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होम विश्लेषण

‘विद्यार्थी आंदोलन के चेतनापुंज’

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद दिल्ली प्रांत ने गत 10 मई को अभाविप के संगठन शिल्पी एवं पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. यशवंतराव केलकर जी के जन्मशती वर्ष के उपलक्ष्य में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सिविक सेंटर में विशेष अभिवाचन कार्यक्रम का आयोजन किया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के तौर पर रा.स्व.संघ के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने अपने विचार रखे, प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश:

Written byPanchjanyaPanchjanya
May 20, 2026, 08:27 am IST
inविश्लेषण, संघ @100, दिल्ली

यशवंत जी को इस आयोजन के माध्यम से स्मरण करने का यह एक स्वर्णिम अवसर है। उन्होंने जो कहा, उसे अपने जीवन में करके दिखाया। यशवंत राव जी कैसे थे, क्या करते थे, देश में और महाराष्ट्र में सामाजिक जीवन, संगठन और कार्यकर्ता निर्माण के क्षेत्र में उन्होंने जो आधारभूत तत्व स्थापित किए, उन्हें वक्ताओं ने यहां समझाने का प्रयास किया। मनुष्यों के संगठन, सामाजिक कार्य और जीवन में सकारात्मक दृष्टि के विकास के लिए उन्होंने जो शाश्वत बातें कहीं, उनका स्मरण यहां हुआ। इसके लिए आप सभी अभिनंदन के पात्र हैं।

मुंबई में उनकी षष्ठी का कार्यक्रम हुआ था। उसमें संघ के संगठन के प्रेरणास्रोत बालासाहब देवरस जी ने कहा था कि केलकर जी क्या हैं, यशवंत राव जी क्या हैं? वे डॉक्टर हेडगेवार जी के वंशज हैं, उनके कुल में उत्पन्न हुए हैं। मुझे लगता है कि उनके व्यक्तित्व को समझाने के लिए यही बातें पर्याप्त हैं। यह शब्द स्वयं बालासाहब जी के थे।

बालासाहब जी के छोटे भाई भाऊराव देवरस जी ने संगठन के प्रति हजारों लोगों में भावना जगाई। वे कई वर्षों तक भारतीय विद्यार्थी परिषद के पालक अधिकारी रहे। यशवंत जी का व्यक्तित्व अनौपचारिक रूप से अद्भुत था। भाऊराव जी के साथ उनका संबंध अत्यंत मधुर था। बालासाहब जी के यशवंत राव जी के संबंध में ऐसे उद्गार और उनके कितने गहरे अर्थ हैं, इस बारे में मैं अक्सर सोचता रहता हूं। उन्होंने समय पालन के लिए विशेष सजगता विकसित की। संगठन सूत्र के बारे में वे बताते थे कि विषय की पूर्व योजना, पूर्ण योजना और समय पालन अत्यंत आवश्यक है। उनके लिए छह बजे का अर्थ ठीक छह बजे होता था, न पांच बजकर उनसठ मिनट और न छह बजकर एक मिनट।

यशवंत राव जी ने संगठन के अनेक विषयों पर अपने विचार रखे। जैसे महिलाओं की सहभागिता, विद्यार्थी संगठन का रचनात्मक कार्य, शिक्षा क्षेत्र में सकारात्मक हस्तक्षेप और छात्र आंदोलन के सैद्धांतिक आधार क्या होने चाहिए। उनका मानना था कि विद्यार्थी परिषद का कार्य केवल आंदोलनात्मक नहीं, बल्कि आदर्श छात्र आंदोलन का निर्माण करना है। उन्होंने एक दर्शन विकसित किया। छात्र संगठन और छात्र आंदोलन का आधार तथा चिंतन क्या होना चाहिए, इन सभी विषयों पर उन्होंने गंभीर विचार किया। उनके साथ जिन लोगों ने कार्य किया, उनमें बालासाहब आपटे जी और मदनदास जी प्रमुख थे। इन सभी लोगों ने मिलकर यशवंत राव जी के आदर्शों को आगे बढ़ाया।

महत्वपूर्ण बात यह थी कि उन्होंने कभी अपनी बात किसी पर थोपी नहीं। उनका मानना था कि एक ही विषय पर सोचने के अनेक तरीके हो सकते हैं। सुझाव देना, उस पर सहमति या असहमति रखना, इन सबको उन्होंने अपने जीवन में सहज रूप से स्वीकार किया।

जीवन से दिया संदेश

यशवंत राव जी विभिन्न विचारधाराओं के लोगों के साथ हंसते हुए कार्य करते रहे। उन्होंने कभी द्वंद्व, ईर्ष्या, द्वेष या दूरी नहीं रखी। उनमें सहयोग की भावना अत्यंत प्रबल थी। उनका मानना था कि मनुष्यता के नाते दूसरे के भीतर जो अच्छा है, उसे समझना चाहिए। उन्होंने अपने आदर्शों को केवल शब्दों से नहीं, बल्कि अपने जीवन और कार्य से सिद्ध किया। यही कारण है कि विद्यार्थी परिषद में वे मार्गदर्शन देने वाली चेतना बन गए। वे विद्यार्थी परिषद और विद्यार्थी आंदोलन के चेतनापुंज थे। वे विद्यार्थी परिषद के संस्थापक नहीं थे, बल्कि उसके पालनकर्ता थे। जैसे भगवान कृष्ण को जन्म देने वाली माता देवकी थीं और पालन करने वाली माता यशोदा थीं, उसी प्रकार विद्यार्थी परिषद के पालन-पोषण में यशवंत जी की भूमिका रही।

