नेपाल : ध्वस्त हुआ सत्ता का अहंकार
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नेपाल : ध्वस्त हुआ सत्ता का अहंकार

गत दिनों नेपाल में जो हुआ, उसके मूल में भ्रष्टाचार, राजनीति में भाई-भतीजावाद और जन अधिकारों की अनदेखी थी, जिसके लिए लोग लंबे समय से आंदोलनरत थे।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Sep 22, 2025, 11:33 am IST
inविश्व, विश्लेषण, सोशल मीडिया
नेपाल में भ्रष्टाचार के विरुद्ध उठ रही आवाजों को दबाने के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाना ओली सरकार को भारी पड़ गया

नेपाल में भ्रष्टाचार के विरुद्ध उठ रही आवाजों को दबाने के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाना ओली सरकार को भारी पड़ गया

गत दिनों नेपाल में जो हुआ, उसके मूल में भ्रष्टाचार, राजनीति में भाई-भतीजावाद और जन अधिकारों की अनदेखी थी, जिसके लिए लोग लंबे समय से आंदोलनरत थे। ओली सरकार ने 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाकर भ्रष्टाचार और अपनी विफलताओं को छिपाने की कोशिश की, जिससे युवाओं का आक्रोश जनआंदोलन के रूप में फूटा

 

पंकज दास, काठमांडू से

नेपाल में 8-9 सितंबर को जनता का गुस्सा फूट पड़ा और पूरा देश हिंसा व आगजनी की चपेट में आ गया। सत्ता और दो-तिहाई बहुमत के घमंड में चूर प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और देउबा दंपती ने जनता की आवाज को नजरअंदाज किया। संसद, न्यायपालिका व प्रशासन सब पर नियंत्रण कर मनमानी की। परिणामस्वरूप आक्रोशित जनता, खासकर युवाओं ने राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री आवास, संसद, सर्वोच्च न्यायालय, मंत्रालयों, नेताओं के घरों और नेताओं के कालेधन से खड़े व्यापारिक प्रतिष्ठानों तक को आग के हवाले कर दिया। जनाक्रोश ने नेपाल की सत्ता की नींव हिला दी और शासकों के अहंकार को चूर-चूर कर दिया।

जनता की अंतिम चेतावनी

सत्ता के शिखर पर बैठे एक शासक का अहंकार किसी देश को किस भयावह स्थिति में धकेल सकता है, इसका उदाहरण नेपाल में खुलकर दिखा। पूरा देश आग की लपटों में झुलस गया। एक-एक कर उसकी भौतिक संरचनाएं ध्वस्त हो गईं। 2015 के भूकंप की त्रासदी से उबर रहा नेपाल महज 10 वर्ष में ही फिर से 10 साल पीछे लाैट गया। राज्य के तीनों स्तंभ कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका भी इस आग में स्वाहा हो गए। ऐतिहासिक धरोहरें, कलात्मक भवन, बड़े होटल, व्यापारिक प्रतिष्ठान और सुपर मार्केट सब राख हो चुके हैं। ऐसा वीभत्स रूप नेपाल में पहले नहीं दिखा था।

एतिहासिक रूप से नेपाल में हर 10-15 वर्ष में बड़े आंदोलन होते रहे हैं और जनता ने हर बार सत्ता पलटी है। यही वह ताकत है, जिसने नेपाल को पंचायती राजतंत्र से बहुदलीय लोकतंत्र और गणतंत्र तक पहुंचाया। लेकिन इस शक्ति की अनदेखी कर प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और देउबा दंपती (शेर बहादुर देउबा व आरजू देउबा) ने दो-तिहाई बहुमत के घमंड में मनमानी शुरू कर दी। न गठबंधन दलों की सुनी, न अपनी पार्टी के नेताओं की और न ही पड़ोसी देशों या जनता की। विपक्ष और मीडिया की आलोचना भी बेअसर रही। अदालतें और जांच एजेंसियां भी सत्ता के दबाव में झुकी रहीं। जांच एजेंसियों का इस्तेमाल प्रतिशोध की राजनीति के लिए किया जा रहा था। नतीजा, जनता, खासकर युवाओं का गुस्सा फट पड़ा। नेताओं एवं सत्ता से जुड़े मीडिया समूह तक को आग के हवाले कर दिया।

