क्या आप कभी सोच सकते हैं कि गाजा में मुसलमान महिलाओं पर अत्याचार होंगे, उनके साथ बलात्कार और जबरन निकाह होंगे, और उस पर विमर्श में चुप्पी होगी? इतनी चुप्पी कि उसकी खबर अगर कोई लिखे, तो वह किसी दूसरे ही ग्रह की खबर लगे? मगर गाजा की महिलाओं के साथ ऐसा हो रहा है। उनके साथ अत्याचार, बलात्कार और लगातार यौन शोषण हो रहा है, वे इसके चलते गर्भवती भी हो रही हैं, और उनका अपने आप गर्भपात भी हो रहा है या फिर समय पूर्व प्रसव हो रहा है।
अब यह प्रश्न उठता है कि यह सब कर कौन रहा है? वे कौन सी ताकतें हैं, जो गाजा की मुसलमान लड़कियों के साथ यह सब कर रही हैं और उसके बाद भी वैश्विक फेमिनिस्ट मौन हैं? ईरान से लेकर गाजा तक मुसलमान लड़कियों के शोषण के मामलों के शोर में एक पैटर्न दिखाई देता है। यह पैटर्न है अगर कट्टरपंथी मुसलमान ही मुसलमान लड़कियों या महिलाओं का यौन शोषण, बलात्कार या हिंसा कर रहे हैं, तो फेमिनिस्ट मौन रहती हैं।
उन्हें ऐसा लगता है कि बड़ी कठिनाई से उन्होनें जिन्हें पीड़ित या शोषित प्रमाणित किया है, वे महिलाओं का शोषण करने वाले ही न हो जाएं।
आइए जानते हैं कि मामला क्या है?
क्या कहतीं हैं रिपोर्ट्स?
हाल ही में यूएन पॉपुलेशन फंड ने कई रिपोर्ट्स जारी की हैं। जिनके अनुसार यह देखा गया कि गाजा पट्टी में महिलाओं और लड़कियों के साथ हिंसा की घटनाओं में बहुत ही ज्यादा वृद्धि हुई है। बीबीसी में एक रिपोर्ट के हवाले से लिखा है कि जंगग्रस्त गाजा में ऐसी स्थितियाँ बन रही हैं, जिनमें महिलाओं और लड़कियों पर लिंग आधारित हिंसा का खतरा बढ़ रहा है।
यह रिपोर्ट यह भी चेतावनी देती है कि इस वर्ष की दूसरी तिमाही में जबरन और जल्दी निकाह के मामलों में भयानक रूप से वृद्धि हुई है। गाजा सिटी और खान यूनिस में भीड़भाड़ वाले शरणार्थी शिविरों में रहने वाली 230 महिलाओं की गवाही से एक और रिपोर्ट है, जिसमें महिलाओं ने अपने साथ होने वाले हिंसा के मामलों को बताया है। एक स्कूल में चलने वाले शेल्टर में रहने वाली एक महिला ने बताया कि कैसे बलात्कार की पीडिताओं का निकाह उनके बलात्कारियों से ही इसलिए करा दिया जाता है कि जिससे इज्जत बनी रहे। उसने कहा कि जिस दिन स्कूल में ऐसा कोई मामला आता है, वैसे ही अगले ही दिन स्कूल में अगले दिन निकाह हो जाते हैं।
पैसे न होने के कारण भी लोग अपनी बेटियों को निकाह के रूप मे बेच रहे हैं।
मगर रिपोर्ट की सबसे रोचक बात वह मामला है, जिसमें दो नाबालिग लड़कियों का निकाह उनके चाचा ने इस कारण जल्दी कर दिया क्योंकि लड़कियों के मातापिता “शहीद” हो गए थे और चाचा अब उन बेटियों की जिम्मेदारी उठा नहीं सकते थे, इसलिए अपनी जिम्मेदारियों और खर्च से पीछा छुड़ाने के लिए उन्होनें उन दोनों लड़कियों का निकाह कर दिया।
फिलिस्तीन में काम करने वाले एक एनजीओ के हवाले से बीबीसी ने लिखा कि बच्चों के निकाह के चलते, नाबालिग लड़कियां भारी संख्या में गर्भवती हो रही हैं।
