
इस श्लोक की मूल बात यहां भारतभूमि में जन्म मिलने को ‘अमृतकलश’ कहा गया है और सत्कर्म न करके गलत राह पर चलने को ‘विषभाण्ड’ (विष से भरा घड़ा) चुनना कहा गया है।
आज का श्लोक :
सम्प्राप्य भारते जन्म सत्कर्मसु पराङ्मुखः।
पीयूषकलशं हित्वा विषभाण्डं स इच्छति॥
भावार्थ :
भारतभूमि पर जन्म मिलने पर भी जो सत्कर्मों से दूर रहता है, वह अमृतकलश को फोड़ कर विष से भरे घड़े को चाहने वाले के समान है।
आज के लिए प्रांसगिक : भारत का दर्शन हमेशा से ‘सत्कर्म’ (सच्चरित्रता, सेवा, और ईमानदारी) को प्राथमिकता देता आया है। आज के समय में जब लोग जल्दी पैसा कमाने, धोखाधड़ी करने, या अनैतिक तरीकों से सफलता पाने की होड़ में लगे हैं, यह श्लोक याद दिलाता है कि आत्म-सम्मान और शांति (अमृत) को खोकर अनैतिकता (विष) को अपनाना अंततः विनाशकारी ही होता है.

















