भारत में गुरु पूर्णिमा का पर्व केवल एक तिथि नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा है, जो प्राचीनकाल से हमारे जीवन और चिंतन का अभिन्न अंग रही है। यह पर्व न केवल ऐतिहासिक महत्व रखता है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना का मूल स्रोत भी है। हमारे धर्मग्रंथों, महाकाव्यों, दर्शनों और लोक परंपराओं में गुरु का स्थान सर्वोच्च माना गया है। कहीं गुरु रूप में कोई संत, कहीं ऋषि-महर्षि, और कहीं स्वयं भगवान तक को प्रतिष्ठित किया गया है। और कहीं गुरु के रूप में केसरिया ध्वज-एक चेतन प्रतीक, जो त्याग, तप और तेज का प्रतिनिधि है।
गुरु और भगवा ध्वज
दोनों किसी व्यक्ति या वस्तु मात्र नहीं, बल्कि तत्व हैं। जहां गुरु अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाता है, वहीं भगवा ध्वज त्याग और बलिदान की प्रेरणा देता है। इतिहास साक्षी है कि जब भी देश पर संकट आया, हमारे वीरों ने केसरिया ध्वज को गुरु मानकर रणभूमि में उतरने का संकल्प लिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इस परंपरा को युगानुकूल रूप में अपनाया। डॉ. हेडगेवार ने आज से 100 वर्ष पूर्व जिस संगठन की नींव रखी, उसमें कोई व्यक्तिगत गुरु नहीं है, बल्कि एक ध्वज है, जो प्रेरणा भी है और दिशा भी। वह ध्वज केवल एक रंग या कपड़ा नहीं है, वह भारत के चरित्र, समर्पण और संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। आज भी संघ के स्वयंसेवक, इसी भगवा ध्वज से प्रेरणा लेकर, आपदा और संकट के समय राष्ट्र के लिए तन-मन-धन से सेवा में जुटते हैं।
गुरु पूर्णिमा का महत्व
गुरु-शिष्य परंपरा की शुरुआत स्वयं भगवान ब्रह्मा–विष्णु–महेश से मानी जाती है और वेदों में ‘श्रुति’ परंपरा के माध्यम से यह ज्ञान गुरु से शिष्य तक पहुंचाया गया। वेदव्यास जी को गुरु पूर्णिमा के साथ विशेष रूप से जोड़ा जाता है, क्योंकि उन्होंने वेदों का संकलन किया, जिनमें ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद शामिल हैं। इसलिए गुरु पूर्णिमा को ‘व्यास पूर्णिमा’ भी कहते हैं। महर्षि व्यास ने राष्ट्र जीवन के श्रेष्ठतम गुणों को निर्धारित करते हुए उनके महान आदर्शों को चित्रित करते हुए विचार तथा आचारों का समन्वय करते हुए न केवल भारतवर्ष का अपितु संपूर्ण मानव जाति का मार्गदर्शन किया। इसलिए भगवान वेदव्यास जगत के गुरु हैं।
रामायण और महाभारत
रामायण और महाभारत में गुरु को केवल शिक्षा देने वाले नहीं, बल्कि धर्म, नीति और मोक्षमार्ग के पथप्रदर्शक के रूप में देखा गया है। गुरु स्वयं जीवन का प्रकाश हैं, और गुरु पूर्णिमा उसी परंपरा की स्मृति है। महर्षि वशिष्ठ न केवल राजा दशरथ के कुलगुरु थे, बल्कि उन्होंने श्रीराम, श्रीलक्ष्मण, श्रीभरत और श्रीशत्रुघ्न को वेद, धर्म, नीति और राज्यशास्त्र की गहन शिक्षा दी। उनका शिक्षण केवल शास्त्रों तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने धर्मराज्य की अवधारणा को भी प्रतिपादित किया और राम को मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
