भारत की दीर्घ और जीवंत ज्ञान परम्परा के विषय में कुछ भी कहने से पूर्व हमें एक मूलभूत प्रश्न पर विचार करना होगा। क्या पराधीन मानस के साथ व्यक्ति मुक्त चिंतन कर सकता है? प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से 15 अगस्त 2022 को ‘पञ्च-प्रण’ का आह्वान किया। इसमें एक प्रण था देश के समक्ष ‘औपनिवेशिक मानसिकता और पराधीनता के हर अंश को समाप्त करना।’ 1 ये एक शैक्षणिक और सभ्यतागत कार्य है, कठिन कार्य है, क्योंकि इससे हमें परिवेश को नहीं, अपितु अपनी दृष्टि को बदलना है।
मैं जब भी सोचता हूँ कि वि-औपनिवेशीकरण जब भी मैं सोचता हूँ कि वि-औपनिवेशीकरण (decolonisation) क्यों महत्वपूर्ण है, तो मुझे मिलान कुंदेरा का उपन्यास द बुक ऑफ़ लाफ्टर एंड फॉरगेटिंग याद आता है। उपन्यास की शुरुआत फ़रवरी 1948 से होती है। प्राग के एक बारोक महल की बालकनी से कम्युनिस्ट नेता क्लेमेंट गॉटवाल्ड एक विशाल जनसमूह को संबोधित कर रहे हैं। मौसम बहुत ठंडा है और बर्फ़ गिर रही है। गॉटवाल्ड ने सिर पर कुछ नहीं पहन रखा है। उनके साथी व्लादिमीर क्लेमेंटिस अपना फर वाला हैट उतारकर उनके सिर पर रख देते हैं।
लाखों प्रतियों में क्षपती है तस्वीर
उस क्षण की तस्वीर लाखों प्रतियों में छपती है। हर बच्चा स्कूल की पाठ्यपुस्तकों और संग्रहालयों में वही फोटो देखकर बड़ा होता है।
लेकिन कुछ समय बाद क्लेमेंटिस सत्ता की दृष्टि में अपराधी घोषित कर दिए जाते हैं, और चार साल बाद उन्हें देशद्रोह के आरोप में फाँसी दे दी जाती है। इसके बाद सरकारी प्रचार तंत्र चुपचाप उस तस्वीर से क्लेमेंटिस को मिटा देता है। ऐसा लगता है मानो वे कभी वहाँ थे ही नहीं। उनकी उपस्थिति का केवल एक निशान बचता है – वह फर वाला हैट, जो अब भी गॉटवाल्ड के सिर पर दिखाई देता है।
कुंदेरा इस घटना को एक ऐसी चेतावनी में बदल देते हैं, जो किसी भी राष्ट्र को बेचैन कर सकती है। उनके उपन्यास का एक पात्र कहता है – “किसी राष्ट्र को मिटाने का पहला कदम उसकी स्मृति को मिटाना होता है। उसकी किताबें, उसकी संस्कृति और उसका इतिहास नष्ट कर दो। फिर कोई नई किताबें लिखे, नई संस्कृति गढ़े और नया इतिहास बना दे। कुछ ही समय में वह राष्ट्र यह भूलने लगेगा कि वह कौन था और उसका अतीत क्या था। सत्ता के विरुद्ध मनुष्य का संघर्ष, दरअसल स्मृति और विस्मृति के बीच का संघर्ष है।”
इन पंक्तियों को धीरे-धीरे पढ़िए। यह टैंकों या सीमाओं की बात नहीं कर रही हैं। यह उस पाठ्यक्रम की बात कर रही हैं, जिसके माध्यम से लोगों को इतिहास और अपनी पहचान सिखाई जाती है।
हमारी परम्परा में भी इस प्रक्रिया भली-भांति विश्लेषण किया गया है, जो मुझे आज भी हतप्रभ करता है। भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण क्रमवार यह प्रक्रिया बताते हैं –
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।।2.62।।
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।2.63।।
