राखी का मूल अर्थ रक्षा सूत्र से है, इसलिए रक्षाबंधन का बहुत व्यापक अर्थ और स्वरूप है। यह केवल भाई-बहन तक सीमित नहीं है, वरन् सर्वव्यापी है। सावन के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन शिव समस्त प्रकृति को रक्षा का वचन देते हैं। यह रक्षा वचन चाहे व्यक्ति से हो, वचन से हो, संबंध से हो, राज्य से हो या फिर परिजनों से। रक्षा का जो तत्व है और वही शिव तत्व है। बहनों को भाई रक्षा वचन देते हैं इसके पीछे भी शिव तत्व है, जिस प्रकार आस्तिक और नास्तिक शिव के निकट हो या दूर हों समस्त जीवों की शिव रक्षा करते हैं। किसी भी संकट में कोई बहन हो तो भाई रूपी शिव रक्षा का वचन निभाते हैं और इसके लिए सदैव तत्पर रहते हैं।
रक्षा सूत्र का मंत्र है- ‘येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबल: तेन त्वाम् प्रतिबद्धनामि रक्षे माचल माचल:। इस मंत्र का सामान्य रूप से यह अर्थ लिया जाता है कि दानवीर महाबली राजा बलि जिससे बांधे गए थे, उसी से तुम्हें बांधता हूं । हे रक्षे!( रक्षासूत्र) तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो। युगों युगों से यह मंत्र रक्षाबंधन का मूलाधार है, जिसमें असुर राज बलि को मां लक्ष्मी ने रक्षा सूत्र बांधकर अपने पति भगवान् विष्णु को मुक्त कराया था। यह उपाख्यान उन तथाकथित सेक्युलरों, ईसाई मिशनरियों और वामियों को करारा जवाब है, जिन्होंने हिन्दू धर्म में वर्ण – जाति, ऊंच – नीच, सुर – असुर, आर्य -अनार्य के नाम पर भेदभाव होने का मकड़जाल फैलाया है, क्योंकि इस पर्व की नींव असुर राज बलि ने मां लक्ष्मी से रक्षासूत्र बँधवाकर रखी। यह पर्व सुर-असुर के मध्य बंधुत्व का सेतु है।
इसलिए हिन्दुओं ने युगों-युगों से आज तक रक्षा का यह बंधन समाज, देशों,राज्यों और धर्मों के साथ बांध रखा है। रक्षाबंधन भारत वर्ष की एकता और अखंडता का अनोखा पर्व है जो वसुधैव कुटुम्बकम् के आलोक में एक-दूसरे की रक्षा के लिए रक्षा सूत्र में बांधता है।
सनातन में रक्षाबंधन का व्यापक स्वरूप है, जहां रक्त संबंधों से भी ऊपर उठकर धर्म के भाई-बहनों ने उच्च आदर्श स्थापित किए क्योंकि इस पर्व का शुभारंभ ही असुर राज बलि ने मां लक्ष्मी से रक्षा सूत्र बंधवाकर किया है। सनातन में भाई-बहन के रिश्तों का अनूठा इतिहास है – भगवान् शिव की बहन असावरी, भगवान् विष्णु की धर्म बहन माता पार्वती, भगवान् श्रीराम की बहन शांता, भगवान् श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा, भगवान् श्रीगणेश की बहन अशोक सुंदरी और मनसा,ऐसे अनेक नाम लिए जा सकते हैं, परंतु यहां लिखने का उद्देश्य केवल इतना है कि उपरोक्तानुसार भाई-बहन का रिश्ता देवीय ही है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और रक्षाबंधन
