महाप्रभु जगन्नाथ के अणसर में प्रवेश के साथ आस्था का केंद्र बना ब्रह्मगिरि का अलारनाथ मंदिर, उमड़ रहे हजारों श्रद्धालु
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महाप्रभु जगन्नाथ के अणसर में प्रवेश के साथ आस्था का केंद्र बना ब्रह्मगिरि का अलारनाथ मंदिर, उमड़ रहे हजारों श्रद्धालु

देवस्नान पूर्णिमा के भव्य अनुष्ठान के बाद महाप्रभु श्रीजगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के पवित्र अणसर (अणवसर) काल में प्रवेश करते ही श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र पुरी श्रीमंदिर से ब्रह्मगिरि स्थित ऐतिहासिक अलारनाथ मंदिर की ओर स्थानांतरित हो गया है।

Written byडॉ. समन्वय नंदडॉ. समन्वय नंद — edited by Lalit Fulara
Jul 1, 2026, 11:53 am IST
in ओडिशा

भुवनेश्वर: देवस्नान पूर्णिमा के भव्य अनुष्ठान के बाद महाप्रभु श्रीजगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के पवित्र अणसर (अणवसर) काल में प्रवेश करते ही श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र पुरी श्रीमंदिर से ब्रह्मगिरि स्थित ऐतिहासिक अलारनाथ मंदिर की ओर स्थानांतरित हो गया है। अणसर गृह में 15 दिनों तक महाप्रभु के विश्राम और उपचार के कारण श्रीमंदिर में प्रत्यक्ष दर्शन बंद हैं। ऐसे में ओडिशा सहित देश के विभिन्न राज्यों से हजारों श्रद्धालु अलारनाथ मंदिर पहुंच रहे हैं। उनकी मान्यता है कि अणसर अवधि के दौरान भगवान अलारनाथ के दर्शन करने से वही आध्यात्मिक पुण्य प्राप्त होता है, जो पुरी में महाप्रभु जगन्नाथ के दर्शन से मिलता है। अणसर महाप्रभु जगन्नाथ की परंपराओं का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विशिष्ट अनुष्ठान है।

सदियों पुरानी मान्यता के अनुसार देवस्नान पूर्णिमा के दिन महाप्रभु जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा का 108 कलशों के सुगंधित एवं पवित्र जल से महास्नान कराया जाता है। इस दिव्य स्नान के बाद तीनों विग्रह अस्वस्थ हो जाते हैं। इसके पश्चात उन्हें श्रीमंदिर स्थित अणसर गृह में ले जाया जाता है, जहां 15 दिनों तक विशेष गुप्त विधि, आयुर्वेदिक उपचार और पारंपरिक सेवाओं के माध्यम से उनका स्वास्थ्य लाभ कराया जाता है। इस अवधि में श्रद्धालुओं के लिए श्रीविग्रहों के दर्शन पूर्णतः बंद रहते हैं।

अणसर काल : दिव्य विश्राम और गोपनीय पूजा की परंपरा
अणसर के दौरान श्रीमंदिर के सेवायत अत्यंत गोपनीय धार्मिक परंपराओं के अनुसार महाप्रभु की सेवा करते हैं। इस अवधि में मूल विग्रहों के स्थान पर अणसर पट्टी के रूप में महाप्रभु जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के पटचित्रों की पूजा-अर्चना की जाती है। इसके अतिरिक्त सिंहद्वार के निकट स्थापित महाप्रभु जगन्नाथ के प्रतिनिधि स्वरूप पतितपावन के दर्शन भी अणसर अवधि में बंद रहते हैं। मंदिर परंपरा के अनुसार इस दौरान महाप्रभु के उपचार के लिए औषधीय जड़ी-बूटियों से तैयार विशेष ‘फुलुरी तेल’ का प्रयोग किया जाता है।

यह प्राचीन आयुर्वेदिक उपचार पद्धति महाप्रभु के स्वास्थ्य लाभ और पुनः नवयौवन प्राप्ति का प्रतीक मानी जाती है। उपचार पूर्ण होने के बाद महाप्रभु नवयौवन वेश में भक्तों को दर्शन देते हैं, जिसके पश्चात विश्वविख्यात रथयात्रा का शुभारंभ होता है।

