पिछले 1400 से अधिक दिनों से स्वामी दीपांकर की भिक्षा यात्रा का एक आग्रह लगातार समाज के बीच सुनाई देता रहा है- हिंदू अपनी जातिगत और सामाजिक दूरियों से ऊपर उठे, स्वयं को एक समाज, एक परिवार के रूप में देखे और संगठित रहे। अब उसी भिक्षा यात्रा के संकल्प को स्वामी दीपांकर एक नए और अधिक संगठित स्वरूप में आगे बढ़ाने जा रहे हैं—“हिंदू चौपाल”। यह केवल किसी मंच, सम्मेलन अथवा एक दिन के आयोजन की परिकल्पना नहीं है। विचार यह है कि भिक्षा यात्रा जहाँ पहुँचे, वहाँ केवल संदेश देकर आगे न बढ़े; समाज बैठे, संवाद करे, अपनी समस्याओं को पहचाने और उनके समाधान में स्वयं सहभागी बने।
इस नए प्रयास के केंद्र में स्वामी दीपांकर का एक स्पष्ट विचार है-
“हिंदू विभाजित रहा तो संख्या भर रहेगा; संगठित रहा तो शक्ति बनेगा।”
चार सूत्रों पर खड़ी होगी हिंदू चौपाल
समाज संगठित रहे- परिवार की तरह
हिंदू चौपाल का पहला संकल्प सामाजिक संगठन है। जाति, वर्ग, क्षेत्र और आर्थिक स्थिति की दूरियों से ऊपर उठकर समाज में ऐसा संबंध विकसित हो, जिसमें किसी व्यक्ति अथवा परिवार की पीड़ा केवल उसकी निजी पीड़ा न रह जाए। समाज के किसी एक वर्ग पर संकट आए तो पूरा सनातनी हिंदू समाज उसके साथ चट्टान की तरह खड़ा हो। संगठन केवल संख्या या भीड़ का नाम नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सुख-दुःख में उपस्थित रहने का संस्कार बने।
जमीन सुरक्षित रहे- जड़ों से संबंध सुरक्षित रहे
दूसरा सूत्र भूमि और सामाजिक आधार की सुरक्षा से जुड़ा है। जमीन केवल आर्थिक संपत्ति नहीं होती; उससे परिवार की स्मृतियाँ, आजीविका, परंपरा और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी जुड़ा होता है। हिंदू चौपाल समाज को अपनी जमीन और अपने सामाजिक आधार के प्रति जागरूक एवं जिम्मेदार बनाने का प्रयास करेगी- कानूनसम्मत, शांतिपूर्ण और विवेकपूर्ण तरीके से।
धर्म का जनजागरण निरंतर चलता रहे
तीसरा संकल्प है कि समाज में धर्म और अपनी सांस्कृतिक जड़ों को लेकर जागरूकता निरंतर बनी रहे। धर्म केवल पूजा-पद्धति तक सीमित न होकर जीवन में संस्कार, कर्तव्य, करुणा, संयम और उत्तरदायित्व के रूप में दिखाई दे। नई पीढ़ी अपनी परंपराओं को केवल विरासत में प्राप्त न करे, बल्कि उनके अर्थ और मूल्यों को भी समझे। क्योंकि जिस समाज का अपनी जड़ों से संवाद जीवित रहता है, उसकी सांस्कृतिक चेतना भी जीवित रहती है।
समरसता- एक-दूसरे के प्रति परिवार का भाव
चौथा और अत्यंत महत्वपूर्ण सूत्र है समरसता। जातिगत ऊँच-नीच, आपसी कटुता और सामाजिक दूरी के स्थान पर सहयोग, सम्मान और परिवार का भाव विकसित हो। “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना अपने आसपास के समाज में भी दिखाई दे- पहचानें अलग हो सकती हैं, लेकिन अपनापन साझा हो। इसी सामाजिक उत्तरदायित्व में नशे के विरुद्ध सामूहिक चेतना भी हिंदू चौपाल का महत्वपूर्ण विषय होगी। नशा केवल किसी एक व्यक्ति को नहीं, उसके परिवार और अंततः पूरे समाज को प्रभावित करता है। इसलिए उसके विरुद्ध संघर्ष भी किसी एक परिवार की जिम्मेदारी न रहकर समाज का साझा प्रयास बने।
चौपाल का अर्थ- भाषण नहीं, संवाद
