क्यों हो रही है नये साल की मध्यरात्रि पर जगन्नाथ मंदिर को बंद रखने की मांग? धार्मिक दृष्टि से अनुचित बताई जा रही प्रथा
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क्यों हो रही है नये साल की मध्यरात्रि पर जगन्नाथ मंदिर को बंद रखने की मांग? धार्मिक दृष्टि से अनुचित बताई जा रही प्रथा

बीते कुछ वर्षों में ग्रेगोरियन नववर्ष के अवसर पर मध्यरात्रि में मंदिर खोलने की प्रथा धीरे-धीरे नियमित बनती जा रही है जो चिंताजनक है।

Written byडॉ. समन्वय नंदडॉ. समन्वय नंद — edited by Lalit Fulara
Dec 29, 2025, 07:57 pm IST
inओडिशा

भुवनेश्वर: श्रीजगन्नाथ मंदिर प्रबंध समिति के एक सदस्य ने ग्रेगोरियन नववर्ष (1 जनवरी) की पूर्व संध्या पर मध्यरात्रि में मंदिर खोलकर भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा को जाग्रत रखने की जो परंपरा कुछ वर्षों में शुरु हुई है उसे समाप्त करने की मांग की है। उन्होंने इस परंपरा को सनातन हिंदू धर्म और सदियों पुरानी मंदिर परंपराओं के विरुद्ध बताया है।

श्रीजगन्नाथ मंदिर की प्रबंध समिति के सदस्य महेश साहू ने इस संबंध में मंदिर प्रबंध समिति के अध्यक्ष गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव, ओडिशा के कानून मंत्री पृथ्वीराज हरिचंदन तथा श्रीमंदिर के मुख्य प्रशासक अरबिंद पाढ़ी को पत्र लिखकर 1 जनवरी की मध्यरात्रि में मंदिर खोले जाने पर कड़ी आपत्ति जताई है।

नये साल की मध्यरात्रि पर मंदिर खोलने की प्रथा चिंताजनक
अपने पत्र में साहू ने उल्लेख किया है कि भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा सनातन हिंदुओं के आराध्य देवता हैं तथा 12वीं शताब्दी के इस प्राचीन वैष्णव पीठ में होने वाले सभी अनुष्ठान प्राचीन हिंदू शास्त्रों और परंपराओं के अनुसार ही संपन्न किए जाते हैं। उन्होंने कहा कि बीते कुछ वर्षों में ग्रेगोरियन नववर्ष के अवसर पर मध्यरात्रि में मंदिर खोलने की प्रथा धीरे-धीरे नियमित बनती जा रही है जो चिंताजनक है।

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चैत्र मास में मनाया जाता है हिंदू नववर्ष
महेश साहू के अनुसार, यह प्रथा न तो धार्मिक दृष्टि से उचित है और न ही मंदिर की परंपरागत मर्यादाओं के अनुरूप है। उन्होंने इसे “धार्मिक रूप से संवेदनशील विषय” बताते हुए प्रशासन से गंभीरता से विचार करने और परंपराओं का उल्लंघन करने वाली किसी भी व्यवस्था को रोकने की अपील की है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हिंदू परंपरा में 1 जनवरी नववर्ष नहीं माना जाता। हमारा नववर्ष चैत्र मास में, मध्य अप्रैल के आसपास मनाया जाता है। उन्होंने अपने पत्र में कहा है कि ‘पहुड़’ अनुष्ठान के बाद जो देवताओं के विश्राम का प्रतीक होता है—मध्यरात्रि में मंदिर खोलना लंबे समय से चली आ रही परंपराओं के खिलाफ है।

इस मुद्दे पर कई सेवायतों, सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं और श्रद्धालुओं ने भी साहू के समर्थन में आवाज उठाई है। उनका कहना है कि देवताओं को पर्याप्त विश्राम मिलना चाहिए और आधुनिक या पाश्चात्य उत्सवों के अनुरूप मंदिर की परंपराओं में बदलाव नहीं किया जाना चाहिए। एक वरिष्ठ सेवायत ने कहा, “पाश्चात्य संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए देवताओं को रातभर जाग्रत रखना स्वीकार्य नहीं है। मंदिर की परंपराओं का सम्मान होना चाहिए।” उत्कल विद्वत परिषद के संस्थापक मनोज रथ ने भी इस मांग का समर्थन किया। उन्होंने कहा, “हम लंबे समय से यह मांग कर रहे हैं कि नववर्ष के नाम पर देवताओं को जाग्रत न रखा जाए। परंपराओं से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं होना चाहिए।”

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1 जनवरी हमारा नववर्ष नहीं, इस दिन देवताओं का जाग्रत रखना परंपराओं के विरुद्ध
मंदिर के एक वरिष्ठ सेवायत ने भी इस मुद्दे पर सहमति जताते हुए कहा कि ‘पहुड़’ अनुष्ठान के बाद मध्यरात्रि में मंदिर खोलना शास्त्रसम्मत नहीं है। उन्होंने कहा, “1 जनवरी हमारा नववर्ष नहीं है। इस दिन देवताओं को जाग्रत रखना मंदिर परंपराओं के विरुद्ध है और इसे रोका जाना चाहिए।”

वहीं, श्रीजगन्नाथ मंदिर प्रशासन (एसजेटीए) ने स्पष्ट किया है कि इस संबंध में अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। एसजेटीए के एक अधिकारी ने बताया कि मामला विचाराधीन है और राज्य सरकार से परामर्श के बाद ही कोई निर्णय लिया जाएगा। उल्लेखनीय है कि सामान्य दिनों में प्रतिदिन लगभग 40,000 श्रद्धालु श्रीमंदिर में दर्शन के लिए आते हैं, जबकि पर्व-त्योहारों के दौरान यह संख्या दो से चार लाख तक पहुंच जाती है।

Topics: New YearJagannath TemplePuri Jagannath TempleJagannath Temple New Year controversy
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