राख की ढेर में दबे थे शोले

देश के राजनीतिक दल और उनके नेता अपने को किसी ‘राजा’ से कम नहीं समझते थे। उनकी शाही आदतें, आचरण और रहन-सहन से जनता ठगा महसूस करती रही। सत्ता हाथ में आने के बाद नेता राजाओं की तरह बड़े महल बनाते, सैन्य सलामी लेते और खुद को राजसी रीतियों में बंधा दिखाते थे। बीते 18 वर्ष में माओवादी, नेपाली कांग्रेस और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष बार-बार प्रधानमंत्री बने। कुछ समय के लिए नेपाली कांग्रेस के सुशील कोइराला प्रधानमंत्री बने और अंतरिम सरकार में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश खिलराज रेगमी ने भी कुछ अवधि के लिए शासन संभाला। तीनों प्रमुख दल अलग-अलग विचारधारा के थे, लेकिन उनके बीच गठबंधन और सत्ता के लिए समझौते बदस्तूर जारी रहे।

इन नेताओं की प्राथमिकता सत्ता तक पहुंचना और उसे बनाए रखना थी, देश और जनता की कोई चिंता नहीं। घूम-फिर कर सत्ता मुख्यत: तीन नेताओं माओवादी पुष्पकमल दहल प्रचंड, नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेरबहादुर देउबा और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी एकीकृत (माले) के अध्यक्ष केपी शर्मा ओली के इर्द-गिर्द ही रही। एक समय ऐसा भी आया, जब तीनों नेताओं ने मिलकर ‘राष्ट्रीय सहमति’ के नाम पर बड़े फैसले लिए। ऐसे माहौल में जनता का विश्वास टूट गया और युवा आक्रोशित हो उठे। विशेषकर सोशल मीडिया पर प्रतिबंध और भ्रष्टाचार के कारण युवा वर्ग में व्यापक असंतोष था, जो सड़कों पर हिंसक प्रदर्शन के रूप में व्यक्त हुआ। इस आंदोलन की अगुवाई ज्यादातर 20 से 30 वर्ष के युवाओं ने की, जिसे ‘जेन-जी’ आंदोलन कहा जा रहा है। वे लोकतांत्रिक अधिकार, प्रदूषण, बेरोजगारी और सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ आवाज उठाने लगे। नेपाल में इस गुस्से ने राजनीतिक संकट खड़ा कर दिया।

… और भड़क गया युवाओं का आक्रोश

दरअसल, नेपाल की राजनीतिक व्यवस्था में जनता की भलाई कभी प्राथमिकता नहीं रही। सत्ता में रहते हुए नेता केवल व्यक्तिगत और पारिवारिक लाभ, समर्थ उद्योगपतियों और व्यापारी दोस्तों के हितों की पूर्ति करते रहे। भ्रष्टाचार इतना व्याप्त था कि रिश्वतखोरी और कमीशन को सरकारी मंजूरी मिल गई थी। जनता की समस्याएं और विकास योजनाएं सपनों तक सीमित रहीं। रोजगार की कमी और निराशा के कारण हजारों युवा देश छोड़कर जाने लगे, जिससे कई गांव सुनसान हो गए। जब भी जनता सरकार के खिलाफ आवाज उठाती, तो राजनीतिक दल अंध राष्ट्रवाद या भारत विरोधी नारे लगाकर विरोध को कुचलने की कोशिश करते। भारत विरोधी राष्ट्रवाद को राजनीतिक दल, मीडिया और तथाकथित नागरिक समाज एक साथ बढ़ावा देते रहे। ओली, प्रचंड, देउबा (शेरबहादुर देउबा व आरजू देउबा) जैसे नेताओं ने बार-बार राष्ट्रवाद के नाम पर माहौल गर्माया। लेकिन काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। यही कारण रहा कि ओली-देउबा गठबंधन की सरकार अंततः कमजोर पड़ गई।

