गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय, हिसार में 3 से 5 अप्रैल तक आयोजित ‘अक्षरम-2026’ महोत्सव केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक वैचारिक और सांस्कृतिक उत्सव था, जिसमें बौद्धिक विमर्श, रचनात्मक अभिव्यक्ति और राष्ट्रीय चेतना-तीनों को एक साथ साधने का प्रयास किया गया। इसकी संकल्पना के मूल में यह प्रश्न था कि आयोजन किसी एक टेम्पलेट से नहीं, बल्कि समाज, परिवार, पीढ़ी और व्यक्ति-सबकी जरूरतों को समझकर रचा जाना चाहिए।
जैसे रसोई में मां हर सदस्य की आवश्यकता, रुचि और स्वास्थ्य का ध्यान रखकर भोजन बनाती है, वैसे ही इस आयोजन की रचना भी पोषण, संवेदना और जिम्मेदारी को साथ लेकर की गई। इसी कारण इसमें केवल कार्यक्रमों का संकलन नहीं, बल्कि एक समग्र पारिस्थितिकी तंत्र बनाने की कोशिश दिखाई देती है।
इस विमर्श में समकालीन प्रश्नों पर भी चर्चा हुई, जैसे आभासी बनाम वास्तविक, जनसांख्यिकी परिवर्तन, अकादमी विचारधारा, पुरस्कार विवाद, मीडिया में सच और झूठ, तथा विश्व युद्ध की ओर बढ़ती दुनिया। लेकिन इसके साथ-साथ ऐतिहासिक और राष्ट्रीय चेतना के विषय भी केंद्र में रखे गए, ताकि विभाजन की पीड़ा, गुरु तेग बहादुर और बाबा साहब आंबेडकर जैसे प्रश्न छूट न जाएं।
‘अक्षरम-2026’ की विशेष उपलब्धियों में से एक यह भी रही कि इसके बीच से नौ से 11 शोध-पत्र निकले, जो इस बात का प्रमाण हैं कि यह आयोजन केवल मंचीय गतिविधि नहीं, बल्कि गंभीर अकादमिक सृजन का आधार भी बना।
साहित्यिक विधाओं और रचनात्मक अभिव्यक्ति के क्षेत्र में भी यह आयोजन व्यापक रहा। कविता, कहानी-लेखन, यात्रा-लेखन, रिपोर्ताज, पुस्तक-लेखन और प्रकाशन की बारीकियों पर कार्यशालाएं हुईं, वहीं कवि-सम्मेलन और ‘ओपन माइक’ कार्यक्रम ने इस पूरे वातावरण को जीवंत कर दिया। छात्रों की सक्रिय भागीदारी ने इस आयोजन को और अधिक ऊर्जावान बना दिया।
आधुनिक समय के अनुरूप संचार माध्यमों, कंटेंट-क्रिएटर्स, ‘ऑरेंज इकॉनमी’, फिल्म-पटकथा लेखन, कथा-कहन, सोशल मीडिया संवाद, फिल्म-स्क्रीनिंग और एआई के दौर में रचनात्मकता की रक्षा जैसे विषयों पर भी गहन कार्यशालाएं हुईं। इससे यह स्पष्ट हुआ कि ‘अक्षरम’ परंपरा और तकनीक, दोनों के बीच संवाद का मंच बनना चाहता है।
इस आयोजन में जलवायु परिवर्तन, जेन-जी संवाद, क्षेत्रीय और लोक संस्कृति, भजन-बैंड प्रस्तुति अकादमिक और संस्थागत सहभागिता ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। साथ ही धार्मिक अध्ययन केंद्र में यज्ञशाला का उद्घाटन, जंबेश्वर महाराज की परंपरा, विश्नोई समाज की 29 प्रतिज्ञा में से एक ‘नील का उपयोग त्यागे’ जैसे प्रतीकात्मक संकेतों ने इस आयोजन को सांस्कृतिक गहराई दी।
अंततः ‘अक्षरम-2026’ ने यह संदेश दिया कि विश्वविद्यालय केवल ज्ञान का केंद्र नहीं, बल्कि जिज्ञासा, संवाद, श्रद्धा और तर्क का साझा परिसर है। यह आयोजन एक बीज की तरह बोया गया है, जिसका फल, छाया और विस्तार समय के साथ सामने आएगा, और यही उसकी स्थायी उपलब्धि होगी।

