अर्थात् – विषयों का चिन्तन करने वाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्ति से कामना पैदा होती है। कामना से क्रोध पैदा होता है। क्रोध होने पर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोह से स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होने पर बुद्धि का नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होने पर मनुष्य का पतन हो जाता है।
देखिए ये शृंखला कहाँ घातक बनती है। क्रोध नहीं, मोह नहीं – स्मृतिभ्रंश – स्मृति का नाश होने पर। इसके बाद तो बुद्धिनाश निश्चित है। कुंदेरा, बीसवीं सदी के एक सर्वसत्तावादी (टोटेलिटेरियन) राज्य के बारे में जो लिखते हैं और गीता एक साधक के अंतर्मन का जो वर्णन कर रही है, दोनों का संदेश एक है। स्मृतिलोप विवेकहीनता को जन्म देगा। अविवेकी का कोई सार्थक अस्तित्व नहीं। यह किसी भी व्यक्ति और समाज, दोनों पर समान रूप से लागू होता है।
जो ये कल्पना करते हैं कि वे अलग रह सकते हैं, उनके लिए राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने कहा है –
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध।
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।।
लोक-स्मृति के संघर्ष काल में तटस्थ रहना निर्दोष होना नहीं है। यह भी मौन-अपराध है।
शिक्षा से शुरुआत होनी चाहिए
जब हम उपनिवेशवाद शब्द सुनते हैं, तो सैनिकों और संधियों, अधिकृत क्षेत्र और आर्थिक शोषण की कल्पना करते हैं। किंतु सबसे प्रभावी उपनिवेशवाद कभी भी भूमि का नहीं, बल्कि विचारों का रहा है। राजनीतिक शासन 1947 में समाप्त हो गया। मानसिक उपनिवेशवाद – भाषा और पाठ्यक्रमों के माध्यम से बना रहा। पाश्चात्य ज्ञान ही वास्तविक ज्ञान है – यह अवधारणा समाप्त नहीं हुई।
औपनिवेशिक शिक्षा किसी उद्देश्य के साथ रची गई थी, और वह उद्देश्य स्पष्ट था। इसका लक्ष्य ऐसे मानस तैयार करना था जो उपनिवेशक (शासक) की प्रशंसा करें और अपनी ही विरासत से लज्जित अनुभव करें। ज्ञान केंद्रीकृत कर दिया गया। एक ही एपिस्टेमोलॉजी (पाश्चात्य) हमें ऐसा थमा दी गई मानो वह बस वही तर्कसंगत, वैज्ञानिक, सार्वभौमिक ज्ञान का माध्यम हो, जबकि हमारी अपनी परंपराओं को मिथक, फोकलोर, अन्धविश्वास आदि कहकर तिरस्कृत कर दिया गया। कुछ पीढ़ियों में एक सूक्ष्म परिवर्तन हुआ। हम स्वयं को कमतर आँकने लगे। अपने विचारों के लिए बाहर से स्वीकृति की अपेक्षा करने लगे। पाणिनि, आर्यभट्ट और भरत मुनि जैसी मेधा को जन्म देने वली सभ्यता का बौद्धिक आत्मविश्वास धीरे-धीरे क्षीण होने लगा और हमारी सभ्यतागत स्मृति टूटने लगी।
मैंने इस विनाश को बौद्धिक उपनिवेश के छहI के रूप में सोचना शुरू किया है। वे पृथक् रोग नहीं, बल्कि एक लंबी व्याधि के चरण हैं।
