'संत रविदास ने जगाई नई चेतना'
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‘संत रविदास ने जगाई नई चेतना’

प्रतिनिधि सभा में संत शिरोमणि श्री रविदास जी के 650वें प्राकट्य वर्ष के अवसर पर सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले द्वारा जारी वक्तव्य

Written byPanchjanyaPanchjanya
Mar 23, 2026, 01:38 pm IST
inभारत, विश्लेषण, संघ @100, हरियाणा
संत शिरोमणि सद्गुरु रविदास

संत शिरोमणि सद्गुरु रविदास

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संत शिरोमणि सद्गुरु रविदास जी के 650वें प्राकट्य वर्ष के अवसर पर उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करता है। हमारी श्रेष्ठ संत परंपरा ईश्वर की भारत को एक विशिष्ट देन है। हमारे प्रदीर्घ इतिहास के प्रवाह में इस महान संत परंपरा ने जहां समाज में ईश्वर की उपासना और भक्ति भाव का जागरण किया, वहीं सामाजिक कुरीतियां और भेदभाव का उन्मूलन करते हुए समरस समाज के दृढ़ीकरण के प्रयास किए। साथ ही उन्होंने विदेशी शासकों के अत्याचारों के विरुद्ध संघर्ष के लिए समाज को जागृत और सिद्ध भी किया है।

इस महान संत परंपरा में संत श्री रविदास जी का विशिष्ट स्थान है। उनका कर्मशील जीवन और कार्य हम सबके लिए प्रेरणास्रोत है। गृहस्थ होते हुए भी सांसारिक बातों से अलिप्त रहकर साधु-संतों के प्रति श्रद्धा और दीन-हीनों के प्रति सेवा उनका सहज स्वभाव था, जो आध्यात्मिक दृष्टि से परिपूर्ण था। उन्होंने अपने जीवन से समाज में श्रम की प्रतिष्ठा और शुद्ध, सात्विक एवं पारदर्शी आचरण की महत्ता पुनस्स्थापित की।

संत श्री रविदास जी भक्ति की भाव-धारा के महान संत थे, जिन्होंने समाज में एक नई चेतना प्रवाहित की। उन्होंने जन्म के आधार पर ऊंच-नीच के भेद को नकारते हुए आचरण को ही श्रेष्ठता की कसौटी माना। रूढ़ियों और कुरीतियों से समाज की मुक्ति तथा कालबाह्य परंपराओं को त्यागने और काल—सुसंगत सामाजिक परिवर्तनों को अंगीकार करने हेतु समाज का मानस बनाने में उनकी ऐतिहासिक भूमिका रही है। उनके विचारों का महत्व समझकर श्री गुरुग्रंथ साहिब में उनकी 41 वाणियों को ‘शबद’ रूप में समाहित किया गया है।

सामान्य पारिवारिक पृष्ठभूमि से आने वाले संत श्री रविदास जी का ईश्वर-भक्ति, सेवा भाव तथा समाज के प्रति निश्छल प्रेम के कारण काशी के विद्वत्-जन सहित समाज के सभी वर्गों ने उनकी महानता को स्वीकृत किया। काशी नरेश, झाली रानी तथा मीराबाई जैसे राजपरिवारों के सदस्यों ने भी उनको अपना गुरु माना।

गुरु और शिष्य के रूप में संत श्री रविदास जी और मीराबाई का नाता निर्गुण और सगुण भक्ति धाराओं का मिलन है तथा जातिभेद मानने वालों के लिए अनुकरणीय सीख भी है। मुस्लिम आक्रमणकारियों के आतंक के उस कठिन काल में भक्ति की निर्मल धारा को प्रवाहित करते हुए संत श्री रविदास जी ने धर्म की श्रेष्ठता की उद्घोषणा की और लोगों से धर्मपालन का आग्रह किया।

सद्गुरु संत श्री रविदास जी को मतांतरित कर मुस्लिम बनाने के अनेक प्रयास हुए, किन्तु उनकी भक्ति और आध्यात्मिक साधना से प्रभावित होकर उन्हें मतांतरित करने वाले ही उनके अनुयायी बन गए। वर्तमान समय में जब विविध विभाजनकारी शक्तियां जन-मानस को वर्ग और जाति के आधार पर बांटने का प्रयास कर रही हैं, तब पूज्य संत श्री रविदास जी के जीवन-संदेश के मर्म को समझकर हम सभी को देश और समाज की एकात्मता के लिए कार्य करने का संकल्प लेने की आवश्यकता है।

Topics: एकात्मताश्रम की प्रतिष्ठाशिरोमणि सद्गुरु रविदाससंत शिरोमणिप्राकट्य वर्षनई चेतनाकुरीतियों का उन्मूलनराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघसात्विक आचरसामाजिक समरसताबेगमपुरामतांतरणकाल-सुसंगतधर्म परिवर्तनविभाजनकारी शक्तियाँपाञ्चजन्य विशेष
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