बाल विवाह के खिलाफ वैश्विक लड़ाई के इतिहास में 4 सितंबर, 2026 का दिन एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज हो गया। इसी दिन संयुक्त राष्ट्र ने 27 नवंबर को ‘बाल विवाह, कम उम्र और जबरन विवाह के उन्मूलन के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस’ घोषित किया। इस ऐतिहासिक फैसले के पीछे भारत से उठी एक ऐसी आवाज रही, जो वर्षों से बाल विवाह को केवल सामाजिक कुरीति नहीं, बल्कि बच्चों के अधिकार और न्याय से जुड़ा गंभीर प्रश्न मानकर उसके खिलाफ संघर्ष कर रही है। इस आवाज का नाम है भुवन ऋभु। भुवन ऋभु जाने-माने बाल अधिकार कार्यकर्ता, अधिवक्ता और बच्चों के संरक्षण के लिए जमीन पर काम करने वाले नागरिक समाज संगठन जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) के संस्थापक हैं। उनके प्रयासों से 84 देश बाल विवाह के खिलाफ एकजुट हुए और संयुक्त राष्ट्र में इस संबंध में प्रस्ताव लाया गया, जिसे सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया। पाञ्चजन्य से सुधीर पांडेय ने भुवन ऋभु से विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश
बाल विवाह की कुप्रथा कानून-व्यवस्था का विषय तो है ही, यह सामाजिक विकृति से भी जुड़ा मुद्दा है। भारत में बेटियों की राय को वरीयता दी गई है, बेटियां युद्धकला तो सीखती ही थीं, सुदीर्घ विदुषी परंपरा भी रही है। बाल विवाह की कुप्रथा भारत में कैसे पनपी और इसे आप कैसे देखते हैं। इसकी जड़ें कैसे गहरी हो गईं?
भारत में बाल विवाह सामाजिक विकृतियों से पनपी सोच का परिणाम है। भारत का मूल सिद्धांत धर्म का पालन रहा है। हमारे शास्त्र कहते हैं, ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।’ गार्गी, मैत्रेयी, लोपामुद्रा जैसी विदुषियां इसका प्रमाण हैं। दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती की पूजा तथा सीता के बिना राम और राधा के बिना कृष्ण की कल्पना नारी के स्थान को दर्शाती है। कालांतर में बाहरी आक्रमणकारियों के भय, आक्रमणों से सुरक्षा, अधिक संतान और कुल को आगे बढ़ाने की सोच ने बेटियों को शिक्षा से दूर कर पारिवारिक जिम्मेदारियों की ओर धकेला। असुरक्षा में बाल विवाह परंपरा और सामाजिक सोच का हिस्सा बन गया। राजा राममोहन राय, महर्षि दयानंद सरस्वती और महात्मा गांधी जैसी विभूतियों ने इसका विरोध किया, लेकिन नतीजा नहीं आया। सामाजिक, मानसिक और आध्यात्मिक परिवर्तन के साथ समाज, धर्मगुरुओं, सरकार और नागरिक संगठनों को मिलकर काम करना होगा।
बाल विवाह कुप्रथा क्या अन्य देशों में भी जड़ें जमाए हुए है, वहां इसके उन्मूलन के लिए क्या कुछ प्रयास किए जा रहे हैं?
बाल विवाह पूरी दुनिया की गंभीर समस्या है। हाल में अफगानिस्तान में छह और आठ वर्ष की दो बच्चियों के विवाह की खबरें 60 और 80 साल के व्यक्तियों से करने की आयी। ब्रिटेन में 12 वर्ष से कम उम्र की 100 से अधिक बच्चियों को बचाया गया, जिनमें 27 पांच वर्ष से कम की थीं। अमेरिका के करीब 18 राज्यों में यह प्रतिबंधित है। कुछ अफ्रीकी देशों में इसकी दर लगभग 70 प्रतिशत और 20 से अधिक देशों में 50 प्रतिशत से अधिक है। 27 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय दिवस घोषित करना ऐतिहासिक है, क्योंकि दुनिया पहली बार इस मुद्दे पर एक मंच और समयबद्ध संकल्प के साथ सामने आई है। कानून केवल अपराध और सजा नहीं, बल्कि बच्चों को शिक्षा और अधिकारों से जोड़ने का माध्यम भी है।
इसे जड़ से उखाड़ने में भारत के पारंपरिक सामाजिक ढांचे और कुटुंब प्रबोधन की क्या भूमिका हो सकती है?
