भारत में वर्षों तक उस व्यवस्था की कमी रही, जो स्कूल के मैदान से ओलंपिक पोडियम तक खिलाड़ी का साथ दे सके। विडंबना यह है कि नीति बहुत पहले बन गई, पर नीति और क्रियान्वयन के बीच की खाई दशकों तक बनी रही। खेल को राष्ट्रीय विकास की केंद्रीय प्राथमिकता बनाने के लिए आवश्यक राजनीतिक इच्छाशक्ति, संस्थागत जवाबदेही और खिलाड़ी-केंद्रित व्यवस्था उस स्तर की नहीं बन सकी, जिसकी एक विशाल युवा आबादी वाले देश को चाहिए थी।
खेलों को व्यवस्थित नीति के रूप में देखने की शुरुआत 1982 के एशियाई खेलों (नई दिल्ली) के बाद तेज हुई। इसी पृष्ठभूमि में 1984 में राजीव गांधी के कार्यकाल में पहली राष्ट्रीय खेल नीति आई, जिसका उद्देश्य खेल स्तर उठाना, व्यापक आधार बनाना, प्रतिभाओं को तराशना और अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन सुधारना था। साथ ही, हर पांच साल में प्रगति की समीक्षा का प्रावधान भी था। परंतु यह योजना कागजों तक सीमित रह गई।
‘अटल’ खेल नीति
2001 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में राष्ट्रीय खेल नीति को अधिक स्पष्ट तथा व्यापक बनाया गया। अटल सरकार ने स्पष्ट रूप से स्वीकारा कि ‘1984 की नीति का क्रियान्वयन अधूरा रहा और उसके लक्ष्य पर्याप्त रूप से हासिल नहीं हुए।’ 2001 की नीति के दो बड़े लक्ष्य थे—खेलों का व्यापक आधार तैयार करना और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्टता हासिल करना।
ग्रामीण व वनवासी क्षेत्रों में प्रतिभा खोज से लेकर अवसंरचना, वैज्ञानिक प्रशिक्षण, कोचिंग, प्रोत्साहन, तथा महिलाओं और युवाओं की भागीदारी तक का खाका इसमें मौजूद था। केंद्र, राज्यों, भारतीय ओलंपिक संघ (आईओए) और राष्ट्रीय खेल महासंघों को मिलकर इन उद्देश्यों को आगे बढ़ाना था। नीति के अनुसार व्यापक आधार बनाना मुख्यतः राज्यों की जिम्मेदारी थी, जबकि केंद्र सहायक की भूमिका। इसके अलावा, भारतीय खेल प्राधिकरण (साई), आईओए व महासंघों को उत्कृष्टता के लिए विशेष भूमिका दी गई।
इस नीति के बाद के वर्षों में भारत के ओलंपिक प्रदर्शन में सुधार के संकेत दिखाई दिए। 2004 एथेंस में राज्यवर्धन सिंह राठौड़ का रजत (1 पदक), 2008 बीजिंग में अभिनव बिंद्रा का स्वर्ण सहित 3 पदक और 2012 लंदन में 6 पदक। यह क्रम बताता है कि यदि सीमित संसाधनों के बावजूद प्रतिभाओं को अवसर मिलें तो भारत अंतरराष्ट्रीय मंच पर बेहतर प्रदर्शन कर सकता है।
पांडव-काैरव का गुरुकुल
ग्रेटर नोएडा के पास दनकौर एक कस्बा है। दनकौर नाम द्रोण से बना है। मान्यता है कि यहां गुरु द्रोणाचार्य का गुरुकुल था। कौरवों और पांडवों ने इसी गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण की थी। यहां प्रतिवर्ष श्रीकृष्ण जन्माष्टमी से दस दिन तक मेला लगता है, जिसे दनकौर मेला कहा जाता है। मेले के अवसर पर जिले में एक दिन का अवकाश रहता है। साथ ही 500 रुपए से 1,00,000 रुपए तक के पुरस्कारों वाली अनेक स्पर्धाएं और रंगमंचीय कार्यक्रम होते हैं। आचार्य द्रोण का यह गुरुकुल ‘द्रोणकोर’ नाम