महर्षि विश्वामित्र, श्रीराम और श्रीलक्ष्मण के युद्ध-गुरु के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उन्होंने दोनों राजकुमारों को ताड़का और मारीच जैसे राक्षसों से युद्ध करना सिखाया और उन्हें गायत्री मंत्र, बाला और अतिबाला जैसी दिव्य विद्याओं की दीक्षा दी। यह केवल युद्ध कौशल नहीं था, बल्कि आत्मशक्ति, संयम और धर्मरक्षा की शिक्षा भी थी। महर्षि विश्वामित्र की दीक्षा के बाद ही श्रीराम एक साधारण राजकुमार से धर्म-रक्षक योद्धा के रूप में प्रतिष्ठित हुए और आगे चलकर उन्होंने राक्षसी शक्तियों का विनाश कर लोककल्याण का मार्ग प्रशस्त किया। हनुमान जी और भगवान श्रीराम संवाद में भक्ति, सेवा और शिष्यत्व की चरम अभिव्यक्ति मिलती है। यद्यपि हनुमान जी परम बलवान, ज्ञानी और सिद्ध थे, फिर भी उन्होंने स्वयं को भगवान् श्रीराम का शिष्य माना और पूर्ण समर्पण के साथ उनकी सेवा में जीवन अर्पित कर दिया। हनुमान जी ने अपने कर्म और वचन से बार-बार यह दर्शाया कि उनके लिए सबसे बड़ा धर्म रामकाज है।
महाभारत में गुरु की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और निर्णायक रही है, विशेषकर द्रोणाचार्य के रूप में। द्रोणाचार्य ने कौरवों और पांडवों सहित सभी राजकुमारों को धनुर्विद्या की शिक्षा दी, परंतु अर्जुन को उनकी एकाग्रता, समर्पण और गुरु-सेवा के कारण विशेष प्रिय माना। उन्होंने केवल युद्धकला ही नहीं, बल्कि एक सच्चे शिष्य के गुण भी सिखाए। भगवान कृष्ण न केवल अर्जुन के मित्र और सारथी थे, बल्कि उनके गुरु भी बने। महाभारत के युद्धभूमि में जब अर्जुन मोहवश शस्त्र त्याग कर बैठ गए, तब कृष्ण ने उन्हें केवल युद्ध का ही नहीं, बल्कि धर्म, आत्मा, ब्रह्म, कर्म, और मोक्ष का ज्ञान दिया।
भगवा ध्वज का गुरु स्वरूप
भगवा ध्वज भारत की आध्यात्मिक, सैन्य, सांस्कृतिक और त्याग परंपरा का प्रतीक रहा है। इसकी प्रतिष्ठा केवल एक झंडे के रूप में नहीं, बल्कि गुरु–तत्व के प्रतीक रूप में भी रही है। यही कारण है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठन में किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि ध्वज को गुरु माना जाता है। यह कोई आधुनिक रचना नहीं, बल्कि इसका आधार भारत के वेदों, उपनिषदों, महाकाव्यों, पुराणों, और दर्शन शास्त्रों में गहराई से निहित है। वेदों में ध्वज को वीरता और संगठन का प्रतीक माना गया है। ऋग्वेद में देवताओं से प्रार्थना की जाती है कि वे अपने रथों और ध्वजों सहित हमारे यज्ञ में पधारें।
हमारे समाज की सांस्कृतिक जीवनधारा में यज्ञ का बड़ा महत्व रहा है। ‘यज्ञ’ शब्द के अनेक अर्थ हैं। व्यक्तिगत जीवन को समर्पित करते हुए समष्टि जीवन को परिपुष्ट करने के प्रयास को ही ‘यज्ञ’ कहा गया है। श्रद्धामय, त्यागमय, सेवामय, तपस्यामय जीवन व्यतीत करना ही यज्ञ है। यज्ञ के अधिष्ठात्री देवता अग्नि हैं। अग्नि का प्रतीक ज्वाला, और ज्वालाओं का प्रतिरूप-हमारा परमपवित्र ‘भगवा ध्वज।’
यह ध्वज-परंपरा रामायण और महाभारत में और अधिक सजीव हो उठती है। रामायण में युद्ध के समय रथों पर ध्वज नेतृत्व, शक्ति और विजयी संकल्प का प्रतीक था। वहीं महाभारत में अर्जुन के रथ पर स्थित कपिध्वज (हनुमानध्वज) को विशेष महत्व प्राप्त है।