आखिर सनातन के महान् पर्व रक्षाबंधन को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुखता से मनाने और अपनाने का संदेश क्यों देता है? मनोवैज्ञानिक और मानवीय दृष्टि से शैतानी प्रवृत्तियों के उन्मूलन के लिए रक्षाबंधन का रक्षा सूत्र कारगर औषधि है। संघ रक्षाबंधन पर्व के माध्यम से संपूर्ण विश्व में संघर्ष की जगह रक्षा और युद्ध की जगह शांति का संदेश देता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ रक्षाबंधन के पर्व को प्रमुखता से मनाने की संस्तुति करता है। जाति, वर्ण के ऊपर उठकर राष्ट्र के लिये प्राण देने की प्रेरणा रक्षाबंधन ने दी है। राष्ट्र को परमवैभव के शिखर तक ले जाने के लिये स्थापित हुये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मूलभूत सिद्धांत एवं आदर्श जैसे राष्ट्र निर्माण, व्यक्ति निर्माण, स्वत्व जागरण, समरस समाज निर्माण, समाज संगठन आदि रक्षाबंधन के आधारभूत मूल्यों के साथ मेल खाते हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में रक्षाबंधन का पर्व समाज और राष्ट्र की रक्षा के एक बड़े सामाजिक संकल्प के रूप में मनाया जाता है। यह संघ द्वारा वर्ष भर में मनाए जाने वाले छह प्रमुख उत्सवों में से एक है। स्वयंसेवक अपने गुरु और प्रतीक के रूप में परम पवित्र ‘भगवा ध्वज’ को रक्षा सूत्र (राखी) बांधकर राष्ट्र व धर्म की रक्षा का संकल्प लेते हैं। शाखाओं और मिलन कार्यक्रमों में स्वयंसेवक एक-दूसरे की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधते हैं, जो आपसी स्नेह, विश्वास और हर परिस्थिति में एक-साथ खड़े रहने के वादे का प्रतीक है। स्वयंसेवक समाज के विभिन्न वर्गों, बस्तियों और आम नागरिकों के बीच जाकर उन्हें राखी बांधते हैं और समाज को सुरक्षित रखने का विश्वास दिलाते हैं। यह पर्व समाज को एकजुट करने, राष्ट्रीय मूल्यों को याद रखने और देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी का बोध कराने का कार्य करता है।
पौराणिक और ऐतिहासिक साक्ष्यों व संदर्भों का भारत के पर्वों से गहरा नाता रहा है और विभिन्न अंचलों में मनाए जाने के विविध स्वरूप भी विविधता में एकता के पर्याय हैं। ऐसे तो रक्षाबंधन से जुड़ी हर युग में अनूठी गाथाएं हैं, परंतु कतिपय मार्गदर्शी हैं इसलिए उल्लेखनीय भी हैं।
रक्षाबंधन की शुरुआत ऐसे हुई
यह चिर परिचित और हृदयस्पर्शी कथा है कि भगवान् विष्णु ने वामन अवतार लेकर असुर राज राजा बलि से सब कुछ ले लिया और पाताल लोक का राज्य रहने के लिए दिया, तब बलि बोले हे! विष्णु “मैं जब सोने जाऊं तो, जब उठूं तो, जिधर भी दृष्टि जाए उधर आपको ही देखूं “। इस प्रकार भगवान् विष्णु को प्रहरी बना लिया। मां लक्ष्मी चिंतित हुईं और भगवान् विष्णु की मुक्ति के लिए नारद मुनि से विचार-विमर्श किया, तदुपरांत एक सुंदर स्त्री के रूप में पाताल पहुंचकर राजा बलि के सामने विलाप करने लगीं। राजा बलि ने विलाप का कारण पूछा तब माता लक्ष्मी ने कहा कि उनका कोई भाई नहीं है जिसे रक्षासूत्र बांधे तभी बलि ने कहा कि आप मेरी धर्म बहन बन जाएं। तदुपरांत मां लक्ष्मी ने, राजा बलि को रक्षासूत्र बांधकर, तिर्बाचा कराया और उपहार में प्रहरी भगवान् विष्णु को मांग लिया। रक्षाबंधन पर्व आरंभ हुआ।
