राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत अपनी विदेश यात्रा के दौरान 2-7 सितंबर तक यूनाइटेड किंगडम में रहे। वे वहां अनेक गणमान्य विभूतियों से मिले। 6 सितंबर को श्री भागवत ने लंदन में आयोजित एकात्मता का उत्सव (Celebration of Oneness) कार्यक्रम के दौरान संघ की 100 वर्ष की यात्रा से संबंधित विभिन्न प्रश्नों के उत्तर देते हुए संघ की दृष्टि को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि विविधता से निपटते समय यह नहीं देखना चाहिए कि सामने वाला कुछ अलग है। उन्होंने ‘हम एक हैं, सब एक है’ की भावना के आधार पर हर चीज से निपटने की बात कही। प्रस्तुत हैं प्रश्नोत्तर के मुख्यांश
संघ का ऐसा कौन-सा एक तत्व है, जो 100 वर्ष की यात्रा में समय की हर कसौटी पर खरा उतरा है?
यदि मुझे एक ही सिद्धांत का उल्लेख करना हो, तो मैं ‘अपनापन’ कहूंगा, जिसका अर्थ है सभी के प्रति शुद्ध, सात्त्विक प्रेम। व्यक्ति, समुदाय, समाज और समूची मानवता के प्रति प्रेम-यही हिंदू का पारंपरिक स्वभाव है। हिंदू विश्व को संतुलित दृष्टि प्रदान कर सकते हैं।

संघ के स्वयंसेवक देश और समाज में बड़े पैमाने पर सेवा कार्य करते हैं। उनके सेवा कार्यों के विस्तार और व्यापक स्वीकार्यता को आप किस रूप में देखते हैं?
स्वयंसेवक मानव जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में सक्रिय हैं, इसलिए उनके कार्य के पूरे विस्तार का सार प्रस्तुत करना कठिन है। राजनीतिक कारणों से हमारा विरोध करने वाले लोग भी हमारे कार्य तथा स्वयंसेवकों के गुणों और योगदान को स्वीकार करते हैं। समय-समय पर वे महत्वपूर्ण विषयों पर हमसे सहयोग की अपेक्षा करते हैं और हमसे संवाद भी करते हैं। यह समाज के विभिन्न वर्गों में हमारे कार्य की व्यापक स्वीकार्यता को दर्शाता है। जहां कोई कुछ नहीं कर रहा होता, वहां संघ सेवा कर रहा होता है-लद्दाख से लेकर कन्याकुमारी तक।
संघ की आगामी 100 वर्ष की यात्रा के लिए आपका क्या संदेश है? संगठन के सामने सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य क्या होना चाहिए?
संघ को अगले 100 वर्ष तक भी वही कार्य निरंतर आगे बढ़ाना होगा, जो उसने अब तक किया है। सबसे पहले मेरे मन में यह बात आती है कि सारे कार्यों को पूरा करने में इतना समय नहीं लगना चाहिए। अभी मेरी तीसरी पीढ़ी कार्य कर रही है। संघ में अब दो पीढ़ियां और भी साथ काम कर रही हैं। इस प्रकार पांच पीढ़ियां साथ काम कर रही हैं। सातवीं पीढ़ी आने से पहले हिंदू समाज के संगठन का कार्य पूरा हो जाना चाहिए।
विश्व के सामने आज ऐसी कौन-सी चुनौती है, जिसके समाधान में हिंदू सभ्यता की दृष्टि विशेष रूप से महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है?
सभी हिंदू विचार इसी एक सूत्र पर आधारित रहे हैं कि प्रत्येक कर्म के पीछे कोई कारण है। अस्तित्व वास्तव में एक है, यद्यपि वह विविध दिखाई देता है। विविधता हमारा स्वभाव है। इसलिए हमें उसे स्वीकार करना है और उसका सम्मान करना है। लेकिन विविधताओं के साथ इस बात को ध्यान में रखते हुए व्यवहार करना होगा कि ये अस्तित्व की एकता के विभिन्न श्रृंगार हैं। एक ही अनेक हुआ है, इसलिए अनेक का सम्मान किया जाता है। सब एक हैं। इसी आधार पर हम हर विषय को देखते और उससे व्यवहार करते हैं।
‘हिंदू राष्ट्र’ और ‘हिंदुत्व’ की अवधारणा को आप किस प्रकार स्पष्ट करेंगे?
हिंदू शब्द को हम किसी धार्मिक आचरण या जीवन-शैली के आधार पर नहीं समझ सकते। हिंदू एक प्रकृति है। समाज को ऐसी प्रकृति की आवश्यकता है, जो सभी विविधताओं को स्वीकार करे और उनका सम्मान करे, क्योंकि उसका विश्वास है कि सभी मार्ग एक ही लक्ष्य की ओर जाते हैं। सभी विविधताएं एकता की ही विविध अभिव्यक्तियां हैं। इसलिए जब हम उस एकता को देखते हैं, तब सभी विविधताओं का सम्मान और स्वीकार करना संभव होता है। यही हिंदू विचार है, यही हिंदू प्रकृति है। हिंदू समाज और भारत के इतिहास में यही दिखाई देता है। इसलिए जब हम हिंदू कहते हैं, तो यह कोई धर्म नहीं है। यह केवल एक शब्द भी नहीं है। हिंदू धर्म की विभिन्न परंपराएं अपनी विशिष्ट दर्शन-पद्धतियों और आचरण के साथ इस व्यापक हिंदू सभ्यतागत परिवेश के भीतर अस्तित्व में रह सकती हैं।
आज की नई पीढ़ी के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगे? उनकी ऊर्जा और आकांक्षाओं को समाज और दुनिया के बेहतर भविष्य के लिए किस दिशा में लगाया जा सकता है?