अज्ञान का प्रतीक है अंधकार, और ज्ञान का प्रतीक है सूर्य। पुराणों में कहा गया है कि सूर्य नारायण रथ में बैठकर आते हैं। उनके रथ में सात घोड़े लगे हैं और उनके आगमन के बहुत पहले उनके रथ की सुनहरी गैरिक ध्वजा फड़कती हुई दिखाई देती है। इसी ध्वज को हमने हमारे समाज का परम आदरणीय प्रतीक माना है। यह भगवान का ध्वज है। इसीलिए उसे हम भगवद-ध्वज कहते हैं। उसी से आगे चलकर शब्द बना– ‘भगवा ध्वज।’ अतः यज्ञ-ज्वाला का प्रतीक, आत्म-समर्पण का द्योतक, पवित्र ध्वज ही अपना आदर्श है।
मध्यकाल में राजपूत योद्धा युद्ध में जाने से पूर्व केसरिया ध्वज को प्रणाम करते और उसे इष्टदेव तथा गुरु का स्थान देते थे। यही परंपरा मराठा साम्राज्य में भी रही। छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपने राज्याभिषेक के समय भगवा ध्वज को गुरु स्वीकार करते हुए घोषणा की थी। ध्वज को गुरु मानने की यह परंपरा योग और संत परंपरा में भी प्रमुख रूप से दिखाई देती है। नाथ संप्रदाय और रामानंद संप्रदाय में केसरिया वस्त्र और ध्वज गुरु के प्रतीक माने जाते हैं। अनेक मठों और अखाड़ों में शिष्य को दीक्षा ध्वज के नीचे दी जाती है, और शिष्य सबसे पहले उस गुरु-स्वरूप ध्वज को प्रणाम करता है।
संघ और भगवा ध्वज
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक किसी व्यक्ति या ग्रंथ की जगह भगवा ध्वज को अपना मार्गदर्शक और गुरु मानते हैं। जब डॉ. हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रवर्तन किया, तब अनेक स्वयंसेवक चाहते थे कि संस्थापक के नाते वे ही इस संगठन के गुरु बनें; क्योंकि उन सबके लिए डॉ. हेडगेवार का व्यक्तित्व अत्यंत आदरणीय और प्रेरणादायी था। इस आग्रहपूर्ण दबाव के बावजूद डॉ. हेडगेवार ने हिंदू संस्कृति, ज्ञान, त्याग और संन्यास के प्रतीक भगवा ध्वज (केसरिया झंडा) को गुरु के रूप में प्रतिष्ठित करने का निर्णय किया। हिंदू पंचांग के अनुसार हर वर्ष व्यास पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा) के दिन संघ-स्थान पर एकत्र होकर सभी स्वयंसेवक भगवा ध्वज का विधिवत् पूजन करते हैं।
अपनी स्थापना के तीन साल बाद संघ ने 1928 में पहली बार गुरुपूजा का आयोजन किया था। तब से यह परंपरा अबाध रूप से जारी है और भगवा ध्वज का स्थान संघ में सर्वोच्च बना हुआ है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने मुख्यत: तीन कारणों से भगवा ध्वज को गुरु के रूप में स्वीकार किया-एक, ध्वज के साथ ऐतिहासिकता जुड़ी है और यह किसी संगठन को एकजुट रखते हुए उसके विकास में सहायक होता है। दूसरा, भगवा ध्वज में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की वह विचारधारा सर्वाधिक प्रखर रूप में प्रतिबिंबित होती है, जो संघ की स्थापना का प्रबल आधार है। तीसरा, किसी व्यक्ति की जगह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रतीक भगवा ध्वज को सर्वोच्च स्थान देकर संघ यह सुनिश्चित करने में सफल रहा कि वह व्यक्ति-केंद्रित संगठन नहीं बनेगा। यह सोच बहुत सफल रही।
