ऑस्ट्रेलिया में ईरान की खिलाड़ियों को शरण: सत्ता का मुखिया बदला, परंतु सरकार नहीं?
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ऑस्ट्रेलिया में ईरान की खिलाड़ियों को शरण: सत्ता का मुखिया बदला, परंतु सरकार नहीं?

खामनेई की मौत पर जश्न मनाने वाली ईरानी महिलाओं के बीच, महिला फुटबॉल टीम ने राष्ट्रीय गान न गाकर विरोध किया और ऑस्ट्रेलिया में शरण ली। जानिए पूरी कहानी और नारीवादियों की चुप्पी का सच।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा — edited by कुलदीप सिंह
Mar 13, 2026, 10:06 am IST
inविश्व, विश्लेषण
Iran women Football Player Austrelia Assylum

हाल ही में ईरान के सर्वोच्च नेता खामनेई की मौत पर ईरानी लोगों का जश्न सामने आया था। पूरे विश्व में असंख्य ईरानी लड़कियों ने, जश्न मनाया था। उन्होंने कहा था कि अब ईरान से बाहर रह रही लड़कियों को अब शांति मिली है और यह आस भी जगी है कि अब शायद ईरान की लड़कियों को आजादी मिलेगी।

मुखिया मारा गया, लेकिन नहीं बदली सत्ता

परंतु ऐसा नहीं हुआ। मुखिया तो मारा गया, परंतु सत्ता नहीं बदली। सत्ता का वह स्वभाव नहीं बदला जो लड़कियों को आजादी की सांस नहीं लेने देता है। वह शासन अभी तक है जो लगातार ही लड़कियों की आजादी छीनता रहता है। वह शासन इस सीमा तक महिलाओं के लिए नृशंस है कि लड़कियां बाहर के देशों में शरण मांगने के लिए अक्सर बाध्य हो जाती हैं।

हालिया मामला है ईरानी फुटबॉल खिलाड़ियों का ऑस्ट्रेलिया में शरण लेने का। हाल ही में ईरान की कई महिला फुटबॉलर्स ने ऑस्ट्रेलिया में शरण मांगी और उन्हें शरण मिल भी गई। मगर ईरान के शासक खामनेई की मौत पर आँसू बहाने वाला भारत का कथित प्रगतिशील वर्ग इस बात पर पूरी तरह से चुप रहा कि आखिर इन लड़कियों को अपने देश में ऐसा क्या खतरा लगा कि इन्होनें एक पराए मुल्क में शरण मांगी? पूरी तरह से ये लोग शांत रहे। और इसी बीच सोशल मीडिया पर मलेशिया से ऐसे वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए, जिनमें ईरान की महिला खिलाड़ियों को घेरकर कुछ लोग ईरान की फ्लाइट में ले जाने का दावा किया गया। इस टीम की पाँच खिलाड़ियों ने ऑस्ट्रेलिया में शरण मांगी थी, जो उन्हें मिल गई है।

क्या था मामला?

एएफसी एशियन कप 2026 के उद्घाटन मैच के दौरान ईरान की महिला फुटबॉल टीम ने विरोध दर्ज करते हुए अपने मुल्क का तराना नहीं गाया था। और इसे लेकर ईरानी मीडिया ने इन खिलाड़ियों को “war traitors” की संज्ञा दी थी। और इसके साथ ही उनके साथ कड़ी से कड़ी कार्यवाही करने की भी मांग की गई थी।

यह महिलाओं का मौन विरोध था। विरोध का तरीका गलत हो सकता है, परंतु उसके लिए उन्हें युद्ध का धोखेबाज कहना उचित नही है। यह जानते हुए कि ईरान में महिलाओं की स्थिति क्या है, यदि महिला खिलाड़ी कुछ विरोध दर्ज करती भी हैं तो क्या सरकार को उनकी भावनाओं को समझना नहीं चाहिए? या फिर उन्हें दंड देना चाहिए? क्या यह सरकार का उत्तरदायित्व नहीं है कि वह अपने मुल्क की अपनी लड़कियों में सरकार के प्रति भरे हुए भय को समाप्त करे? क्या वह मुल्क उन लड़कियों का नहीं है? आखिर वह कौन सी भावना थी, जिसने उन्हें अपने मुल्क के ही तराने के खिलाफ खड़ा कर दिया? यदि इस सीमा तक विद्रोह है तो क्या उस आक्रोश को समझा नहीं जाना चाहिए?