- पहला है संवेदनहीनता- बेसुधता। अपनी सभ्यता के प्रति भावनात्मक और बौद्धिक संवेदनशून्यता। संवेदनशून्यता घातक है। यह स्वाभाविक नहीं है; लंबी अवधि में निर्मित की जाती है, जब तक कोई व्यक्ति अपने आधार के प्रति उदासीन और थोड़ा संशयपूर्ण नहीं हो जाता।
- दूसरा है अज्ञान- अज्ञान। अपनी ही बौद्धिक विरासत से सामान्य अपरिचय – या तो सामान्य रूप में हम जागरूक नहीं होते, या कई बार जानबूझकर अज्ञानता में रखा जाता है।
- तीसरा है अपमान – अनादर। यहाँ स्वदेशी परंपराओं की केवल उपेक्षा ही नहीं की जाती, उनका उपहास बनाया जाता है। देखें कि कैसे रामायण और महाभारत को कक्षाओं में “मिथक” बताया जाता है, जबकि यूनानी और नॉर्डिक मिथकों को उनकी प्रतीकात्मकता और गहराई के लिए सीधे तौर पर पढ़ा जाता है। यह दोहरे मापदंड इतने प्रचलित हो गए हैं कि हम ये सब चिन्हित भी नहीं कर पाते।
- चौथा है ill-will – कुभावना। सभ्यतागत स्व-अभिव्यक्ति के प्रति द्वेष-भाव, जहाँ कुछ भी भारतीय पढ़कर शंका की दृष्टि से देखा जाता है और उसे पिछड़ा, प्रतिक्रियावादी, या संदिग्ध मान लिया जाता है; जैसे कि अपनी जड़ों की ओर मुड़ना ही किसी प्रकार का अपराध हो।
- पाँचवा है- निष्क्रियता। यह दुःखद है, क्योंकि यह उन्हीं लोगों की विफलता है जो वास्तव में बेहतर जानते हैं। वे विकृतियों और झूठे षड्यंत्रों को देख पाते हैं, पर संस्थागत दबाव, उपहास के भय या आलस्य के कारण मौन रहते हैं। दिनकर इन लोगों के बारे में ही लिख रहे थे।
- छठा है incompetence – अक्षमता। इस बिंदु पर हमने अपनी भाषाई, पद्धतिगत और दार्शनिक उपकरण खो दिए हैं जो हमें अपने स्रोतों से सीधे संवाद करने के योग्य बनाते थे। अब हम कोई संस्कृत ग्रंथ स्वयं नहीं पढ़ पाते। हमें अपने ही पूर्वजों के ग्रंथालय का अन्वेषण करने के लिए पश्चिमी मध्यस्थ की आवश्यकता पड़ती है। मेरे लिए यह सबसे दुःखद है।
यही शिक्षा के वि-औपनिवेशीकरण का मार्ग है। न तो यह अस्वीकृति का कार्य है, और न ही अतीत में पीछे हटना। यह पुनर्स्थापना का कार्य है – ज्ञान-गरिमा की पुनर्स्थापना, और लोगों द्वारा अपनी मौलिक दृष्टि से सत्य का अनुसंधान करने का अधिकार। कुंदेरा ने सत्ता के विरुद्ध संघर्ष को स्मृति का विस्मृति के विरुद्ध संघर्ष कहा। बेन ओकरी ने दूसरे दृष्टिकोण से लगभग वही बात कही : “किसी राष्ट्र को विष देने के लिए, उसकी कथाओं को विषाक्त करो।” उन्होंने चेतावनी दी कि एक हतोत्साहित राष्ट्र, अंततः स्वयं के बारे में हतोत्साहित कहानियाँ सुनाता है। दोनों विचारकों का निष्कर्ष समान है। कोई जन-समूह तभी वास्तव में स्वतंत्र होता है जब उसने याद रखने का अधिकार और अपनी कथा अपनी भाषा में कहने का अधिकार वापस पा लिया हो।
क्या वैश्वीकृत दुनिया में वि-औपनिवेशीकरण संभव है?
यह एक उचित सवाल है, और मैं इसे सामान्यतः सुनता रहता हूँ। परस्पर जुड़े हुए इस वैश्विक ग्राम में, क्या वि-औपनिवेशीकरण अव्यवहारिक नहीं है? क्या यह हमें अलग-थलग नहीं कर देगा, केवल स्वयं से ही बातें करते रहेंगे?