से भी प्रचलित रहा है। यहां द्रोणाचार्य द्वारा पूजित प्राचीन शिव विग्रह, एक स्टेडियम एवं अनेक प्राचीन पुरावशेष विद्यमान हैं। इसी क्रीड़ांगण में 5,000 वर्ष पूर्व महाभारत काल में पांडव और कौरव राजकुमारों का दीक्षांत प्रदर्शन हुआ था। यहां एकलव्य निर्मित गुरु द्रोण की प्राचीन प्रतिमा, द्रोणाचार्य की खड़ी आकार की प्रतिमा, श्री बांके बिहारी की प्राचीन प्रतिमा सहित श्रीराम दरबार, हनुमान जी, दुर्गा माता आदि विविध देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी प्रतिष्ठापित हैं। इस परिसर का एक विशाल द्वार है। अंदर एक प्रवचन कक्ष, रंगशाला, द्रोणाचार्य का एक चित्र एवं एक प्राचीन प्रतिमा भी है। महाभारत के आदि पर्व के अध्याय 124-27 में वर्णित पांडव एवं कौरव राजकुमारों के शस्त्रास्त्र प्रशिक्षण के दीक्षांत प्रदर्शन हेतु प्रयुक्त प्राचीन स्टेडियम के मध्य में स्पर्द्धाओं के लिए उस काल में बने मंचों का स्वरूप आज भी लगभग वैसा ही है। इस अखाड़ा-युक्त स्टेडियम के विगत 5,000 वर्ष में क्षतिग्रस्त हो जाने और मुगल काल में इस मेले को प्रतिबंधित कर यहां की कुछ प्रतिमाओं को तोड़े जाने के बाद 1883 में समाज ने अंग्रेज कैप्टन सर जेम्स साल्अ पीटर से आग्रह कर इसकी मरम्मत कराई और मेले को पुन: आरंभ किया। तब से यह मेला निरंतर लग रहा है।
खेल नीति का बंटाधार
फिर 2004 में कांग्रेस की अगुआई में यूपीए सरकार बनी, जो 2014 तक रही। इस दौरान 2007–08 के आसपास एक नया ड्राफ्ट कॉम्प्रिहेंसिव नेशनल स्पोर्ट्स पॉलिसी 2007 तैयार किया गया, जिसमें भारत को विश्व की अग्रणी खेल शक्ति बनाने की महत्वाकांक्षी दृष्टि, बेहतर नियमन, राष्ट्रीय खेल महासंघों के साथ जवाबदेही और मजबूत संस्थागत ढांचे की आवश्यकता रेखांकित की गई। परंतु अंततः यूपीए सरकार ने यह निष्कर्ष निकाला कि 2001 की नीति और उसके तहत चल रही योजनाएं पर्याप्त हैं। ड्राफ्ट 2007 को आगे नहीं अपनाया गया और बाद में 2015 में कैबिनेट की स्वीकृति से इसे वापस ले लिया गया।
यही वह दौर था, जब भारतीय खेल व्यवस्था को अगले स्तर पर ले जाने का अवसर था, पर नीति के मूल उद्देश्यों को व्यापक, स्थायी और खिलाड़ी-केंद्रित व्यवस्था में बदलने के बजाय योजनाओं, संस्थाओं और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का जाल बढ़ता गया। नतीजा, नीति कागज पर मौजूद रही, योजनाएं चलती रहीं, बजट आवंटित होते रहे, लेकिन खिलाड़ी के पूरे करियर को केंद्र में रखकर कोई एकीकृत राष्ट्रीय व्यवस्था विकसित नहीं हो सकी।
खिलाड़ी नहीं, फाइलें केंद्र में आ गईं
2001 की नीति की भावना थी कि प्रतिभा को गांव और वनवासी क्षेत्रों से खोजकर राष्ट्रीय स्तर तक लाया जाए। स्कूल-कॉलेजों में खेलों को बढ़ावा, खेल-शिक्षा को मजबूती और प्रतिभा-विकास का ढांचा बनाने की दिशा भी निर्धारित थी। लेकिन लंबे समय तक व्यवस्था प्रतिभा खोजने के बजाय प्रतिभा के स्वयं व्यवस्था तक पहुंचने की प्रतीक्षा करती रही। खिलाड़ी के सामने संस्थाओं की अलग-अलग सीढ़ियां थीं।