बदलाव का केंद्र बच्चा और परिवार होना चाहिए। यदि परिवार बच्चों की सुरक्षा, बेटियों की शिक्षा और भविष्य के बारे में स्वतंत्र सोच के अधिकार के लिए प्रतिबद्ध हों तो बाल विवाह पर रोक लग सकती है। भारतीय व्यवस्था में बच्चे की सुरक्षा केवल माता-पिता नहीं, पूरे कुटुंब, गांव और समाज की जिम्मेदारी थी। हमारे यहां कहा गया है, ‘अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुंबकम्॥’ यदि पूरी दुनिया हमारा परिवार है तो हर वयस्क की जिम्मेदारी है कि वह हर बच्चे की सुरक्षा करे। लेकिन भारत में पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव से जिस तरह से एकल परिवार की प्रवृत्ति बढ़ रही है, उससे बच्चों की असुरक्षा भी बढ़ रही है। तकनीक और स्क्रीन से भी बच्चों की असुरक्षा बढ़ रही है। सबसे बड़ा संकट एकाकीपन है। ये एक बड़ा खतरा है।
इस प्रस्ताव को सिएरा लियोन और अन्य अफ्रीकी व एशियाई देशों का व्यापक समर्थन मिला। वैश्विक मंचों पर बाल संरक्षण के विषय पर विकासशील देशों को एक साथ लाने का अनुभव कैसा रहा?
27 नवंबर, 2024 को भारत में 25 करोड़ से अधिक लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत सरकार के ‘बाल विवाह मुक्त अभियान’ के तहत शपथ ली थी। सिएरा लियोन की फर्स्ट लेडी डॉ. फातिमा माडा बायो ने 84 देशों के अनुमोदन वाला प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र में पेश किया। इसमें भारत ने अग्रणी भूमिका निभाई। आज भारत बाल संरक्षण के क्षेत्र में विश्व गुरु के रूप में स्थापित हो गया है। हमारा अनुभव है कि विश्वास, सम्मान और संवाद से दुनिया एक साथ काम कर सकती है। मतभेदों के बावजूद बच्चों की सुरक्षा पर पूरी दुनिया एक मंच पर आ सकती है।
27 नवंबर, 2024 को भारत में 25 करोड़ से अधिक लोगों ने बाल विवाह के खिलाफ शपथ ली थी। इतने बड़े स्तर पर जन-जागरण करने और इसे ‘नागरिक कर्तव्य’ में बदलने के लिए क्या योजनाएं हैं?
आदरणीय प्रधानमंत्री मोदी जी और भारत सरकार के नेतृत्व में 27 नवंबर, 2024 को बाल विवाह मुक्त भारत आह्वान के बाद गांव-गांव कार्रवाई में 5,50,000 से अधिक बाल विवाह रोके गए और 12 लाख से अधिक स्कूल से बाहर बच्चियों को शिक्षा से जोड़ा गया। पंचायतों, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और धर्मगुरुओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अब लक्ष्य देश के 1,30,000 गांवों को सुरक्षित बाल ग्राम बनाना है। ऐसा ग्राम जहां हर बच्चा स्कूल या कौशल से जुड़ा हो, सरकारी योजनाओं का लाभ मिले, बाल विवाह या ट्रैफिकिंग न हो और बच्चों की सुरक्षा की प्रभावी व्यवस्था हो।
प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के रुख को आपने इस पूरी मुहिम में कितना निर्णायक माना? नीतिगत फैसलों ने जमीनी लड़ाई को कितनी गति दी?