एक और कथा भगवान विष्णु और मात पार्वती की है। पार्वती भगवान शिव से विवाह करना चाहती थीं, लेकिन सती के वियोग के कारण भगवान शिव ने विवाह करने से मना कर दिया। तब पार्वती ने कठिन तपस्या की और भगवान विष्णु भी उनकी सहायता के लिए आए। भगवान विष्णु ने पार्वती से उनकी कलाई पर एक धागा बांधने के लिए कहा, ताकि वह उनके रास्ते में आने वाली किसी भी बाधा का अंत कर सकें। अंततः पार्वती ने भगवान शिव से विवाह किया और भगवान विष्णु ने एक भाई के रूप में विवाह समारोह में अपने कर्तव्यों का पालन किया।
सतयुग में हर वर्ष जब अशोक सुंदरी और मनसा भगवान गणेश को राखी बांधने आती थीं तो उनके दोनों बेटे शुभ और लाभ उदास हो जाते थे, क्योंकि उनकी कोई बहन नहीं थी। दोनों भाइयों ने अपने पिता भगवान गणेश से एक बहन मांगी और भगवान ने उनकी इच्छा पूरी की। गणेश जी ने अग्नि से एक कन्या को उत्पन्न किया, जो संतोषी मां थीं।
यह भी प्रचलित है कि इंद्राणी(शचि) ने अपने पति देवराज इंद्र को अपने गुरु बृहस्पति के निर्देशानुसार श्रावण माह की पूर्णिमा तिथि को भगवान् विष्णु द्वारा दिया गया रक्षासूत्र बांधा था जिससे देव-दानव युद्ध में उनकी रक्षा भी हुई और महान् दधीचि की अस्थियों से बने वज्र से इंद्र वृत्रासुर का वध कर पाए।
त्रेतायुग में भगवान राम की एक बड़ी बहन थीं जिनका नाम शांता था। धार्मिक पुराणों के संदर्भ से माता कौशल्या की बहन वर्षिनी को कोई संतान न होने के कारण राजा दशरथ ने वर्षिनी को अपनी पुत्री शांता गोद दे दी थी, परंतु यह सर्वश्रुत है कि, शांता अपने चारों भाइयों को राखी बांधती थीं। इसके अतिरिक्त आज भी देश की बहुत सी बहनें ऐंसी हैं, जो भगवान राम को अपना भाई मानती हैं और रक्षाबंधन को उन्हें राखी भेजती हैं जिसे रामलला को बांधा जाता है। राम लला को राखी बांधने की परंपरा बहुत पुरानी है। यह परंपरा रामलला के दरबार में आज भी विधि-विधान से निभाई जाती है।
यह कथा भी प्रचलित है कि मृत्यु के राजा भगवान यम और नदी यमुना भाई-बहन थे। यमुना ने बारह वर्षों से अपने भाई को नहीं देखा था और उन्हें उनकी बहुत याद आती थी, फिर वह मदद के लिए मां गंगा के पास गईं। देवी गंगा ने भगवान यम को अपनी बहन से मिलने जाने के लिए कहा।
भगवान यम ने मां गंगा की बात सुनी और अपनी बहन से मिलने गये जिन्होंने उनका प्रसन्नतापूर्वक स्वागत किया और उन्हें मिठाइयाँ और स्वादिष्ट भोजन दिया। यमुना ने यम की कलाई पर राखी भी बांधी। भगवान यम इस भाव से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने अपनी बहन को अमरता का आशीर्वाद दिया। उन्होंने यह भी घोषणा की कि जो भी भाई अपनी बहन से राखी बंधवाएगा और अपनी बहन की रक्षा करेगा, वह अमर हो जाएगा।
द्वापर युग में सुभद्रा भगवान कृष्ण और बलराम की प्यारी बहन थीं। वह महान योद्धा अर्जुन से विवाह करना चाहती थी, भाई बलराम इसके पक्ष में नहीं थे,परन्तु भगवान कृष्ण थे। उन्होंने अर्जुन से सुभद्रा के विवाह का न केवल समर्थन किया वरन् संपन्न भी कराया था।