मैं ऐसा नहीं मानता, और कारण सरल है- वि-औपनिवेशीकरण अलगाव नहीं है, यह स्व-जागरण के साथ सहभाग है। हम आधुनिक विज्ञान का बहिष्कार नहीं कर रहे, न ही वैश्विक संवाद से मुँह मोड़ रहे हैं। हमारा बल इस विषय पर है कि ज्ञान पर किसी का एकाधिकार नहीं होना चाहिए, ये सभी के लिए है। विश्व के शैक्षणिक समुदाय को स्वीकार करना होगा कि एशिया, अफ्रीका, अमेरिका, ओशिनिया आदि में सभ्यताओं ने दार्शनिक, तर्कशास्त्र, शासन, चिकित्सा, पारिस्थितिकी और शिक्षा के संगठित तंत्र बनाए। बहुलता सार्वभौमिकता को निःशक्त नहीं करती, बल्कि यही एक उचित मार्ग प्रदान करती है। इसलिए वि-औपनिवेशीकरण पश्चिम-विरोधी नहीं है; यह संतुलन-समर्थक है।
पद्धति परिवर्तन- उपनिवेशी से स्वदेशी तंत्र की ओर
यदि हम गंभीर हैं, तो परिवर्तन केवल पाठ्य-सूची तक सीमित नहीं रहना चाहिए; शोध-पद्धति में भी होना चाहिए। उपनिवेशवादी मॉडल कुछ मान्यताओं पर आधारित है। शोधकर्ता अलग, तटस्थ होता है। विभिन्न समुदाय अध्ययन के ‘विषय’ होते हैं। ज्ञान को अलग-अलग विषयों में विभाजित किया जाता है। किसी वस्तु के आध्यात्मिक, नैतिक, और पारिस्थितिक आयाम गौण, लगभग सजावटी माने जाते हैं।
स्वदेशी ज्ञान इसके विपरीत है। यह मनुष्य और प्रकृति, ज्ञान और उचित जीवन-चर्या, सिद्धांत और व्यवहार के अंतर्संबंध को भी समाहित करती है। इस दिशा में बढ़ने के लिए कुछ मूलभूत परिवर्तन आवश्यक हैं।
- पहला, स्वदेशी ज्ञान-मीमांसा (एपिस्टेमोलॉजी) की पुनर्प्राप्ति। ज्ञान कभी केवल प्रायोगिक अवलोकन नहीं था। इसमें अनुभव, व्याख्या, साक्ष्य और नैतिक अंतर्दृष्टि भी सम्मिलित हैं। हमारी परंपराओं ने प्रत्यक्ष, अनुमान, और शब्द (शब्द-प्रमाण) के माध्यम से तथा तर्क, अवलोकन, अनुभव, और कर्मशील समुदायों की सहमति माध्यम से ज्ञान प्रमाणित करने के ठोस माध्यम विकसित किए। यह साधारण लोकाचार नहीं थे; शताब्दियों तक किए गए वैचारिक मंथन से निकली अनुशासित व्यवस्थाएँ थीं।
- दूसरा, समग्र चिंतन को पुनर्जागृत करें। हमारी परंपराएँ सामान्यतः ज्ञान को विभाजित नहीं करती थीं। चिकित्सा पारिस्थितिकी से संबंधित थी। नैतिकता शासन का भी विषय था। ध्यानात्मक अभ्यास मनोविज्ञान के लिए उपयोगी होता था। आधुनिक विशेषज्ञता ने हमें सटीकता दी है, और मैं उसे अस्वीकार नहीं करूंगा, पर इससे एक बौद्धिक अकेलापन भी आया है, जहाँ एक क्षेत्र का विशेषज्ञ दूसरे से संवाद नहीं कर पाता। पुनःएकीकरण की आवश्यकता है।
- तीसरा, शोध को समुदाय-केंद्रित बनाइए। उसे निष्कर्षण (extraction) से भागीदारी की ओर ले जाइए। समुदायों को नमूनों (specimen) की तरह अध्ययन करने के बजाय उनके साथ सहयोग करें, उन्हें ज्ञान-धारकों के रूप में देखें। मौखिक परंपराएँ, अनुष्ठान, स्थानीय पारिस्थतिक प्रथाएँ – ये रॉ-डेटा नहीं है – जिए हुए, परीक्षण किए हुए ज्ञान का भण्डार है।
- चौथा, भाषा को केवल आवरण न मानकर ज्ञान का वाहक समझिए। अनुवाद से मूल अर्थ प्रभावित होता है। हर सभ्यता में एक बड़ी शब्द-संपदा होती है जिसका स्थान किसी अन्य भाषा की शब्दावली नहीं ले सकती। धर्म, ऋत, या रस को एक अंग्रेज़ी शब्द में अनुवाद करने का प्रयास कीजिए और आप तुरंत क्षति का अनुभव करेंगे। हमारी भाषाओं का पुनरुद्धार भावुकता नहीं; यह एक एपिस्टेमोलॉजिकल अनिवार्यता है।
पराधीन मानसिकता का दस्तावेजीकरण पर क्या प्रभाव पड़ता है
