अक्षरम-2026 :  'साहित्य का मूल तत्व राष्ट्र की एकता'
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अक्षरम-2026 :  ‘साहित्य का मूल तत्व राष्ट्र की एकता’

भारतीय साहित्य की मूल आत्मा उसकी एकता, सांस्कृतिक गहराई और ज्ञान परंपरा में निहित है, जो विविध भाषाओं के माध्यम से अभिव्यक्त होती है, कार्यक्रम में प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संयोजक जे. नंदकुमार ने इस विषय पर अपने विचार रखे

Written byजे नंदकुमारजे नंदकुमार
Apr 22, 2026, 02:33 pm IST
inधर्म-संस्कृति, हरियाणा

भारतीय साहित्य एक है। इसकी अनेक लेखक, कवि, कहानीकार अनेक भाषाओं में रचना करते हैं, लेकिन इसकी आत्मा एक है। हमारे देश में अनेक भाषाएं हैं, लेकिन उनके साहित्य का तत्व एक है। साहित्य अकादमी का बोध वाक्य है, ‘भारतीय साहित्य की एकता।’ इस लिए साहित्य का उद्देश्य भी विभिन्न भारतीय भाषा में लिखे साहित्य के बीच आदान-प्रदान हो और सांस्कृतिक एकता को बढ़ावा देना है। अलग-अलग भाषा में लिखे हुए सभी साहित्य का ‘देश की एकता’ एक मूल तत्व है।

उदाहरण स्वरूप वाल्मीकि जी ने ‘रामायण‘ लिखा था। उसके मूल तत्व को लेकर अनुवाद कई भाषाओं में हुआ। लेकिन यह महत्वपूर्ण है कि सुदूर दक्षिण में तमिलनाडु में तमिल भाषा में इसका पहला अनुवाद हुआ था। समय-समय पर अन्य भाषाओं में भी रामायण का अनुवाद विभिन्न लेखकों ने किया। शिक्षाविद् और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन के अनुसार भारतीय साहित्य विविध भाषाओं में रचे जाते हैं, लेकिन वह सब एक हैं।

ऐसे ही, व्युत्पत्ति शास्त्र के अनुसार देखा जाए तो साहित्य का अर्थ है-सहित होने का या साथ में रहने का भाव। सकारात्मक साहित्य के शब्द और अर्थ में मधुरता होती है। उसमें शब्दों और वाक्यों का परस्पर सुंदर मिलन होता है, जिससे एक सार्थक अर्थ निकलता है। ऐसा साहित्य लोगों में एकीकृत, सम्मान, आदर का भाव जगाता है। इसलिए कहा जाता है कि शब्द और सही अर्थ के मिलन से ही साहित्य बनता है। इससे साहित्य में अपनापन उत्पन्न होता है।

विश्व की ओर दुनिया-‘उलझन सुलझे ना’ सत्र के वक्ताओं का सम्मान करते श्री प्रदीप जोशी और श्री हितेश शंकर
कहानी कार्यशाला- ‘कहानी अभी बाकी है’ सत्र के वक्ता

आज जिस कालखंड में हम लोग रह रहे हैं, ‘शब्द‘ के अर्थ को निरर्थक या खत्म करने का प्रयास निरंतर किया जा रहा है। ‘शब्द‘ के अर्थ को अलग-अलग तरीके से उपयोग कर उसके सात्विक भाव को नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। उदाहरण के लिए भारत एक राष्ट्र है। हमारी एक राष्ट्रीयता है। पिछले 40-50 साल पहले तक भारत की राष्ट्रीयता क्या है? इस बारे में सही अर्थ में लोगों को बताया ही नहीं गया। इससे एक रिक्तता आई।