यह भाई-बहिन का बंधन इतना मजबूत और प्रिय है कि जगन्नाथ पुरी में श्री कृष्ण और, बलराम के साथ सुभद्रा जी की भी पूजा की जाती है।इसी युग में शिशुपाल के अपमान से क्रोधित होकर श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका वध कर दिया। जब चक्र उड़कर भगवान के पास वापस आया तो उससे उनकी अंगुली कट गयी । यह देखकर द्रौपदी ने तुरंत अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर भगवान कृष्ण की अंगुली पर लपेट दिया। तब भगवान कृष्ण ने जरूरत के समय उनकी रक्षा करने का वचन दिया। पांडव जब द्रौपदी को द्यूत क्रीड़ा में हार गए तब द्रौपदी के चीरहरण के समय भगवान् श्रीकृष्ण ने उनकी रक्षा की। रक्षाबंधन अर्थात् वह बंधन, जो हमें सुरक्षा प्रदान करे। सुरक्षा किससे? हमारे आंतरिक और बाहरी शत्रुओं, रोग व ऋण से। राखी का मान करें। अपने भाई-बहन के प्रति प्रेम और सम्मान की भावना रखें। फैशन न बनाएं।
इतिहास गवाह है कि इस युग में जब राजा पुरु से सिकंदर पराजित हुआ तब सिकंदर को मृत्यु दंड से बचाने के लिए उसकी पत्नी रेक्सोना ने पुरु को राखी भेजी। जिसका मान रखते हुए पुरु ने सिकंदर को मुक्त ही नहीं किया वरन् घायल सिकंदर को भारत से सकुशल निकालने में सहायता भी की थी।
महान् गोंडवाना साम्राज्य की साम्राज्ञी रानी दुर्गावती ने सदैव भातृत्व नीति का अनुसरण किया था। बिहार से आए महेश ठाकुर को राखी बांधी और मंत्री बनाया। अपने दीवान आधार सिंह को भी राखी बांधी। इनके साथ ही अफगान शासक शम्स खान मियानी और मुबारक अफगानी को भी रानी दुर्गावती ने राखी बांधी थी। इन सभी भाईयों ने अपनी बहिन रानी दुर्गावती की रक्षा के लिए कपटी, धूर्त और लंपट मुगल शासक अकबर के सेनापति आसफ खान से भीषण युद्ध लड़े और पूर्णाहुति दी।
कहीं-कहीं रानी कर्णावती और हुमायूं का भी उल्लेख मिलता है परन्तु यह सर्वथा असत्य और निराधार है। 18 वीं शताब्दी में अरविंद पाल सिंह मंदैर के अनुसार सिख शासकों ने रक्षाबंधन को राखी का नाम दिया। जिसका उद्देश्य मुगलों से किसानों की रक्षा करना था।
आधुनिक काल में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में रक्षाबंधन पर्व ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सन् 1905 में बंगाल विभाजन के समय जब हिन्दू – मुस्लिम वैमनस्यता चरम पर आ रही थी तब गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने स्थिति सुधारने के लिए हिंदुओं – मुस्लिमों द्वारा आपस में राखी बंधवाई थी, जिससे भाईचारा स्थापित हुआ था।इसलिए आगे चलकर सन् 1911 में बरतानिया सरकार को बंगाल का विभाजन रद्द करना पड़ा था।
रक्षाबंधन के विविध नाम
संपूर्ण भारतवर्ष में रक्षाबंधन का यह पर्व विभिन्न नाम और स्वरूप प्रचलित है। रक्षाबंधन को श्रावणी भी कहते हैं। पंजाब में रक्षाबंधन पर्व राखड़ी या राखरी के रुप में, गुजरात में इस त्यौहार को पवित्रोपन्ना के रूप में, पश्चिम बंगाल में झूलन पूर्णिमा, तमिल में राखी विझा, उत्तर प्रदेश, बिहार झारखंड में रक्षाबंधन,उत्तरांचल में श्रावणी, महाराष्ट्र में नाराली या नारियल पूर्णिमा, तमिलनाडु में अवनी अवित्तम, आंध्र प्रदेश तेलंगाना में राखी पूर्णिमा, केरल में सुथा पूर्णिमा और उड़ीसा में गम्हा पूर्णिमा के रुप में मनाई जाती है।
जबकि राजस्थान में रक्षाबंधन रामराखी चूड़ाराखी और लुंबा राखी के नाम से प्रसिद्ध है। वस्तुतः अमरनाथ की यात्रा गुरु पूर्णिमा से प्रारंभ होकर रक्षाबंधन पर समाप्त होती है। मध्य प्रदेश उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कजरी पूर्णिमा के रूप में भी इस उत्सव को मनाया जाता है।