औपनिवेशिक दृष्टि केवल हमारे अध्ययन के विषय को ही नहीं बल्कि सामग्री संकलन और समझ तथा व्याख्या को भी प्रभावित करती है। पवित्र परंपराएँ मानवविज्ञान में समरूप कर दी जाती हैं। जीवंत दार्शनिक व्यवस्थाएँ मिथक मानी जाती हैं। सांस्कृतिक प्रथाएँ दृष्टि से सूचीबद्ध की जाती हैं, उनमें अंतर्निहित तर्क और तत्त्व का अनुभव नहीं किया जाता। हमारी पर्यावरणीय संकट की जड़ भी यही है – एक ऐसी यांत्रिक विश्व-दृष्टि से, जिसने प्रकृति को सम्मान और संबंध का विषय मानने के बजाय केवल उपयोग करने योग्य संसाधन समझा।
अभिलेखों में इसका प्रभाव – ज्ञान परम्परा का अनुचित रूप से वर्गीकरण, समृद्ध परम्पराओं का अतिसाधारीकरण, अनुवाद में अर्थ-परिवर्तन, और मौखिक इतिहासों को हाशिए पर धकेलना। पर सबसे गम्भीर क्षति आन्तरिक है। जब कोई समाज अपनी ही बौद्धिक विरासत पर संदेह करने लगता है, तो वह अपने ही सत्य के लिए बाह्य सत्यापन पर निर्भर हो जाता है। ऐसा मानस जो आत्मसम्मान के लिए अनुमति माँगता है, वह स्वतंत्र नहीं कहा जा सकता।
आगे का मार्ग – रचनात्मक वि-औपनिवेशीकरण
तो अब हम कहाँ जाएँ? मैं चार विषय प्रस्तावित करूँगा – अंतिम कार्ययोजना नहीं, बल्कि एक दिशा के रूप में।
- पहले, बौद्धिक साहस चाहिए – जो दृष्टि हमें दे दी गई, उसको प्रश्न करने की इच्छा। यहाँ तक कि उन अवधारणाओं को भी, जिनको स्वीकार करने पर हम पुरस्कृत हुए हैं।
- फिर पाठ्यक्रम सुधार – स्वदेशी ग्रन्थों, दर्शनों और पद्धतियों को अध्ययन का आधार बनाना न कि उन्हें वैकल्पिक रखना।
- फिर अंतर्विषयक एकीकरण, वह प्राचीन वृत्ति पुनः लौटाना जिससे एक विद्वान बिना समस्या के व्याकरण, तर्कशास्त्र, सौंदर्यशास्त्र और तत्त्व-मीमांसा के बीच स्वतंत्र रूप से अध्ययन कर सके।
- और अंत में एक वैश्विक स्वदेशी संवाद – क्योंकि विभिन्न महाद्वीपों की सभ्यताएँ कुछ समान समस्याओं से जूझ रही हैं, इसलिए हम पृथक प्रयासों की अपेक्षा सामूहिक समाधान का प्रयास अधिक प्रभावशाली होगा।
इनमें से कोई भी दुनिया से मुँह मोड़ना नहीं है। यह स्वयं की ओर मुड़ना है, ताकि हम दुनिया से बराबरी से मिल सकें; न कि ऐसे छात्र बनकर जो भूल गए कि उन्होंने कभी पाठ्यपुस्तकें लिखीं थीं। जैसा कि कुंदेरा ने कहा और जैसा गीता ने उनसे बहुत पहले जाना था, संघर्ष स्मृति और विस्मृति का है। उस संघर्ष में हमारी विजय अभी शेष है।
नोट –
[^1]: 15 अगस्त 2022 को लाल किले की प्राचीर से दिए गए अपने स्वतंत्रता दिवस संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के समक्ष अमृत काल के लिए पंच प्रण (पाँच संकल्प) प्रस्तुत किए। इनमें दूसरा संकल्प था – राष्ट्रीय जीवन से औपनिवेशिक मानसिकता और पराधीनता की मानसिकता के प्रत्येक अवशेष को पूरी तरह समाप्त करना। देखें: प्रधानमंत्री का स्वतंत्रता दिवस संबोधन, 15 अगस्त 2022, प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) / प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB), भारत सरकार।
[^2]: मिलान कुंदेरा, द बुक ऑफ़ लॉफ्टर ऐंड फ़ॉरगेटिंग, अनुवाद: एरॉन ऐशर (न्यूयॉर्क: हार्परपेरेनियल, 1999), पृ. 167। उपन्यास में वर्णित प्राग का यह प्रसिद्ध फ़ोटोग्राफ़ 21 फ़रवरी 1948 का है। बाद में व्लादिमीर क्लेमेंटिस पर देशद्रोह का आरोप लगाकर उन्हें मृत्युदंड दिए जाने के पश्चात् राज्य के प्रचार तंत्र ने उन्हें उस फ़ोटोग्राफ़ से हटा दिया।
[^3]: ये पंक्तियाँ द बुक ऑफ़ लॉफ्टर ऐंड फ़ॉरगेटिंग के प्रथम भाग “लॉस्ट लेटर्स” से ली गई हैं, जहाँ यह विचार मिलान ह्यूब्ल नामक पात्र द्वारा मिरेक के साथ बातचीत के दौरान व्यक्त किया गया है। अंतिम वाक्य—”सत्ता के विरुद्ध मनुष्य का संघर्ष, स्मृति और विस्मृति के बीच का संघर्ष है”—इस उपन्यास का सर्वाधिक उद्धृत कथन है। मूल चेक : Kniha smíchu a zapomnění (1978); प्रथम अंग्रेजी अनुवाद मिशल हेनरी हेम द्वारा (न्यू-यॉर्क : Alfred A. Knopf, 1980).
