विश्व को मर्यादा का बोध कराना भारत का नैतिक दायित्व : डॉ. मोहन भागवत जी
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विश्व को मर्यादा का बोध कराना भारत का नैतिक दायित्व : डॉ. मोहन भागवत जी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि भारत का दायित्व भाषण नहीं, आचरण से विश्व को मर्यादा, सत्य और संतुलन का बोध कराना है। सरसंघचालक जी राजस्थान के डीडवाना-कुचामन जिले के छाेटीखाटू में जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के 11वें आचार्य महाश्रमण के सानिध्य में आयोजित 162वें मर्यादा महोत्सव को संबोधित कर रहे थे।

Written byएजेंसीएजेंसी — edited by Shivam Dixit
Jan 22, 2026, 04:41 pm IST
in राजस्थान
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नागौर (हि.स.) । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने गुरुवार को यहां कहा कि भारत का ऐतिहासिक और नैतिक दायित्व विश्व को मर्यादा का बोध कराना है और यह कार्य न तो भाषणों से होगा, न पुस्तकों से, बल्कि व्यवहार और आचरण के माध्यम से ही संभव है।

छोटीखाटू में आयोजित 162वां मर्यादा महोत्सव

सरसंघचालक जी ने राजस्थान के डीडवाना-कुचामन जिले के छोटीखाटू में जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के 11वें आचार्य महाश्रमण के सानिध्य में आयोजित 162वें मर्यादा महोत्सव को संबोधित कर रहे थे। मर्यादा महोत्सव में देश के विभिन्न राज्यों से बड़ी संख्या में तेरापंथ समाज के श्रद्धालु भाग ले रहे हैं।

सत्य और धर्म भारत की जीवन पद्धति

सरसंघचालक जी ने स्पष्ट किया कि भारत की परंपरा में सत्य और धर्म को केवल वैचारिक अवधारणा नहीं बल्कि जीवन पद्धति के रूप में अपनाया गया है और यही उसकी वैश्विक विशिष्टता है। आज विश्व जिन संघर्षों, सामाजिक विघटन और अस्थिरताओं से गुजर रहा है, उनके समाधान के लिए केवल तकनीक, पूंजी या सैन्य शक्ति पर्याप्त नहीं है। आवश्यकता ऐसे नैतिक ढांचे की है, जो मानव व्यवहार को मर्यादा में बांध सके। भारत के पास यह दृष्टि उपलब्ध है।

आचरण से ही समाज प्रेरित होता है

सरसंघचालक जी ने कहा कि शाश्वत सत्य समय और परिस्थितियों से परे होता है, किंतु उसका अनुप्रयोग हर युग में परिस्थितियों के अनुरूप करना पड़ता है। किसी भी विचार की सार्थकता तब सिद्ध होती है, जब समाज के श्रेष्ठ लोग उसे अपने जीवन में जीकर प्रस्तुत करते हैं। समाज का सामान्य जन उपदेश से नहीं, बल्कि आचरण से प्रेरित होता है। इसलिए भारत में परंपरागत रूप से आध्यात्मिक और नैतिक जीवन जीने वाले व्यक्तियों को आदर्श माना गया है।

पर्यावरण और विकास में संतुलन की आवश्यकता

उन्होंने कहा कि पर्यावरण और विकास के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि वर्तमान वैश्विक संकटों के मूल में असंतुलन है। विकास की अंधी दौड़ ने प्रकृति के साथ मनुष्य के संबंध को कमजोर किया है। भारतीय परंपरा इस संदर्भ में सह-अस्तित्व और संतुलन की शिक्षा देती है। प्रकृति के साथ टकराव नहीं, बल्कि समन्वय ही दीर्घकालिक समाधान प्रस्तुत कर सकता है और यही दृष्टि आज के समय में अधिक प्रासंगिक हो गयी है।

धन साधन है, साध्य नहीं

उन्होंने कहा कि भारतीय दृष्टि में भौतिक उन्नति आवश्यक है, किंतु वह जीवन का अंतिम उद्देश्य नहीं है। धन अर्जन को जीवन का साधन माना गया है, साध्य नहीं। इसी कारण भारतीय समाज में आज भी दान, सेवा और परोपकार की प्रवृत्ति जीवित है। भारत की संस्कृति व्यक्ति को यह सिखाती है कि अर्जन से अधिक महत्वपूर्ण अर्जित साधनों का समाजहित में उपयोग है। भारत की सभ्यता सत्य की सतत खोज पर आधारित रही है।

विविधता में एकता का भारतीय दर्शन

सरसंघचालक जी ने कहा कि भारतीय चिंतन की मूल मान्यता यह है कि विश्व में विविधता दिखाई देती है, किंतु मूल तत्व एक है। इस दृष्टि से सभी प्राणी परस्पर जुड़े हुए हैं और सब ‘अपने’ हैं। यही भाव जीवन में मर्यादा और संयम को जन्म देता है। जब व्यक्ति यह मानता है कि समस्त सृष्टि एक ही मूल से जुड़ी है, तब उसके व्यवहार में स्वाभाविक रूप से संतुलन और करुणा आती है।

भारतीय परंपरा के मूल स्तंभ

उन्होंने कहा कि सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य और संयम जैसे मूल्य भारतीय परंपरा के मूल स्तंभ हैं। ये केवल नैतिक सिद्धांत नहीं, बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय संतुलन के आधार हैं।

कानून से आगे धर्म की आवश्यकता

सरसंघचालक जी ने कहा कि केवल कानून के माध्यम से जीवन की सभी जटिल समस्याओं का समाधान संभव नहीं है। कानून एक सीमा तक मार्गदर्शन कर सकता है, किंतु उसके आगे धर्म, अर्थात सार्वभौमिक नैतिक मर्यादा का सहारा आवश्यक होता है। धर्म का अर्थ किसी मत या पंथ तक सीमित नहीं, बल्कि वह तत्व है जो सदा, सर्वत्र और सर्वथा सभी के लिए कल्याणकारी हो।

भारत ने कभी मूल्य नहीं थोपे

उन्होंने कहा कि भारत ने कभी भी अपने मूल्यों को बल, सैन्य शक्ति या आर्थिक दबाव के माध्यम से विश्व पर थोपने का प्रयास नहीं किया। भारत की पद्धति उदाहरण प्रस्तुत करने की रही है। जब कोई राष्ट्र या समाज अपने आचरण से यह सिद्ध करता है कि उसके मूल्य मानवता के लिए हितकारी हैं, तो अन्य समाज स्वाभाविक रूप से उनका अनुकरण करते हैं।

आचरण की प्रामाणिकता ही विश्वसनीयता का आधार

सरसंघचालक भागवत जी ने कहा कि किसी भी विचार या मूल्य को विश्व तक पहुंचाने के लिए उसका स्वयं में जीवित होना आवश्यक है। जो स्वयं प्रकाशित होता है, वही दूसरों को प्रकाश दे सकता है। आचरण की प्रामाणिकता ही किसी भी विचार की विश्वसनीयता का आधार बनती है। असत्य तत्काल लाभ दे सकता है, किंतु अंततः वह दुख का कारण बनता है, जबकि सत्य आधारित आचरण दीर्घकालीन शुभ परिणाम ही देता है।

Topics: धर्म और मर्यादाRSSसत्य अहिंसाBharat maryadaIndian culture valuesDharma and moralityमोहन भागवतMaryada Mahotsav Rajasthanभारतीय संस्कृतिपर्यावरण संतुलनRSS Chief SpeechMohan Bhagwat statementमर्यादा महोत्सव
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