मोदी जी का नेतृत्व और महिला और बाल विकास मंत्रालय की सोच व कार्य इस मुहिम में निर्णायक भूमिका में रही हैं। पहली बार इस विषय पर सरकार, सामाजिक संगठन और धर्मगुरु सभी एक साथ एक मंच पर रहे। समाज की सोच को बदलने में सबने अपनी आहुति इस महायज्ञ में डाली है। लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि जब देश के नेता और सरकार कमर कसकर बच्चों की सुरक्षा जैसे मुद्दे पर ठान लें तो कितने कम समय में कितना ज्यादा बदलाव संभव है। ये हमारे आदरणीय प्रधानमंत्री जी और महिला बाल विकास मंत्रालय में अन्नपूर्णा देवी जी, सावित्री ठाकुर जी और उनकी टीम ने दिखाया है। पिछले तीन वर्ष में बाल विवाह में 10 प्रतिशत से ज्यादा गिरावट आ गई है। मुझे यकीन है कि 2030 तक हम इसके ‘टिपिंग प्वाइंट’ 6 प्रतिशत तक पहुंच जाएंगे।
बाल विवाह रोकने के लिए कानूनी कार्रवाई का क्या असर रहा?
हम कानून को केवल अपराध और सजा से नहीं जोड़ते। शिक्षा, सुरक्षा, नीतियां, कौशल और सरकारी योजनाओं से बच्चों को जोड़ना और उन्हें जागरूक करना भी हमारा उद्देश्य है। लेकिन असम, जहां सख्त कानूनी कार्रवाई हुई, वहां बाल विवाह की दर में 90 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई है। 2022 में जिन गांवों में करीब 3,500 बाल विवाह हो रहे थे, 2025 के अंत में 20,000 से अधिक गांवों के सर्वे में संख्या लगभग 400 रह गई। इससे समाज में यह संदेश गया कि बाल विवाह अपराध है और इसे कराने वाले जेल जाएंगे। मुख्यमंत्री हिमंता बिश्व सरमा के नेतृत्व में असम में हुई कार्रवाई दुनिया के लिए मिसाल बनी है।
जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन की बाल विवाह मुक्त विश्व अभियान में क्या भूमिका है?
बच्चों की सुरक्षा सामूहिक जिम्मेदारी है। सामाजिक संगठन का दायित्व सरकार की मदद करना, खतरों के प्रति आगाह करना और जनचेतना जगाना है। जेआरसी के 300 से अधिक सहयोगी संगठन पिकेट रणनीति यानी सुरक्षा से पहले रोकथाम, अभियोजन से पहले सुरक्षा और रोकथाम के लिए निवारक उपाय के तौर पर अभियोजन, पर अमल करते हुए देश के सभी 782 जिलों में कानूनी हस्तक्षेपों व जागरूकता कार्यक्रमों के जरिए बाल विवाह और ट्रैफिकिंग के खिलाफ जमीनी लड़ाई लड़ रहे हैं। हम गांवों से निकली बच्चों, माताओं और बहनों की आवाज को संयुक्त राष्ट्र तक ले जाने में सफल रहे। यह प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र से गांवों तक नहीं आया, बल्कि गांवों की आवाज संयुक्त राष्ट्र तक गई और वहां से 27 नवंबर पूरे विश्व के लिए बाल विवाह उन्मूलन का अंतरराष्ट्रीय दिवस बना। अब भारत और हम सभी की जिम्मेदारी बढ़ गई है। बच्चों की सुरक्षा में भारत की विश्व स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका बन चुकी है। हमारी बेटियों की शिक्षा सबसे अधिक जरूरी है। जब देश की बेटियां बराबरी के साथ हर क्षेत्र में भागीदारी करेंगी, तभी भारत विकसित भारत की दिशा में आगे बढ़ सकेगा।
