नाइजीरिया के प्रसिद्ध लेखक बेन ओकरी को बुकर पुरस्कार उनके उपन्यास ‘द फैमिश्ड रोड‘ के लिए दिया गया था। वह एक साहित्य उत्सव में भारत आए थे। उनसे किसी ने पूछा कि ‘भारत और नाइजीरिया‘ के बुनियादी अनुभव बहुत समान हैं। दोनों ही देशों में औपनिवेशिक शासन रहा है। दोनों देश ने स्वतंत्रता के लिए लंबे समय तक संघर्ष किया है, उनमें कई स्तर में समानता देखने को मिलती है, फिर भी दोनों देशों की स्थिति में क्यों बहुत अंतर है? इसके उत्तर में बेन ओकरी ने कहा,“देश की एकता को नष्ट करने के लिए ‘झूठ का विष’ ही काफी है। यह ‘विष‘ लोग शब्द के माध्यम से कहानी, इतिहास को गलत ढंग से प्रस्तुत करके लोगों के मानस में भरते हैं। किसी देश को नष्ट करना है, तो उसके साहित्य और इतिहास को गलत तरीके से प्रस्तुत करना ही पर्याप्त है।”मुझे लगता कि किसी राष्ट्र की आत्मा को खत्म करना है तो उसके साहित्य की यथार्थ परिकल्पना को नष्ट कर दो, वह राष्ट्र स्वयं समाप्त हो जाएगा। अतः अपने राष्ट्र को सुरक्षित रखने के लिए सही साहित्य की चर्चा और विश्लेषण की बहुत जरूरत है। इसलिए ‘अक्षरम‘ जैसे साहित्यिक एवं सांस्कृतिक आयोजन की पहल की बहुत जरूरत है।

संस्कृत और ज्ञान परंपरा

नई शिक्षा नीति-2020 हमारे समक्ष आई, इसमें भारत में संस्कृत और अन्य भारतीय भाषाओं को महत्व दिया गया है। भारतीय संस्कृत के महान संत आदि शंकराचार्य ने संस्कृत में संवाद किया था। ‘भारतीय भाषा नीति’ पर संविधान सभा में परिचर्चा के दौरान बाबा भीमराव अंबेडकर, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सी. राजगोपालाचारी, मदन मोहन मालवीय जैसे महानुभावों ने चर्चा के दौरान कहा था कि भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने से ही भारत शक्तिशाली बनेगा। उनका कहना था कि भाषा नीति तय करना आवश्यक है। अपनी शिक्षा पद्धति में ‘संस्कृत‘ को महत्व दिया जाना चाहिए।

किताब लेखन कार्यशाला- ‘आप लिखोगे, दुनिया पढ़ेगी’ सत्र में भाग लेने वाले वक्ता।
‘सुनो कहानी- वंदेमातरम्’ सत्र में प्रस्तुति देतीं भारती दीक्षित

संस्कृत के बिना भारत के साहित्य को समझ नहीं सकते हैं। संस्कृत के बिना भारतीय संस्कृति की परिकल्पना असंभव है। कहने वालों ने तो दशकों पहले ही कह दिया था कि ‘संस्कृत मृत भाषा है।’ विज्ञान, तकनीकी और विमान शास्त्र के बारे में ‘प्रफुल्लचंद्र रे’ की प्रसिद्ध पुस्तक ‘ए हिस्ट्री ऑफ हिंदू केमिस्ट्री’ को पढ़ना चाहिए। वह कोलकाता में रसायन विज्ञान के प्रोफेसर थे। उन्होंने बीसवीं शताब्दी में दो खंड में इसे लिखा था। इसका प्रकाशन विलियम्स और नॉरगेट, लंदन द्वारा किया गया था।

भारतीय संस्कृति पर केंद्रित भारतीय विज्ञान एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुंच गया था। यह पूरा विश्व मानता है। गणित में गणना कैसे करनी है, इसे विश्व के वैज्ञानिकों ने भारतीयों से सीखा है।

देश को सशक्त बनाना जरूरी

‘गुरु‘ शब्द का अर्थ है-अंधकार का निराकरण करने वाला। भारत को विश्व गुरु माना जाता है। ऐसे में विकसित भारत को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना आवश्यक है। भारतीय मूल्यों के आधार पर ही भारत का विकास किया जाना चाहिए। समरस समाज,सांस्कृतिक, परंपरा, भाषाई दृष्टि से भारत का विकास होना चाहिए। इसी आधार पर हमें आगे बढ़ना चाहिए। तभी सही अर्थों में विकसित भारत निर्मित होगा। ‘विकसित भारत‘ बनना है तो भारतीयता और भारतीय मूल्यों को केंद्र में रखकर आगे बढ़ने की आवश्यकता है।

अक्षरम-2026 : विचार, संस्कार और राष्ट्र चेतना का संगम

Topics: राष्ट्रीयताअक्षरम-2026भारतीय साहित्य की एकतानई शिक्षा नीतिमहत्वपूर्ण व्यक्तित्वआदि शंकराचार्यबेन ओकरीसंस्कृत भाषाविकसित भारतभारतीय ज्ञान परंपरासांस्कृतिक एकतापाञ्चजन्य विशेषडॉ. राधाकृष्णन
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