जैसे-प्रशिक्षण के लिए साई, चयन के लिए राष्ट्रीय खेल महासंघ, रोजगार के लिए रेलवे व सेना (स्पोर्ट्स कोटा), आर्थिक सहायता के लिए युवा कार्य व खेल मंत्रालय की योजनाएं और वैज्ञानिक-चिकित्सा सहायता के लिए सीमित संस्थागत व्यवस्था (जैसे साई के केंद्र, एनआईएस, और बाद में एनसीएसएसआर व स्पोर्ट्स-मेडिसिन विभाग)। इसलिए खिलाड़ी को व्यवस्था के केंद्र में रखने के बजाय व्यवस्था के अलग-अलग दरवाजे खटखटाने पड़ते थे। यही वह स्थिति थी जिसमें लाल फीताशाही केवल सरकारी कार्यालयों की समस्या नहीं रही, वह खिलाड़ी के करियर की बाधा बन गई।
राष्ट्रमंडल खेल ने खोली पोल
यूपीए काल में 2010 के दिल्ली राष्ट्रमंडल खेल भारतीय खेल प्रशासन की सबसे बड़ी परीक्षा थे। इसमें खिलाड़ियों ने 101 पदक (38 स्वर्ण, 27 रजत, 36 कांस्य) जीतकर शानदार प्रदर्शन किया और पदक तालिका में दूसरा स्थान हासिल किया। यानी प्रतिभा और खिलाड़ी सक्षम थे, समस्या व्यवस्था की थी। कैग की रिपोर्ट (Report No. 6 of 2011) ने खेलों के शासन मॉडल पर गंभीर सवाल उठाए। रिपोर्ट के अनुसार, अधिकार विभिन्न संस्थाओं में बंटे हुए थे, जवाबदेही कमजोर थी और एकीकृत नेतृत्व का अभाव था।
निर्णय लेने में अस्पष्टता और देरी हुई, जिससे समयसीमा पर दबाव बढ़ा और बाद में सरकारी प्रक्रियाओं से छूट देने की स्थिति पैदा हुई। कई ठेके एकल बोली या नामांकन के आधार पर दिए गए। दिल्ली सरकार से संबंधित कैग रिपोर्ट (Report No. 4 of 2011) ने भी विभिन्न स्तरों पर मंजूरियों में देरी को रेखांकित किया, जिससे काम अंत में एक साथ करना पड़ा और लागत बढ़ी। यानी निर्णय समय पर न हों, जिम्मेदारी स्पष्ट न हो और अनेक संस्थाएं एक ही काम में लगी हों, तो अंततः उसकी कीमत खिलाड़ी और देश, दोनों चुकाते हैं।
पैसा खर्च हुआ, खेल संस्कृति नहीं बनी
कांग्रेस शासन के दस वर्ष को केवल ‘खेलों पर पैसा नहीं खर्च हुआ’ कहना सही नहीं होगा। विभिन्न योजनाओं के माध्यम से मैदान और खेल सुविधाएं विकसित की गईं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2008-09 से 2013-14 के बीच पंचायत युवा क्रीड़ा और खेल अभियान के तहत 63,214 खेल मैदान विकसित किए गए। लेकिन मैदान बना देने भर से खिलाड़ी तैयार नहीं हो जाते।
स्टेडियम बनाना और खेल संस्कृति विकसित करना, शिविर लगाना और चार वर्ष की वैज्ञानिक खिलाड़ी-विकास योजना बनाना, पदक विजेता को पुरस्कार देना और हजारों संभावित पदक विजेताओं को बचपन से तैयार करना, अलग-अलग काम हैं। कांग्रेस नीत यूपीए की सबसे बड़ी विफलता यही रही कि वह इन अलग-अलग पहलों को एक ऐसी राष्ट्रीय खेल पाइपलाइन में नहीं बदल सकी, जिसमें स्कूल से लेकर ओलंपिक तक खिलाड़ी के विकास की हर जरूरत एक-दूसरे से जुड़ी हो।
प्रतिभा आगे बढ़ी, व्यवस्था पीछे रह गई
