर परिक्रमा करते श्रद्धालु

बलिया जिले की रसड़ा तहसील के 14 कोस लखनेश्वर परगना में जब सैकड़ों गांवों से केसरिया पताका के साथ लाखों लोग सड़कों पर अपने हाथों में लाठियां लेकर एक साथ उन्हें बजाते हुए निकलते हैं, तो ऐसा लगता है मानो पुराने जमाने की तरह लोग युद्ध के लिए निकले हों। मुगलों के समय से चली आ रही यह परम्परा 500 वर्ष पुरानी है।

जब मुगलों ने जजिया कर लगाया, तब उस समय के सिद्ध योगी सन्त श्री नाथ बाबा ने लोगों का आह्वान किया कि कोई भी जजिया नहीं देगा। यदि मुगल गांवों में आएं, तो अपने पारंपरिक हथियार लाठियों से उनका सामना करें। बाद में जब अग्रेजों का अत्याचार बढ़ा तो लाठी चलाने की विद्या में निपुण लोग अपने गांवों की पगडंडियों पर निकल पड़े। वे समूह बनाकर लाठियां बजाने लगे। इसके बाद अंग्रेज उनका पराक्रम देखकर भाग खड़े हुए। इसी सनातनी परम्परा का निर्वाह आज भी किया जा रहा है।12 वर्ष में लाठी एवं रोट पूजा का समारोह आयोजित होता है। श्री नाथ बाबा का मन्दिर रसड़ा में स्थापित है। इसके अलावा पांच अन्य मठ भी बने हुए हैं। मान्यता है कि सिद्ध योगी श्री नाथ अपने आध्यात्मिक तेज, करुणा और सिद्धियों के कारण जनमानस में पूजनीय हुए। श्री नाथ जी का संबंध सेंगर वंश की गौरवशाली परम्परा से रहा है, जिसने समय-समय पर धर्म, सनातन संस्कृति और स्वाभिमान की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जजिया कर के विरोध में तथा धार्मिक आजादी के लिए उनका संघर्ष उल्लेखनीय है।

हर बारहवें वर्ष होने वाली इस लाठी पूजा में देश के गणमान्य लोग, जैसे पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर, पूर्व केन्द्रीय मंत्री कल्पनाथ राय एवं वर्तमान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय व्यक्तित्व शामिल होते रहे हैं। मुगलों के जजिया कर का विरोध करते हुए अपनी लाठी के बल पर उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया गया। तभी से लाठी को शौर्य और सुरक्षा के प्रतीक के रूप में पूजने की परम्परा चली आ रही है।

इस वर्ष 29 जून को सम्पन्न हुई पूजा में 14 कोस (करीब 42 किलोमीटर) के दायरे में 200 से अधिक गांवों से लाखों की संख्या में श्रद्धालु अपने हाथों में पारंपरिक लाठियां लेकर परिक्रमा करते हैं। इसके बाद जब हवा में लाठियां लहराते हुए आपस में टकराती हैं, तब उनकी तरतराहट से पूरा वातावरण गूंज उठता है। नाथ बाबा की भव्य परिक्रमा के पश्चात भक्त लाठी को बाबा का प्रिय अस्त्र और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का प्रतीक मानकर मन्दिर के सामने टेकते हैं तथा आशीर्वाद लेते हैं। इस महापूजा के दौरान 251 कुंतल से लेकर 551 कुंतल तक ‘रोट’ महाप्रसाद तैयार किया जाता है, जो सभी भक्तों में वितरित किया जाता है।

रसड़ा के मुख्य नाथ बाबा मठ में एक और परम्परा चली आ रही है। यहां हर वर्ष विशाल रामलीला का आयोजन होता है, जो बनारस के रामनगर की रामलीला के बाद दूसरी वृहद रामलीला मानी जाती है। यह दिन के उजाले में आयोजित होती है। इसी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्ता के कारण इसे छोटी काशी भी कहा जाता है। आज यह मठ श्रद्धा, आस्था, सेवा एवं सनातन संस्कृति का प्रमुख केन्द्र बना हुआ है। सदियों से यह स्थान धर्म, सदाचार, लोकसेवा और मानवीय मूल्यों की प्रेरणा देता आ रहा है। यह केवल बलिया ही नहीं, बल्कि पूरे पूर्वांचल की समृद्ध सनातन सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत का जीवंत प्रतीक बना हुआ है।

Topics: छोटी काशी रसड़ासनातनी परंपरापाञ्चजन्य विशेषनाथ बाबा परिक्रमालाठी पूजा बलियाश्री नाथ बाबा मठ रसड़ामहंत कौशलेन्द्र गिरि14 कोस लखनेश्वर परगनासेंगर वंशपूर्वांचल की विरासतरोट महाप्रसादरसड़ा की रामलीला
महंत कौशलेन्द्र गिरि
महंत कौशलेन्द्र गिरि
महामंडलेश्वर, श्री नाथ बाबा मठ [Read more]
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