ब्रिक्स पे अमेरिकी डॉलर का विकल्प नहीं है बल्कि यह सदस्य देशों के बीच सीमा पार भुगतान को आसान और सुरक्षित बनाने का एक वैकल्पिक जरिया है। स्थानीय मुद्राओं में सीधे व्यापार होने से बार-बार डॉलर में कन्वर्जन कराने की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे ट्रांजैक्शन कॉस्ट घटती है। आयात-निर्यात के लिए हर बार डॉलर जमा करने या उस पर निर्भर रहने की मजबूरी कम होती है।
भारत अपने व्यापारिक भुगतानों में रुपये और वोस्ट्रो खातों के इस्तेमाल को बढ़ावा दे रहा है। भारत अपने UPI जैसे सफल डिजिटल पेमेंट मॉडल और सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी को अन्य देशों के साथ जोड़ने पर जोर दे रहा है ताकि भुगतान प्रक्रिया तेज हो सके।
दरअसल ब्रिक्स देश डॉलर में होने वाले ऊर्जा व्यापार और अमेरिकी फाइनेंशियल इंफ्रास्ट्रक्चर पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं। जब पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है तो हर ब्रिक्स अर्थव्यवस्था को तेल की बढ़ती कीमतों, कैपिटल आउट फ्लो और करेंसी की वैल्यू घटने से झटका लगता है। अभी ब्रिक्स सदस्यों के बीच पेमेंट के लिए पैसा अक्सर अमेरिकी बैंकों से होकर गुजरता है। इसे क्लियर होने में कई दिन के साथ फीस भी लगती है। इससे निपटने के लिए कॉमन करेंसी सबसे सटीक हल है। ब्रिक्स के सदस्य देश आपस में घरेलू मुद्राओं में आंतरिक व्यापार को लेकर सक्रियता से विचार कर रहे हैं। साझा मुद्रा से न केवल इंट्रा ब्रिक्स व्यापार को बढ़ावा दिया जा सकेगा बल्कि अंतरराष्ट्रीय लेन-देन की हाई डॉलर कन्वर्जन कॉस्ट पर भी नकेल कसी जा सकेगी।
साझा ब्रिक्स मुद्रा की चुनौतियां
साझा ब्रिक्स मुद्रा के रास्ते में कई चुनौतियां भी हैं। सबसे पहली चुनौती आर्थिक असमानता हैं। सदस्य देशों की अर्थव्यवस्था का आकार, महंगाई, ब्याज दरें और आर्थिक प्राथमिकताएं काफी अलग हैं। ऐसे में अगर एक साझा मुद्रा हो तो सवाल उठेगा कि ब्याज दर कौन तय करेगा? संकट में किस देश को वित्तीय मदद मिलेगी और व्यापार घाटे या महंगाई जैसी समस्याओं का बोझ कैसे बांटा जाएगा? साझा मुद्रा की दूसरी सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक सहमति है। रूस और ईरान डॉलर पर निर्भरता घटाने को रणनीतिक जरूरत मानते हैं। चीन इसे युआन या रॅन्मिन्बी के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल और अमेरिकी वित्तीय प्रभुत्व को चुनौती देने के नजरिए से देखता है। वहीं भारत और ब्राजील स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने के पक्ष में है मगर डॉलर को पूरी तरह हटाने के पक्ष में नहीं हैं। यानी साझा मुद्रा पर सभी देशों की प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं हैं। तीसरी चुनौती भुगतान और वित्तीय ढांचा है। नई मुद्रा के लिए साझा भुगतान नेटवर्क, बैंकिंग इंटर ऑपरेबिलिटी, विनिमय व्यवस्था और मजबूत वित्तीय संस्थाओं की जरूरत पड़ेगी। इसी कारण 2025 के रियो घोषणापत्र में साझा मुद्रा का रोडमैप सामने नहीं आ सका था। इसके बजाय ब्रिक्स ने क्रॉस बॉर्डर पेमेंट इनिशिएटिव, स्थानीय मुद्राओं में वित्त पोषण और भुगतान प्रणालियों को ज्यादा इंटर ऑपरेबल बनाने पर जोर दिया है।
ब्रिक्स करेंसी को लेकर मिथक
ब्रिक्स करेंसी का सबसे बड़ा मिथक है कि इसे डॉलर के खिलाफ खड़ा किया जाता है। ब्रिक्स करेंसी को यूरो जैसी करेंसी बनाकर सभी ब्रिक्स देशो में लागू किया जाए मगर यह बहुत ही दूरगामी सोच है। इस राह में भी कई चुनौतिया हैं। यूरोपियन यूनियन एक भौगोलिक इकाई है जबकि ब्रिक्स के सहयोगी फैले हुए हैं। इसके अलावा इन देशों की मौद्रिक नीति, महंगाई का दर, कन्वर्जन रेट अलग हैं। इन सभी कठिनाइयों को पाटने में समय लगेगा।
राष्ट्रीय मुद्राओं को जोड़ने का प्रयास
ब्रिक्स अब एक मुद्रा बनाने के बजाय कई राष्ट्रीय मुद्राओं को जोड़ने की कोशिश कर रहा है। स्थानीय मुद्रा में व्यापार का मतलब है कि दो देशों के बीच लेनदेन में हर बार डॉलर को बीच की मुद्रा बनाने की जरूरत ना पड़े। इसके साथ ब्रिक्स पेमेंट टास्क फोर्स भुगतान प्रणालियों की इंटर ऑपरेबिलिटी पर काम कर रही है ताकि सीमा पार भुगतान तेज, सस्ता और सुरक्षित बनाया जा सके। भारत इस प्रक्रिया में खास भूमिका निभा रहा है। आरबीआई रुपए के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल को बढ़ाने और स्थानीय मुद्राओं में सीमा पार व्यापार को प्रोत्साहित कर रहा है। 2026 में भारत ने ब्रिक्स देशों के फास्ट पेमेंट सिस्टम और सीबीडीसी यानी डिजिटल करेंसी को आपस में जोड़ने का प्रस्ताव भी आगे बढ़ाया है जिसका मकसद सीमा पार भुगतान की लागत घटाना और उसकी दक्षता बढ़ाना है। भारत ने हाल में रुपए में होने वाले निर्यात भुगतान के नियम भी आसान किए है ताकि निर्यातकों के लिए रुपए में व्यापार करना ज्यादा सुविधाजनक हो। भारत ने इसके लिए स्पेशल रूपी वस्ट्रो अकाउंट्स यानी एसआरवीए का नेटवर्क विकसित किया है। फरवरी 2025 तक भारतीय रिज़र्व बैंक ने 30 देशों के 123 कॉरेस्पोंडेंट बैंकों को भारत के 26 अधिकृत बैंकों में कुल 156 स्पेशल रुपी वोस्ट्रो खाते खोलने की मंजूरी दिया था।
