अपनी असफलताओं और भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए उन्होंने लिपुलेक विवाद और श्रीराम जन्मभूमि जैसे मुद्दों को उठाया। चीन की बेल्ट एंड रोड पहल का समर्थन किया। बांग्लादेश तथा रोहिंग्या मुसलमानों को योजनाबद्ध तरीके से नेपाल के सीमावर्ती इलाकों में बसाया जाने लगा। चीनी कंपनियों व अंतरराष्ट्रीय एनजीओ को बिना रोक-टोक काम करने की अनुमति मिली। संदिग्ध पाकिस्तानी, बांग्लादेशी व रोहिंग्या मुसलमानों को नेपाली नागरिकता दी गई। कभी भारतीय टीवी चैनल पर प्रतिबंध, कभी हिंदी फिल्मों के प्रदर्शन पर रोक, कभी भारतीय समाचार चैनलों के संवाददाताओं को रिपोर्टिंग करने से रोकने जैसे हथकंडे अपनाए गए। इसके बावजूद ओली के भारत विरोधी राष्ट्रवाद में नेपाल की जनता, खासकर युवा पीढ़ी नहीं फंसी और लगातार सरकार, मंत्रियों, सांसदों, न्यायालय, भ्रष्टाचार और राजनीति में भाई-भतीजावाद के विरुद्ध सोशल मीडिया पर अपना गुस्सा जाहिर करती रही।

इसी बीच, 3 सितंबर, 2025 को ओली सरकार ने फेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, वाट्सएप समेत 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगा दिया। इससे भीतर ही भीतर जो लावा सुलग रहा था, वह आखिरकार फट गया। सरकार का कहना था कि सोशल मीडिया कंपनियों ने नेपाल में पंजीकरण नहीं कराया, इसलिए उन पर प्रतिबंध लगाया गया। सरकार का दावा था कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से अफवाहें फैलाई जा रही थीं और साइबर अपराध को अंजाम दिया जा रहा था। साथ ही, सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले का हवाला दिया, जिसमें सोशल मीडिया के लिए नियम-कानून बनाने को कहा गया था।

वास्तव में, सोशल मीडिया पर आंदोलन चला रहे कुछ लोगों ने सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की मिलीभगत और भ्रष्टाचार का स्टिंग ऑपरेशन कर उसे यूट्यूब पर डाल दिया था। इससे सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश खासे नाराज थे और उन्होंने सरकार से सोशल मीडिया के नियमन के लिए आवश्यक कदम उठाने को कहा था। बहरहाल, यह प्रतिबंध युवाओं में भारी असंतोष और विरोध की वजह बना। युवा सोशल मीडिया के जरिए भ्रष्टाचार, परिवारवाद, सरकार की विफलताओं और जनता के खिलाफ होने वाली अन्य समस्याओं को पहले से ही उजागर कर रहे थे। सरकार के इस कदम से उनका गुस्सा बढ़ा और देशव्यापी प्रदर्शनों ने आंदोलन का रूप ले लिया। सरकार ने सोशल मीडिया प्रतिबंध के नाम पर अपनी नाकामी छिपाने की कोशिश की, लेकिन युवा पीढ़ी उससे प्रभावित नहीं हुई।

अंतरिम सरकार की प्रधानमंत्री सुशीला कार्की

दो दिन में निकल गई ऐंठन

ओली और उनकी सहयोगी मंत्री आरजू देउबा को उम्मीद नहीं थी कि सोशल मीडिया प्रतिबंध से युवाओं का गुस्सा इतना भड़क जाएगा। खैर, 3 सितंबर की आधी रात से सोशल मीडिया बंद कर दिया गया। 6 सितंबर को युवाओं ने शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का प्रस्ताव रखा और 8 सितंबर को काठमांडू समेत पूरे देश में एक साथ विरोध स्थल तय कर आंदोलन को ‘जेन जी रिवोल्यूशन’ का नाम दिया। युवाओं का तर्क था कि सरकार ने अपने भ्रष्टाचार और असफलताओं को छिपाने के लिए यह प्रतिबंध लगाया है, ताकि लोग उनके खिलाफ कुछ न लिख सकें। साथ ही ‘नेपो बेबी’ अभियान में नेताओं के बच्चों के विदेशों में ऐशो-आराम के जीवन, महंगी गाड़ियों और छुट्टियों की तस्वीरें वायरल की गईं, जबकि आम युवा नौकरी और नागरिकता पाने के लिए कतारबद्ध थे।