मुझे नई पीढ़ी पर अधिक विश्वास है। उनमें दुनिया को बेहतर बनाने की तीव्र आकांक्षा है और इस उद्देश्य के लिए वे विभिन्न प्रकार के छोटे-छोटे मतभेदों से ऊपर उठने को तैयार हैं। वे अधिक ईमानदार होते हैं। उम्र बढ़ने के साथ स्वाभाविक रूप से ऐसा होता है कि हम अनेक अनुभवों से गुजरते हैं और इसलिए अधिक सतर्क हो जाते हैं। हम हर समय खुलकर नहीं बोलते। हम यह सोचते रहते हैं कि आगे क्या होगा, क्योंकि हमें पता होता है कि क्या-क्या हो सकता है। युवा पीढ़ी के पास ऐसे अनुभव नहीं होते। यदि उन्हें कुछ सही लगता है, तो वे उसे सहज रूप से स्वीकार कर लेते हैं और उसी के अनुसार कार्य करते हैं। वे परिणामों को लेकर चिंतित नहीं होते, क्योंकि वे युवा हैं। इसलिए यदि हम उन्हें यह उद्देश्य दें और अपने अनुभव से प्राप्त आवश्यक ज्ञान तथा दृष्टि प्रदान करें, बिना उसे उन पर थोपे, तो हमें उन्हें अपना मार्ग स्वयं खोजने देना चाहिए।
भारतीय दृष्टि में ‘सेवा’ का वास्तविक अर्थ क्या है? युवा पीढ़ी को सेवा कार्य करते समय किन मूल भावनाओं को ध्यान में रखना चाहिए?
युवा पीढ़ी का दायित्व अपने मूल्यों के अनुसार जीवन जीना है। इसलिए सेवा के क्षेत्र में भी उन्हें यही भाव रखना होगा। सेवा निःस्वार्थ भाव से होनी चाहिए। सेवा ऐसा कोई कार्य नहीं है, जिससे आप महान बनते हैं। यह उपकार नहीं है और न ही यह ऐसा कुछ है जो आप मानवता पर किसी करुणा के रूप में कर रहे हैं। हम कहते हैं कि सेवा ईश्वर के निकट जाने का आपका अवसर है। आप जिनकी सेवा कर रहे हैं, उन पर कोई उपकार नहीं कर रहे। वे आपको सेवा का अवसर देकर आपके ऊपर बहुत बड़ा उपकार कर रहे हैं। इसलिए सेवा इसी भाव के साथ की जानी चाहिए।

यूनाइटेड किंगडम में ब्रिटिश हिंदुओं की निष्ठा को लेकर समय-समय पर सवाल उठते हैं। ऐसे सवालों को आप किस दृष्टि से देखते हैं?
यदि ब्रिटिश हिंदू अच्छे, पक्के और सच्चे हिंदू हैं, तो ब्रिटेन और भारत के हितों के बीच कभी कोई संघर्ष नहीं होगा। यदि कभी ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है, तो स्वाभाविक रूप से ब्रिटिश हिंदू ब्रिटेन के साथ जाएंगे। अपवाद हो सकते हैं, लेकिन हिंदुत्व इस विषय पर स्पष्ट है। आपकी कर्मभूमि ही वह स्थान है, जहां आपकी निष्ठा होती है। आपकी जन्मभूमि अर्थात् आपकी उत्पत्ति या जन्म का स्थान और आपकी पुण्यभूमि वह स्थान है, जहां से आपको अपने मूल्य प्राप्त होते हैं। आपको उन्हीं मूल्यों को अपनी कर्मभूमि में जीना है और जिस भूमि पर आप रहते हैं, उसकी सेवा करनी है।
हिंदुओं की एकजुटता और एकता को लेकर भी अक्सर सवाल उठते हैं। विविधताओं के बीच हिंदू समाज को एक सूत्र में बांधने के लिए आपकी क्या दृष्टि है?
यदि आप श्रोताओं को देखें या सामान्य रूप से समाज को देखें, तो मानव समाज में विविधता है और यह स्वाभाविक है। हमें इसके साथ चलना है। लेकिन अपना जोर इस बात पर होना चाहिए कि हमें क्या जोड़ता है, न कि इस बात पर कि हमें क्या विभाजित करता है। यदि हम ऐसा करेंगे, तो हमारे समुदाय, हमारा समाज समृद्ध होगा और दुनिया एक बेहतर स्थान बनेगी। हमें यही करना होगा।

















