गत 3 सितंबर को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने नई दिल्ली में ‘रक्षा : रक्षा कूटनीति पर एक रणनीतिक रूपरेखा’ नामक दस्तावेज जारी किया। यह अगले दशक (2026-2036) के लिए भारत का पहला समेकित रक्षा कूटनीति रोडमैप है।
राजनाथ सिंह ने कहा, “चूंकि रक्षा कूटनीति भारत की विदेश नीति का मुख्य स्तंभ है, इसलिए यह दस्तावेज अगले दशक के लिए एक स्पष्ट, कार्रवाई योग्य दृष्टिकोण प्रदान करता है जो भारत को शांति, स्थिरता और नियम-आधारित व्यवस्था का स्तंभ बनाए रखने में सक्षम करेगा।”
रक्षा कूटनीति का उद्देश्य द्विपक्षीय और बहुपक्षीय संबंधों को बढ़ावा देना, पारदर्शिता बढ़ाना, विश्वास कायम करना और संघर्ष के बिना रणनीतिक वातावरण को अनुकूल बनाना है। इसमें सैन्य आदान-प्रदान, संयुक्त अभ्यास, प्रशिक्षण कार्यक्रम, नौसैनिक यात्राएं, उच्च-स्तरीय यात्राएं, रक्षा प्रदर्शनियां, क्षमता निर्माण और मानवीय सहायता अभियान शामिल हैं। सीधे शब्दों में, रक्षा कूटनीति शांतिकाल में सशस्त्र सेनाओं का उपयोग विदेश नीति के उपकरण के रूप में करती है, ताकि आपसी विश्वास बढ़े, युद्ध की आशंका कम हो और रणनीतिक लाभ प्राप्त हो सके।
भारत की रक्षा कूटनीति का लंबा और समृद्ध इतिहास रहा है। दुनिया के अलग-अलग देशों के साथ रक्षा संबंधों को मजबूत करने के लिए भारत ने विदेशों में 52 रक्षा कार्यालय स्थापित किए हैं। इसके अलावा, 100 से अधिक भारतीय अधिकारी विदेशों में स्थित दूतावासों और उच्चायोगों में रक्षा संबंधी जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं। ये रक्षा विंग मेजबान देशों के साथ रक्षा कूटनीति और रक्षा उद्योग तक पहुंच के प्रमुख केंद्रों के रूप में कार्य करते हैं। भारत अब केवल रक्षा हथियार खरीदने वाला देश नहीं, बल्कि सुरक्षा समाधान देने वाला और वैश्विक रक्षा साझेदार बन रहा है।
रक्षा कूटनीति : बजट और विस्तार
रक्षा मंत्रालय ने इस वित्त वर्ष में रक्षा कूटनीति के लिए 400 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं, जो पिछले वर्ष 300 करोड़ रुपये थे। वर्ष 2030 तक 90 रक्षा विंग स्थापित करने की योजना है, जिसमें अगले एक साल में 10 और रक्षा विंग जोड़े जाएंगे, जिससे कुल संख्या 62 हो जाएगी।
मौजूदा रक्षा विंग को उनके आसपास के 50 अन्य पड़ोसी देशों को कवर करने के लिए मान्यता दी जा रही है। अगले साल तक 157 देशों तक पहुंच बनाने की योजना है। भारत पश्चिम अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, कैरिबियन और प्रशांत द्वीप समूह में संपर्क अधिकारियों की उपस्थिति बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय संपर्क अधिकारियों की तैनाती नीतिगत मुद्दों, खुफिया सूचनाओं और त्वरित निर्णय लेने की प्रक्रिया को सक्षम बनाती है।
चार स्तंभों पर आधारित नई दिशा
‘रक्षा’ दस्तावेज चार स्तंभों पर टिका है-
रणनीतिक साझेदारी : प्रमुख भागीदारों और समूहों (क्वाड, आसियान) के साथ द्विपक्षीय और बहुपक्षीय सुरक्षा सहयोग, जो संयुक्त योजना, अंतरसंचालनीयता और संकट समन्वय को सक्षम बनाता है।
क्षमता निर्माण : दीर्घकालिक दृष्टि से संयुक्त अभ्यास, संस्थागत प्रशिक्षण और सेना-से-सेना संबंधों का विस्तार।
रक्षा निर्यात : भारत को विश्वसनीय वैश्विक रक्षा विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करना। भारत पहले से ही 100 से अधिक देशों को सैन्य हार्डवेयर का निर्यात करता है और नैतिक नीति का पालन करता है।
समुद्री सुरक्षा : मानवीय सहायता एवं आपदा राहत, समुद्री डकैती रोधी अभियान, समुद्री क्षेत्र की जागरूकता और मुक्त समुद्री नौवहन में भारत की भूमिका को मजबूत करना। भारत पड़ोस में ‘पहला प्रतिक्रियाकर्ता’ और हिंद महासागर क्षेत्र में ‘शुद्ध सुरक्षा प्रदाता’ के रूप में उभरा है।
कुल मिलाकर ‘रक्षा’ अब तक चल रहे मामला-दर-मामला रक्षा जुड़ाव से आगे बढ़कर एक निरंतर और सिद्धांत-आधारित दृष्टिकोण में बदलाव का संकेत देता है।