8 सितंबर को काठमांडू के मैतीघर में करीब 10,000 युवा इकट्ठे हुए, भ्रष्टाचार और सरकार के खिलाफ नारेबाजी की और संसद भवन की ओर मार्च किया। युवाओं का गुस्सा इतनी तेजी से बढ़ा कि कुछ ने संसद भवन के अंदर घुसने की कोशिश की। उस दौरान पुलिस और सेना ने लाठीचार्ज, आंसू गैस, पानी की फुहारें, रबर की गोलियां और अंत में गोली चलाकर भीड़ को नियंत्रित करने की कोशिश की। गोलीबारी में पहले ही दिन 22 युवाओं की मौत हो गई। इस घटना ने पूरे नेपाल में सरकार और सत्ता गठबंधन के खिलाफ आक्रोश को चरम पर पहुंचा दिया।

22 युवाओं की मौत के बाद भी ओली ने सोशल मीडिया प्रतिबंध वापस लेने से इनकार किया। गृहमंत्री रमेश लेखक ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दिया, पर उसे स्वीकार नहीं किया गया। कई मंत्रियों और सहयोगी दलों ने प्रतिबंध वापस लेने को कहा, लेकिन ओली ने कैबिनेट बैठक में कहा कि यदि सरकार युवा प्रदर्शनकारियों के दबाव में झुकी तो उसकी साख खत्म हो जाएगी। सरकार को समर्थन देने वाली नेपाल कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने देर रात उनसे पुनः प्रतिबंध हटाने का आग्रह किया। हालांकि औपचारिक फैसला नहीं हुआ, पर इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियों को प्रतिबंधित सभी 26 सोशल मीडिया प्लेटफाॅर्म को पुनः चालू करने के लिए कहा गया और 8 सितंबर की मध्यरात्रि से ये प्लेटफार्म फिर शुरू हो गए। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।

युवाओं की हत्या के विरोध में 9 सितंबर को सरकार, संसद, न्याय व सुरक्षा व्यवस्था तथा नेताओं के खिलाफ जनता का आक्रोश में फूटा। नतीजा, काठमांडू में राष्ट्रपति भवन, संसद भवन, प्रधानमंत्री कार्यालय, सभी मंत्रालय, सर्वोच्च न्यायालय, एंटी करप्शन ब्यूरो मुख्यालय, बड़े उद्योग घराने, पार्टी नेताओं के घर और गाड़ियां, पुलिस थाने तक आग के हवाले कर दिए गए। युवा विरोध ने कुछ ही घंटों में देश की कार्यपालिका, न्यायपालिका और व्यवस्थापिका को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।

ओली-देउबा गठबंधन सरकार मात्र दो दिन में धराशायी हो गई। वे अब अपनी जान बचाने को विवश हो गए। उनके महल, पद, भ्रष्टाचार से कमाई हुई अकूत संपत्ति, सबकुछ लुट चुका था। प्रधानमंत्री सहित सभी मंत्रियों को भाग कर सेना की शरण लेनी पड़ी। राष्ट्रपति को सैनिक बैरक में ले जाना पड़ा। नेपाल पुलिस ने हथियार डाल दिए। दो दिन तक नेपाल में हर तरफ आग और धुआं था, कानून-व्यवस्था का नामोनिशान नहीं था। देश पूरी तरह जनता के नियंत्रण में था।