दरअसल, 2008 और 2012 के ओलंपिक परिणाम कांग्रेस-यूपीए सरकार के लिए चेतावनी भी थे और अवसर भी। बीजिंग के 3 पदक (1 स्वर्ण, 2 कांस्य) से लंदन के 6 पदक (2 रजत, 4 कांस्य) तक पहुंचना बता रहा था कि भारत में प्रतिभा है और बेहतर सहयोग से प्रदर्शन बढ़ाया जा सकता है। सरकार ने OPEX (Operation Excellence for London Olympics 2012) जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से विदेशी प्रशिक्षण और अंतरराष्ट्रीय अनुभव देने की कोशिश की। इसमें सैकड़ों एथलीटों को घरेलू-विदेशी कैंप, विदेशी कोच और प्रतियोगिता एक्सपोजर मिला।
2012 के बाद 2020 ओलंपिक के लिए 25 पदक का लक्ष्य भी रखा गया। लेकिन समस्या यह थी कि ऐसे कार्यक्रम स्थायी, व्यापक और सार्वभौमिक खिलाड़ी-विकास व्यवस्था का हिस्सा नहीं बन पाए। यानी प्रतिभाएं निकलती रहीं, पदक आते रहे, लेकिन व्यवस्था नहीं बदली। यूपीए के एक दशक की खेल नीति का मूल्यांकन करते समय सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं हो कि कोई योजना शुरू हुई या नहीं, बल्कि यह हो कि क्या 2001 की राष्ट्रीय खेल नीति को ऐसी संस्थागत व्यवस्था में बदला गया, जिसमें खिलाड़ी केंद्र में हो? उत्तर निराशाजनक है। 2001 की नीति ने व्यापक आधार और उत्कृष्टता का लक्ष्य दिया। 2004, 2008 और 2012 में ओलंपिक प्रदर्शन में क्रमिक सुधार भी हुआ। लेकिन यूपीए इस उभरती संभावना को मजबूत राष्ट्रीय खेल क्रांति में बदलने में विफल रही। यूपीए काल की सबसे बड़ी समस्या खेल नीति का अभाव नहीं, बल्कि क्रियान्वयन का संकट था। नीति कागज पर आगे बढ़ी, पर मैदान पर लालफीताशाही उससे आगे निकल गई।
खेल महाशक्ति का आधार
किसी भी खेल महाशक्ति का आधार उसके स्कूल होते हैं। चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और अनेक यूरोपीय देशों ने स्कूल स्तर से ही प्रतिभा पहचान और खेल प्रशिक्षण को संस्थागत रूप दिया। 2001 की नीति में खेल एवं शारीरिक शिक्षा को शिक्षा व्यवस्था से अधिक प्रभावी ढंग से जोड़ने की बात थी, लेकिन पर्याप्त मैदान, प्रशिक्षित शारीरिक शिक्षा शिक्षक, उपकरण और नियमित प्रतियोगिता व्यवस्था हर जगह उपलब्ध नहीं हो सकी।
यह जानना भी जरूरी है कि 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में राष्ट्रीय खेल विकास निधि बनाया गया, जिसका उद्देश्य एथलीटों को अंतरराष्ट्रीय स्तर के कोच, तकनीकी, वैज्ञानिक व मनोवैज्ञानिक सहायता और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं का अनुभव उपलब्ध कराना था। यह यात्रा नीति से शुरू हुई है, लेकिन इसका अंतिम लक्ष्य एक ऐसी व्यापक खेल संस्कृति का निर्माण होना चाहिए, जिसमें खेल जीवन का अभिन्न हिस्सा बने और प्रतिभा को बचपन से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक निरंतर अवसर और सहयोग मिले। 2014 के बाद की खेल नीति में इसी व्यापक दृष्टिकोण की स्पष्ट झलक दिखाई देती है। खिलाड़ी केवल देश के प्रतिनिधि नहीं, वे भारत की सॉफ्ट पावर के दूत हैं। ओलंपिक पोडियम पर तिरंगा केवल एक पदक का उत्सव नहीं, वह करोड़ों युवाओं के भीतर आत्मविश्वास पैदा करता है। खेल अनुशासन सिखाता है, पराजय को स्वीकार कर फिर उठना सिखाता है, टीम भावना विकसित करता है और व्यक्तिगत सफलता को राष्ट्रीय गौरव से जोड़ता है।
