[^4]: भगवद्गीता 2.62–2.63
[^5]: रामधारी सिंह दिनकर की कविता ‘समर शेष है’ से – यह कविता स्वतंत्रता प्राप्ति के लगभग सात वर्ष बाद लिखी गई थी। इसका उद्देश्य यह दिखाना था कि आज़ादी मिलने के बाद भी स्वतंत्रता का कार्य पूरी तरह पूरा नहीं हुआ था।
यह कविता दिनकर की स्वतंत्रता-उत्तर देशभक्ति-प्रधान रचनाओं में व्यापक रूप से संकलित की जाती है। सामान्यतः, यद्यपि सर्वसम्मति से नहीं, इसे उनके काव्य-संग्रह ‘सामधेनी’ (1947) से संबद्ध माना जाता है। इस कविता की यह प्रसिद्ध पंक्तियाँ अक्सर भूलवश ‘कुरुक्षेत्र’ का भाग मान ली जाती हैं, जबकि वास्तव में ये पंक्तियाँ “समर शेष है” कविता से ली गई हैं।
[^6]: बेन ऑकरी, रचित ‘अ वे ऑफ बीइंग फ्री’ के “द जॉय ऑफ स्टोरीटेलिंग” से (लंदन: फीनिक्स हाउस, 1997) पूरा उद्धरण इस प्रकार है – “किसी राष्ट्र को विषाक्त करना हो, तो उसकी कहानियों को विषाक्त कर दो। निरुत्साहित और आत्मविश्वासहीन राष्ट्र स्वयं अपने बारे में भी निराशाजनक कहानियाँ सुनाने लगता है।”
संदर्भ
प्राथमिक संदर्भ
भगवद्गीता, अध्याय 2, श्लोक 62–63.
कुंदेरा, मिलान। द बुक ऑफ़ लॉफ्टर ऐंड फ़ॉरगेटिंग। अनुवाद: एरॉन ऐशर। न्यूयॉर्क: हार्परपेरेनियल, 1999। (मूल चेक संस्करण: Kniha smíchu a zapomnění, 1978।)
‘दिनकर’, रामधारी सिंह “समर शेष है”
मोदी, नरेंद्र. स्वतंत्रता दिवस भाषण, लाल किला, नई दिल्ली, 15 अगस्त 2022 (पञ्च प्रण). प्रेस सूचना ब्यूरो, भारत सरकार
बेन ऑकरी, रचित ‘अ वे ऑफ बीइंग फ्री’ (लंदन: फीनिक्स हाउस, 1997)
अतिरिक्त संदर्भ
पीखोवा, हाना। “द नैरेटर इन मिलान कुंदेरा’ज़ द बुक ऑफ़ लॉफ्टर ऐंड फ़ॉरगेटिंग”। (इस लेख में प्रसिद्ध “हैट” प्रसंग की ऐतिहासिक प्रामाणिकता तथा कुंदेरा द्वारा ऐतिहासिक स्मृति के साहित्यिक निरूपण पर चर्चा की गई है।)”To Forget History.” Los Angeles Review of Books, 2015।
गॉटवाल्ड और क्लेमेंटिस की फोटो, 21 फरवरी 1948, प्रेग. चेक न्यूज एजेंसी (ČTK) अर्काइव .

