अणसर में श्रद्धालुओं का सबसे बड़ा आस्था केंद्र बनता है अलारनाथ मंदिर
पुरी श्रीमंदिर के कपाट श्रद्धालुओं के लिए बंद होने के साथ ही पुरी से लगभग 23 किलोमीटर दूर ब्रह्मगिरि स्थित शताब्दियों पुराना अलारनाथ मंदिर ओडिशा के सबसे प्रमुख तीर्थस्थलों में बदल जाता है। मंगलवार तड़के से ही हजारों श्रद्धालु मंदिर परिसर में दर्शन के लिए लंबी कतारों में खड़े दिखाई दिए।  हल्की बारिश और बादलों से घिरे मौसम के बावजूद श्रद्धालुओं की आस्था में कोई कमी नहीं दिखी। हाथों में तुलसीदल, पुष्प और पूजा सामग्री लेकर श्रद्धालु घंटों तक अपनी बारी का इंतजार करते रहे। उनकी दृढ़ मान्यता है कि अणसर काल में भगवान अलारनाथ के दर्शन करना स्वयं महाप्रभु जगन्नाथ के दर्शन के समान फलदायी होता है। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए मंदिर प्रशासन ने दर्शन व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए व्यापक प्रबंध किए हैं। आलबंदाराचार्य की भक्ति से जुड़ी है अलारनाथ की परंपरा अणसर काल में भगवान अलारनाथ को महाप्रभु जगन्नाथ का प्रतीक स्वरूप मानने की परंपरा का संबंध प्राचीन वैष्णव परंपरा से जुड़ा हुआ है।

मान्यता है कि लगभग 10वीं शताब्दी ईस्वी में वर्तमान तमिलनाडु के आलवार वैष्णव संप्रदाय के महान संत आलबंदाराचार्य पुरी आए थे। उनकी गहन भक्ति और महाप्रभु जगन्नाथ के प्रति अगाध श्रद्धा से जुड़ी अनेक कथाएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि जब आलबंदाराचार्य पुरी पहुंचे, उस समय महाप्रभु जगन्नाथ अणसर गृह में विराजमान थे। सार्वजनिक दर्शन बंद होने के कारण वे अत्यंत व्यथित हो गए। अपनी गहन भक्ति से प्रेरित होकर वे उस स्थान पर पहुंचे, जहां अणसर काल में महाप्रभु जगन्नाथ के प्रतीक स्वरूप भगवान विराजमान माने जाते हैं। वहीं उन्होंने प्रभु के दर्शन कर पूजा-अर्चना की। यही स्थान आज ब्रह्मगिरि स्थित अलारनाथ मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। सदियों से चली आ रही यह धार्मिक मान्यता आज भी लाखों श्रद्धालुओं को अणसर अवधि में अलारनाथ मंदिर तक आकर्षित करती है।

इतिहास और स्थापत्य की अनूठी धरोहर
अलारनाथ मंदिर अपने ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के साथ-साथ अद्वितीय स्थापत्य कला के लिए भी प्रसिद्ध है। मंदिर में भगवान विष्णु की चार भुजाओं वाली काले क्लोराइट पत्थर से निर्मित दुर्लभ प्रतिमा स्थापित है, जिसे भगवान अलारनाथ के रूप में पूजा जाता है।  इतिहासकारों के अनुसार मंदिर की स्थापना 9वीं शताब्दी में हुई थी तथा इसका निर्माण राजा वनुदेव चतुर्थ द्वारा कराया गया माना जाता है। समय के साथ यह मंदिर वैष्णव परंपरा का महत्वपूर्ण आध्यात्मिक केंद्र बन गया।

प्रसिद्ध ‘खीर भोग’ का भी विशेष महत्व
अलारनाथ मंदिर का प्रसिद्ध खीर भोग श्रद्धालुओं के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र है। दूध और पारंपरिक सामग्री से तैयार यह विशेष खीर प्रसाद के रूप में वितरित की जाती है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान के दर्शन के साथ इस प्रसिद्ध प्रसाद को ग्रहण करना अपनी यात्रा का अभिन्न हिस्सा मानते हैं। मंदिर का महाप्रसाद भी अणसर अवधि में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के बीच वितरित किया जाता है।

श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए व्यापक इंतजाम
अणसर अवधि में श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए जिला प्रशासन और मंदिर प्रशासन ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए हैं। मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में सात प्लाटून पुलिस बल तैनात किए गए हैं। भीड़ की निगरानी के लिए 50 से अधिक सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। इसके अलावा यातायात नियंत्रण, पेयजल, चिकित्सा सुविधा, स्वच्छता तथा आपातकालीन सेवाओं की भी विशेष व्यवस्था की गई है। अधिकारियों का अनुमान है कि आने वाले दिनों में श्रद्धालुओं की संख्या में और अधिक वृद्धि होगी।

अब नवयौवन दर्शन और रथयात्रा की प्रतीक्षा
15 दिनों की अणसर अवधि समाप्त होने के बाद महाप्रभु जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा नवयौवन दर्शन में भक्तों को अपने नवीन स्वरूप में दर्शन देंगे। इसके बाद विश्वप्रसिद्ध श्रीजगन्नाथ रथयात्रा का शुभारंभ होगा, जिसमें देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पुरी पहुंचेंगे।तब तक ब्रह्मगिरि स्थित अलारनाथ मंदिर ही श्रद्धालुओं की आस्था और भक्ति का प्रमुख केंद्र बना रहेगा। सदियों पुरानी यह परंपरा महाप्रभु जगन्नाथ की अनूठी धार्मिक विरासत, वैष्णव आस्था और ओडिशा की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा का जीवंत प्रतीक है।

Topics: Odisha NewsJagannath TempleOdishaAlarnath Temple
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