भारत में चौपाल की परंपरा केवल बैठने की जगह नहीं रही; वह संवाद, सहभागिता और सामूहिक चिंतन की संस्कृति का प्रतीक रही है। इसी भावना के साथ हिंदू चौपाल में विचार ऊपर से थोपने के बजाय समाज के बीच बैठकर उसे सुनने का है- युवा क्या सोचता है, परिवार किन चुनौतियों से गुजर रहे हैं, समाज कहाँ बिखर रहा है और किन बिंदुओं पर उसे एक-दूसरे का हाथ पकड़ने की आवश्यकता है। भिक्षा यात्रा ने यदि चलकर समाज तक पहुँचने का रास्ता चुना था, तो हिंदू चौपाल उसी समाज के बीच बैठकर उसे सुनने और जोड़ने का प्रयास है। यात्रा से संवाद की ओर, संवाद से विश्वास की ओर और विश्वास से संगठन की ओर।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गाँव-गाँव तक पहुँचेगा अभियान
हिंदू चौपाल की यह परिकल्पना केवल कुछ आयोजनों तक सीमित नहीं रहेगी। भिक्षा यात्रा के साथ हिंदू चौपाल का अभियान पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लगभग 24–25 जिलों तक ले जाने की योजना है। गाँव, कस्बे और नगर- प्रयास होगा कि समाज के बीच प्रत्यक्ष संवाद स्थापित हो और हिंदू चौपाल के चारों सूत्र केवल मंच के विषय न रहकर स्थानीय समाज की साझा जिम्मेदारी बनें। इस पहल का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि स्वामी दीपांकर के आगे बढ़ जाने के बाद उस स्थान पर संवाद समाप्त न हो। इसी उद्देश्य से प्रत्येक जिले में 21 सदस्यों की एक समर्पित टीम गठित की जाएगी। ये सदस्य स्वामी दीपांकर के सहयोगी के रूप में, उनके तत्त्वावधान में समाज को सजग करने, लोगों को जोड़ने, हिंदू चौपाल के मूल विचारों को आगे बढ़ाने और स्थानीय स्तर पर सामाजिक संवाद को निरंतर बनाए रखने का कार्य करेंगे।
इस प्रकार यह अभियान केवल एक संन्यासी की यात्रा बनकर नहीं रहेगा, बल्कि हर जिले में ऐसे सहयोगियों की एक श्रृंखला खड़ी करने का प्रयास होगा, जो यात्रा आगे बढ़ जाने के बाद भी उसके संकल्प को समाज के बीच जीवित रखे। “एक संन्यासी यात्रा करेगा, लेकिन संकल्प हर जिले में खड़ा होगा—21 सहयोगी, एक विचार और संगठित समाज का लक्ष्य।”
यात्रा का अगला अध्याय
स्वामी दीपांकर का यह संकल्प केवल धार्मिक जनजागरण तक सीमित नहीं दिखाई देता। इसमें सामाजिक उत्तरदायित्व, जमीन के प्रति जागरूकता, नशामुक्त समाज, पारस्परिक सहयोग और समरसता- इन सभी को एक सूत्र में जोड़ने का प्रयास है। किसी समाज की वास्तविक शक्ति केवल उसकी जनसंख्या से निर्धारित नहीं होती। वह इस बात से निर्धारित होती है कि संकट के समय उसके लोग एक-दूसरे के लिए कितनी मजबूती से खड़े होते हैं। इसीलिए हिंदू चौपाल के मूल विचार को शायद एक वाक्य में सबसे बेहतर समझा जा सकता है-
“हिंदू विभाजित रहा तो संख्या भर रहेगा; संगठित रहा तो शक्ति बनेगा।”
1400 से अधिक दिनों की भिक्षा यात्रा के बाद हिंदू चौपाल कोई नया मोड़ भर नहीं, उसी संकल्प का अगला अध्याय है- जहाँ माँग आज भी धन की नहीं, समाज के एक होने की है; जहाँ लक्ष्य भीड़ बढ़ाना नहीं, संबंध मजबूत करना है; और जहाँ कल्पना एक ऐसे समाज की है जो धर्म में जागृत हो, अपनी जड़ों के प्रति सजग हो, नशे के विरुद्ध सचेत हो, आपस में समरस हो और संकट में एक-दूसरे के साथ चट्टान की तरह खड़ा हो। भिक्षा यात्रा ने एक होने की भिक्षा माँगी थी; हिंदू चौपाल अब उस एकता को सामाजिक संस्कार और स्थायी संगठन में बदलने का संकल्प है।
संगठित सनातन, मजबूत भारत।

