वे पहले स्वयं काम करने में विश्वास रखते थे। समय पालन उनके जीवन का अनिवार्य हिस्सा था। उनका मानना था कि केवल उपदेश देना उचित नहीं है। एक घटना इसका उदाहरण है। अभ्यास वर्ग के दौरान एक सत्र समाप्त हुआ और दूसरे सत्र के आरंभ होने के बीच चाय का समय था। सभी लोग चाय पी रहे थे। तभी अगले सत्र की सीटी बज गई। यशवंत राव जी के सामने समस्या थी कि कप में गरम चाय बची हुई है। न उसे छोड़ सकते थे, न फेंक सकते थे और न तुरंत पी सकते थे। सत्र में समय पर पहुंचना भी आवश्यक था। ऐसे में उन्होंने चाय में पानी मिलाकर उसे जल्दी पी लिया और तुरंत सत्र में पहुंच गए। उन्होंने किसी को कुछ कहा नहीं, केवल अपने जीवन से समय पालन का उदाहरण प्रस्तुत किया।

कार्यकर्ता निर्माण की शैली

कभी-कभी वे परिवार के साथ व्यक्तिगत यात्राएं भी करते थे। एक बार वे भाभी जी के साथ मैसूर हिल्स में कुछ दिन रहने गए। वे संघ से किसी प्रकार की सहायता नहीं लेना चाहते थे, लेकिन सूचना अवश्य देते थे ताकि कोई कार्यक्रम रखना चाहे तो रख सके। उनकी सहायता के लिए एक कार्यकर्ता को वहां भेजा गया। वह कार्यकर्ता तीन-चार दिन उनके साथ रहकर वापस आया और उसने कहा कि मुझे उनकी सहायता के लिए भेजा गया था, लेकिन वास्तव में उन्होंने मेरी सहायता की। मुझे तो लगा कि मैं ही अतिथि हूं, वे नहीं।

उनके विचार, वाणी और व्यवहार निरंतर जीवन बोध कराने वाले थे। एक बार एक बैठक में स्थानीय अध्यापकों और शिक्षा संस्थानों को चलाने वाले लोगों को बुलाया गया था। वहां उन्होंने विद्यार्थी परिषद का परिचय देते हुए कहा कि विद्यार्थी बहुत अच्छे होते हैं। उन्हें देखने की दृष्टि सकारात्मक होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि कुछ विद्यार्थी बहुत अच्छे होते हैं, कुछ ‘गुड’ और कुछ ‘नॉट सो गुड’। उन्होंने ‘बैड’ शब्द का प्रयोग नहीं किया। वे कहते थे कि कुछ लोग उत्तम होते हैं और कुछ बहुत उत्तम नहीं होते। एक बार परिषद के किसी कार्यकर्ता ने कहा कि संघ में यह होना चाहिए या वैसा होना चाहिए। उसे समझाते हुए यशवंत राव जी ने कहा कि आपको जो कमरा दिया गया है, उसे ठीक रखना आपकी जिम्मेदारी है। उसे साफ-सुथरा और व्यवस्थित रखना चाहिए। दूसरे के कमरे में क्या ठीक है और क्या नहीं, यह देखने की आवश्यकता नहीं है। यह जीवन का एक बड़ा पाठ था कि दूसरों की कमियां देखना बहुत आसान होता है।

यशवंत राव जी ने विद्यार्थी परिषद के बारे में दो महत्वपूर्ण बातें कही थीं। उन्होंने कहा कि विद्यार्थी परिषद का प्रत्येक कार्यकर्ता समाज और राष्ट्र के ऋ ण को चुकाने का प्रयास करेगा। वह अपनी कथनी और करनी के अंतर को कम करेगा। विद्यार्थी परिषद से जीवन दृष्टि मिली या नहीं, यह प्रत्येक कार्यकर्ता को अपनी अंतरात्मा से पूछना चाहिए। संघ दृष्टि विद्यार्थी परिषद में और अधिक विकसित होती है।

विद्यार्थी परिषद में जीवन भर साथ निभाने वाले मित्र मिलते हैं। जीवन के उतार-चढ़ाव और दुख-सुख में साथ देने वाले मित्र मिलते हैं। ऐसे मित्र, जो डांटते हैं तो भी मित्रता नहीं छोड़ते। जब सहायता नहीं कर पाते, तब भी उनके मन में अनुकंपा बनी रहती है। दत्तोपंत ठेंगड़ी जी ने यशवंत जी के बारे में कहा था कि हमने क्या खोया है, यह लोग समझ नहीं सकते। ऐसे आयोजनों के माध्यम से पूर्व कार्यकर्ताओं ने उनका पुनः स्मरण किया और वर्तमान कार्यकर्ताओं का यशवंत राव जी से परिचय हुआ। आज के कार्यकर्ताओं को जब पुराने कार्यकर्ताओं से तुलना करके देखा जाएगा, तब शायद उनके भीतर यशवंत राव जी की उपस्थिति का आभास होगा।

Topics: बालासाहब देवरसयशवंत राव केलकरबालासाहब आपटेचेतनापुंजABVPसमय पालनभाऊराव देवरसकार्यकर्ता निर्माणदत्तोपंत ठेंगड़ीसकारात्मक दृष्टिछात्र आंदोलनजीवन दृष्टिमदनदास देवीRSSपाञ्चजन्य विशेषडॉक्टर हेडगेवार
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