पुनर्जागरण का प्रतीक
सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह ने जब हिंदू धर्म की रक्षा के लिए हजारों सिख योद्धाओं की फौज का नेतृत्व किया, तब उन्होंने केसरिया झंडे का उपयोग किया। यह ध्वज हिंदुत्व के पुनर्जागरण का प्रतीक है। इस झंडे से प्रेरणा लेते हुए महाराजा रणजीत सिंह के शासन काल में सिख सैनिकों ने अफगानिस्तान के काबुल-कंधार तक को जीत लिया था। उस समय सेनापति हरि सिंह नलवा ने सैनिकों का नेतृत्व किया था। जब राजस्थान पर मुगलों का हमला हुआ, तब राणासांगा और महाराणा प्रताप के सेनापतित्व में राजपूत योद्धाओं ने भी भगवा ध्वज से वीरता की प्रेरणा लेकर आक्रमणकारियों को रोकने के लिए ऐतिहासिक युद्ध किए। छत्रपति शिवाजी और उनके साथियों ने मुगल शासन से मुक्ति और हिंदू राज्य की स्थापना के लिए भगवा ध्वज की छत्रछाया में ही निर्णायक लड़ाइयां लड़ीं।
संघ और गुरु दक्षिणा
संघ में गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु दक्षिणा कार्यक्रम मनाया जाता है। इस कार्यक्रम में सभी स्वयंसेवक अपने गुरु- भगवा ध्वज को प्रणाम करते हैं, पुष्प चढ़ाते हैं और एक अचिह्नित लिफाफे में संगठन के लिए एक पुष्प के साथ अपना वर्ष भर का श्रेष्ठ योगदान समर्पित करते हैं। संघ की प्रत्येक शाखा गुरु पूर्णिमा से गुरुदक्षिणा के कार्यक्रमों का आयोजन आरंभ करती है। लगभग एक माह तक ये आयोजन चलते हैं। इसके दो मुख्य उद्देश्य हैं-पहला, प्राचीन भारत की उस गुरु-शिष्य परंपरा को आगे बढ़ाना, जिसमें शिक्षा पूरी करने वाले सभी शिष्य आदर और कृतज्ञता के भाव से अपने गुरु को यथाशक्ति दक्षिणा अर्पित करते थे। इसमें धन की राशि नहीं, कृतज्ञता की भावना महत्व रखती है। गुरु पूजा का कार्यक्रम बड़ी सादगी के साथ संपन्न किया जाता है। स्वयंसेवक इस कार्यक्रम में गणवेश में नहीं, बल्कि पारंपरिक भारतीय परिधान (धोती-कुर्ता या पाजामा-कुर्ता) में उपस्थित होते हैं। गुरुपूजा कार्यक्रम का प्रारंभ भी शाखा लगने की तरह किसी कमरे या सभागार में भगवा ध्वज फहराने के साथ होता है; लेकिन उस दिन सिर्फ ध्वज-पूजन और बौद्धिक का कार्यक्रम होता है। पूजन के ध्वजदंड के निकट धूप-दीप जलाकर वहां डॉ. हेडगेवार और श्रीगुरुजी के बड़े आकार के चित्र रखे जाते हैं। पास में ही पुष्प रखे होते हैं, जिनसे ध्वज की पूजा की जा सके।
कार्यक्रम में विशेष रूप से आमंत्रित किसी गणमान्य व्यक्ति या संघ के किसी वरिष्ठ अधिकारी का बौद्धिक संबोधन होता है। संघ अपेक्षा करता है कि शाखा अपने क्षेत्र में रहने वाले किसी सम्मानित डॉक्टर, वकील, प्राध्यापक, सेना के अवकाश-प्राप्त अधिकारी या सुविख्यात व्यक्ति को मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित करने के लिए गुरु दक्षिणा कार्यक्रम के अवसर का उपयोग करें। इससे संगठन को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से इतर सदस्यों को शामिल करने में मदद मिलती है। दैनिक शाखा की तरह कार्यक्रम का समापन संघ की ध्वज प्रार्थना से होता है। वर्ष में एक बार ‘गुरु दक्षिणा’ दी जाती है।
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