दुर्भाग्य की बात यही है कि ईरान की सरकार के प्रति वहाँ की लड़कियों का जो आक्रोश है उसे समझने के स्थान पर लड़कियों को दबाने का कार्य किया जाने लगा है। प्रश्न यही है कि उस आक्रोश को, उस पीड़ा को समझा क्यों नहीं जाता है जो लड़कियों के हाथों उस मुल्क के तराने का विरोध करवा देती है। लड़कियों ने विरोध कर दिया और लड़कियों के खिलाफ मुल्क में कुछ लोगों ने माहौल बना दिया। वे एशिया कप में बहुत आगे स्थान नहीं बना पाईं थीं और टीम की पाँच खिलाड़ियों ने ऑस्ट्रेलिया में ही शरण ले ली थी। उनकी शरण की मांग पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी पोस्ट लिखा था और ऑस्ट्रेलिया से उन्हें शरण देने का अनुरोध किया था।

इसके बाद उन पांचों खिलाड़ियों को ऑस्ट्रेलिया में शरण मिल गई थी। हालांकि एक दो और खिलाड़ियों ने भी यह कदम उठाया था, मगर उन्होनें यह निर्णय वापस ले लिया था। और अपने मुल्क जाने का फैसला किया था।

इसे भी पढ़ें: चौंकाने वाली रिपोर्ट: ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई कोमा में, पैर कटा, लीवर-पेट क्षतिग्रस्त

मलेशिया में ईरानी राजदूत ने टीम का स्वागत किया था

मलेशिया पहुँचने पर ईरान की टीम का स्वागत कुआलालंपुर में मलेशिया में ईरान के राजदूत, वलीउल्लाह मोहम्मदी ने किया था और टीम एक होटल में आगे की यात्रा की योजना के दौरान रुकी थी। ऐसा सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि उन्हें उस दौरान भी धमकाया गया था। हालांकि ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्मायली बकेई ने एक्स पर लिखा था कि खिलाड़ियों को डरने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने लिखा था कि “चिंता न करें! ईरान खुली बाहों से आपका स्वागत करता है!”

ईरान की फुटबॉल नियामक इकाई ने का ऑस्ट्रेलिया पर आरोप

इसी बीच ईरान की फुटबॉल की नियामक इकाई ने ऑस्ट्रेलिया पर यह आरोप लगाया कि उसने ईरान की खिलाड़ियों को “बंधक” बनाकर रखा हुआ है और उन्हें ईरान वापस नहीं आने दे रही है। हालांकि उनके इस दावे की पोल ऑस्ट्रेलिया में हो रहे वे तमाम विरोध प्रदर्शन खोल रहे हैं, जो ऑस्ट्रेलिया में रह रहे ईरानी नागरिक ईरानी खिलाड़ियों को ले जा रही बस के सामने कर रहे थे।

वे यही कह रहे थे कि इन लड़कियों को आजाद करो!

यह भी कहा जा रहा है कि इन लड़कियों को ईरान में रह रहे अपने परिवार को लेकर खतरा था और उन्हें डर था कि उनके किसी भी कदम का ईरान में रह रहे उनके परिजनों पर उल्टा प्रभाव पड़ेगा।

एक बार फिर से नारीवादियों की चुप्पी

यह और भी हैरान करने वाली बात है कि इस मामले पर भी एक बार फिर से वैश्विक स्तर पर नारीवादियों की चुप्पी देखने को मिली। भारत से लेकर यूरोप की वामपंथी नारीवादी औरतें इस मामले पर भी उसी तरह से चुप्पी साधे रहीं, जिस तरह से अभी तक ईरान की तमाम महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचारों पर साधती रहीं हैं। यह शर्मनाक चुप्पी एक बार फिर से अपनी बेशर्मी की कहानी कह रही है।

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