भारतीय जनजातियों में रक्षाबंधन
भारतीय जनजातियों में भी यह त्यौहार प्रमुखता से मनाया जाता है। जनजाति समाज कुल देवता की उपासना के उपरांत तेंदू के लकड़ी, शतावर और भेलवां के पत्ते की पूजा कर उसे राखी बांधते हैं, इसे राखी खूंटा कहा जाता है। जनजातियों के पुरोहित बैगाओं का विश्वास है कि राखी खूंटा को खेतों में लगाने के से न केवल उन्नत फसल होती है वरन् बुरी नजर नहीं लगती है।
जनजातीय समाजों में रक्षाबंधन का त्यौहार प्रकृति, खेती और आपसी भाईचारे से गहराई से जुड़ा हुआ है। जहाँ आम तौर पर यह त्यौहार केवल एक दिन भाई-बहन के रिश्ते के रूप में मनाया जाता है, वहीं अनेक आदिवासी संस्कृतियों में यह उत्सव महीनों तक चलता है और इसमें पेड़ों, फसलों व औजारों की भी पूजा की जाती है।जनजातियों में रक्षाबंधन के अलग-अलग और अनोखे रूप देखने को मिलते हैं। अनेक आदिवासी समुदायों में लोग पेड़ों को अपना रक्षक मानते हैं। वे जंगल के बड़े पेड़ों (जैसे महुआ, पीपल या बरगद) को राखी बांधते हैं। यह इस बात का वादा होता है कि वे प्रकृति की रक्षा करेंगे और प्रकृति उनकी रक्षा करेगी।खेती-किसानी से जुड़े जनजातीय लोग इस समय अपनी फसलों और खेती के औजारों की विशेष पूजा करते हैं।जब फसल बोई जाती है, तो इसकी शुरुआत नाला पूजन से होती है ।मुठवा पूजा के परिप्रेक्ष्य में फसल आने पर एक हाथ में हँसिया और दूसरे हाथ में अनाज लेकर खेत के एक कोने में पूजा की जाती है।मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीमा पर बसे सैलाना क्षेत्र के जनजाति समाज में रक्षाबंधन केवल एक दिन का पर्व नहीं होता। यहाँ यह उत्सव लगभग साढ़े तीन महीने तक चलता है। यह श्रावण अमावस्या से शुरू होकर कार्तिक मास की चौदस तक मनाया जाता है, जिसमें सावन पूर्णिमा के दिन विशेष धूम रहती है।मध्य भारत के गोंड और बैगा जैसे आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में इसे कजरी पूर्णिमा के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन बहनें खेतों की उपजाऊ मिट्टी को बर्तनों में भरकर लाती हैं, उसमें जौ बोती हैं और उसकी पूजा करके सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।
देश के सैनिकों को राखी भेजती हैं बहनें
भारत की बहनें सीमा पर तैनात सैनिकों को अपना भाई मानती हैं और उन्हें प्रतिवर्ष राखी भेजकर, अपना आभार प्रकट करती हैं । यह त्यौहार जैन समाज में भी प्रचलित है, उनके मतानुसार इस दिन विष्णु कुमार नामक मुनिराज ने 700 जैन मुनियों की रक्षा की थी।
रक्षाबंधन पर्व हम सभी देशवासियों का प्रमुख पर्व है, और यही प्रेरणा देता है कि हम देश व धर्म की रक्षा के लिए कृत संकल्पित हों। यह धर्मनिरपेक्ष पर्व है, तो आईये रक्षाबंधन के पवित्र और पुनीत पर्व पर जाति – धर्म की बेड़ियों से ऊपर उठकर एक दूसरे को इस संकल्प के साथ रक्षासूत्र बांधें कि भारत को समर्थ भारत-समरस भारत – श्रेष्ठ भारत बनाएंगे।

