सहायता के नाम पर यौन शोषण
एक जो सबसे बड़ी बात निकलकर आई है कि वे महिलाएं जिनके शौहर मर गए हैं या फिर गिरफ्तार हैं या फिर मिसिंग हैं, उनके साथ मदद के नाम पर यौन हिंसा हो रही है। रिपोर्ट के अनुसार, एक महिला, जिसका शौहर मारा जा चुका था, उसे रहने के लिए टेंट की जरूरत थी। शरणार्थी कैंप के एक प्रतिनिधि ने उससे कहा कि वह उसे एक टेंट देगा, और उसे अपने शिविर में भी रखेगा, मगर उसे एक रात उसके साथ गुजारनी होगी।
जेरूसलम पोस्ट के अनुसार यह रिपोर्ट यह भी स्वीकार करती है कि जंग से पहले भी फिलिस्तीन की महिलाओं और लड़कियों को कई प्रकार के शोषण का सामना करना होता था। उन्हें पुरुषों से नीचे माना जाता था और उन पर पूरी तरह से उनके पुरुषों का नियंत्रण था।इसमें यूएन की रिपोर्ट के हवाले से ही एक महिला के विषय में लिखा है कि जब उसने अपने साथ हुई शिविर में हुई हिंसा की शिकायत की, तो उसके पड़ोसियों और अन्य महिलाओं ने ही यह कह दिया कि उसने खुद ही “शोषण” को बुलावा दिया था।
इतना ही नहीं इन महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा में भी जबरदस्त उछाल आया है। परिवारों के भीतर शौहरों और अन्य रिश्तेदारों के हाथों उनकी पिटाई आम है। और सुरक्षा न होने के कारण महिलाएं पुलिस के पास भी नहीं जा पाती हैं।
वैश्विक और भारत दोनों ही फेमिनिस्ट लोगों की चुप्पी
यह और भी हैरान करने वाली बात है कि गाजा की महिलाओं पर कुछ ही समय पहले कविता और कहानी लिखने वाली फेमिनिस्ट इस मामले पर पूरी तरह से चुप हैं, मौन हैं। वे इस पर विमर्श बनाना तो दूर बात ही करना गवारा नहीं समझ रही हैं।
दरअसल उनके अनुसार इजरायल की सेना ही मूल अपराधी है, और इजरायल की सेना चूंकि वहाँ पर फिलिस्तीनियों पर अत्याचार करती है, तो वही पीड़ित हुए और यदि वह पीड़ित हैं, तो फिर पीड़ितों के भीतर पीड़ित समुदाय वे कैसे पैदा कर सकती हैं? यदि वे ऐसा करती हैं, तो फिर पीड़ित की परिभाषा बदल जाएगी। उन्हें यह भी डर रहता है कि अगर उन्होनें ऐसा किया, कि गाजा के भीतर स्थानीय लोगों, स्थानीय सक्षत्र समूहों या आम लोगों द्वारा महिलाओं पर किए जा रहे अत्याचारों को बताया तो उनका इज़रायल अर्थात मूल शोषक के खिलाफ राजनीतिक युद्ध कमजोर हो जाएगा।
और फिर वे यह कहेंगे कि महिलाएं तो अपने ही आदमियों के हाथों सुरक्षित नहीं हैं।
सबसे बढ़कर वे इस मामले में चॉइस फेमिनिज़्म पर न जाकर इन्टरसेक्शनल फेमिनज़्म पर बात करती हैं। उनका यह मानना होता है कि जब बड़े मुद्दे होते हैं, तो चॉइस फेमिनिज़्म अर्थात व्यक्तिगत फेमिनिज़्म पीछे छूट जाता है और बड़ी पहचान के मुद्दे मुख्य हो जाते हैं।
मगर सबसे बढ़कर कहीं न कहीं कट्टरपंथी समूहों से अपनी जान का भी डर होता होगा या फिर इस्लामोफोबिया का ठप्पा लगने का भी डर होता होगा। यही कारण होंगे कि भारत से लेकर वैश्विक फेमिनिस्ट इस मामले पर पूरी तरह से मौन हैं।