समुद्री सुरक्षा पर विशेष जोर
समुद्री सुरक्षा ‘रक्षा’ के चार स्तंभों में से भारत की रक्षा कूटनीति का सबसे सक्रिय घटक है। यह भारतीय नौसेना की पिछले एक दशक की मिशन-आधारित तैनाती, समुद्री डकैती विरोधी अभियान और मानवीय सहायता एवं आपदा राहत गतिविधियों को औपचारिक रूप देता है। इसके अलावा, हिंद महासागर क्षेत्र और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समान सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने वाले देशों के साथ सहयोग के माध्यम से विस्तारित नौसैनिक सहयोग जैसी गतिविधियां भारत की रक्षा कूटनीति को आगे बढ़ाती हैं। भारत ने वियतनाम, फिलीपींस, सिंगापुर, इंडोनेशिया आदि के साथ कई नौसैनिक अभ्यास किए हैं, क्योंकि इन देशों का दक्षिण चीन सागर में चीन के साथ समुद्री विवाद है।
‘मेक इन इंडिया’ में नया बदलाव
‘रक्षा’ के तहत ‘मेक इन इंडिया’ नीति में बड़ा बदलाव देखा गया है। पहले की नीति का उद्देश्य केवल अपने बलों के लिए स्वदेशीकरण करना था, जबकि नया रूप भारत को प्रमुख रक्षा विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने की बात करता है।
यह स्तंभ भारत को रक्षा उपकरणों के लिए प्रमुख वैश्विक रखरखाव, मरम्मत और पुनर्निर्माण केंद्र के रूप में भी बढ़ावा देता है। भारत पहले से ही विमानन क्षेत्र के लिए प्रमुख रखरखाव, मरम्मत और पुनर्निर्माण केंद्र है। इसी मॉडल का पालन जहाज निर्माण उद्योग में किया जा रहा है, जहां सरकार ने पिछले साल 69,725 करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की थी। जापान और दक्षिण कोरिया जैसी वैश्विक शक्तियों के साथ साझेदारी कर भारत हरित शिपिंग को बढ़ावा देने और समुद्री व्यापार के लिए विदेशी जहाजों पर निर्भरता कम करने का इरादा रखता है।
रक्षा निर्यात से वैश्विक साझेदारी तक
भारत की रक्षा कूटनीति का एक अच्छा उदाहरण रक्षा निर्यात में भारी वृद्धि है, जो वित्त वर्ष 2025-26 में 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। भारत ने 2030 तक 50,000 करोड़ रुपये का रक्षा निर्यात लक्ष्य निर्धारित किया है। रक्षा निर्यात न केवल हथियारों की आपूर्ति करता है, बल्कि बेहतर राजनयिक संबंध और विश्वसनीय साझेदारों को विकसित करने में भी मदद करता है। भारत ने अफ्रीकी देशों के साथ अच्छे संबंध स्थापित किए हैं और संयुक्त राष्ट्र शांति मिशनों के माध्यम से अफ्रीका में महत्वपूर्ण उपस्थिति बनाई है। यही कारण है कि रक्षा मंत्रालय अफ्रीका में 11 नए रक्षा विंग की योजना बना रहा है, जो अप्रत्यक्ष रूप से चीनी उपस्थिति का भी मुकाबला करती है।
वर्तमान अनिश्चित भू-राजनीतिक स्थिति भारत की रक्षा कूटनीति के लिए चुनौतियां पेश करती हैं। अमेरिका भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी के प्रति असंगत रहा है और क्वाड के प्रति उसकी प्रतिबद्धता कम स्पष्ट लगती है। रूस यूक्रेन युद्ध में लिप्त है, जिससे भारत के साथ रक्षा प्रतिबद्धताओं में देरी हुई है। चीन-भारत तनाव और पाकिस्तान के साथ निरंतर टकराव तत्काल सुरक्षा चिंताओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
‘रक्षा’ के लिए समग्र तस्वीर सकारात्मक और आशावादी है। यह दस्तावेज व्यापक राष्ट्रीय सुरक्षा की अवधारणा में भारत के बढ़ते विश्वास को इंगित करता है और रक्षा कूटनीति के प्रति रूढ़िवादी विचारधारा से अधिक सक्रिय दृष्टिकोण में बदलाव को दर्शाता है। यह विशेष रूप से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते हस्तक्षेप के प्रति एक अप्रत्यक्ष संदेश भी देता है। ‘रक्षा’ दस्तावेज रक्षा मंत्रालय, विदेश मंत्रालय और सशस्त्र सेनाओं में संस्थागत स्पष्टता लाता है। कुल मिलाकर, भारत ने ‘रक्षा’ के माध्यम से एक जिम्मेदार सैन्य शक्ति बनने की अपनी वैश्विक महत्वाकांक्षाओं की घोषणा की है, जो नियम-आधारित विश्व व्यवस्था में विश्वास करती है।

