अंतरिम सरकार की चुनौतियां

सेना ने जनता की भावना को देखते हुए पहले प्रधानमंत्री ओली से इस्तीफा मांगा और उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया। 9 सितंबर की मध्यरात्रि से सेना ने कानून-व्यवस्था की कमान संभाली और धीरे-धीरे स्थिति को नियंत्रण में लिया। सेना की प्रमुख जिम्मेदारी केवल कानून व्यवस्था बनाए रखना ही नहीं थी, बल्कि राजनीतिक समाधान भी सुनिश्चित करना था। प्रधान सेनापति महारथी अशोक राज सिग्देल ने सभी राजनीतिक पक्षों से वार्ता की और युवाओं की भावनाओं का सम्मान किया। संसद को भंग कर सर्वोच्च न्यायालय की पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया। उनसे छह महीने में चुनाव कराने को कहा गया है। सुशीला कार्की सर्वोच्च न्यायालय की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश रही हैं और अपने भ्रष्टाचार विरोधी रुख के लिए जानी जाती हैं। अब उन्हें नेपाल की पहली महिला प्रधानमंत्री होने का गौरव भी प्राप्त हो गया है।

नेपाल में जो हुआ, उसका व्यापक विश्लेषण किया जा रहा है। संविधान को सारी समस्याओं की जड़ माना जा रहा है। देश में शून्यता के बाद भले ही अंतरिम सरकार ने सत्ता संभाल ली है, लेकिन कुछ शक्तियां अपने स्वार्थ के लिए सक्रिय हो गई हैं। पश्चिमी शक्तियां नेपाल में स्थिरता नहीं चाहतीं, क्योंकि स्थिर नेपाल उनके हित में नहीं है। वे चाहती हैं कि संविधान में उल्लिखित ‘पंथनिरपेक्षता’ बरकरार रहे। इसलिए वे सरकार पर अपनी प्रभावी पकड़ बनाने की कोशिश में हैं। उधर, धर्मशाला में दलाई लामा की ओर से नई सरकार को बधाई मिलने से भी नेपाल में चिंताएं बढ़ी हैं।

नेपाल की भौगोलिक स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील है। यह विश्व के दो शक्तिशाली देशों, उत्तर में चीन और दक्षिण में भारत के बीच स्थित है। चीन, जो लगातार अमेरिका को चुनौती देता है, नेपाल में पश्चिमी देशों के बढ़ते प्रभाव को अपनी सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा मानता है। इसलिए वह नेपाल में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है, ताकि भारत के साथ खुली सीमा होने के कारण भी नेपाल पर उसका प्रभुत्व मजबूत रहे। वहीं, पाकिस्तान भी नेपाल को सुरक्षा चुनौती देने के लिए इसका प्रयोग करता है, जिसे लेकर भारत चिंतित है। कुल मिलाकर लोकतांत्रिक और सामरिक दृष्टि से नेपाल की यह स्थिति अमेरिका, पश्चिमी देशों और अन्य वैश्विक शक्तियों के लिए बड़ा महत्व रखती है।

बहरहाल, नेपाल में नई अंतरिम सरकार के समक्ष कई बड़ी चुनौतियां हैं, जिनमें प्रमुख हैं- कानून व्यवस्था को बनाए रखना, जनता का विश्वास जीतना, नष्ट हुई भौतिक संरचनाओं का पुनर्निर्माण, सुरक्षा बलों का मनोबल बढ़ाना, उद्योग और व्यापार जगत को राहत देना, अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना और समय पर चुनाव कराना। युवा पीढ़ी की मांगों पर भ्रष्टाचार के खिलाफ दिखावटी कार्रवाई नहीं, बल्कि प्रभावी और सख्त कदम उठाने की आवश्यकता है।

इसके साथ ही, कार्की सरकार के सामने कुछ अन्य काम भी हैं, जैसे पिछले बड़े घोटालों की जांच में तेजी लाना, लंबित मुकदमों को आगे बढ़ाना और 8-9 सितंबर को हुई गोलीबारी तथा बड़ी संख्या में युवाओं की मौत के लिए संबंधित राजनीतिक और सरकारी अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करना। नेपाल की कठिन भौगोलिक, राजनीतिक और सामाजिक स्थिति को देखते हुए इन सभी मुद्दों का समुचित समाधान आवश्यक है।

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