श्रावण पूर्णिमा पर हम ‘विश्व संस्कृत दिवस’ मनाते हैं। इस दिन हम संस्कृत को ज्ञान और अभिव्यक्ति के एक ऐसे शाश्वत स्रोत के रूप में मान्यता देते हैं, जिसका विभिन्न क्षेत्रों पर गहरा प्रभाव रहा है। यह दिन दुनिया भर में उन लोगों के प्रयासों का सम्मान करने का अवसर है जो संस्कृत सीखने और उसे बढ़ावा देने में लगे हुए हैं।
श्री अरबिंदो ने संस्कृत को “मानव मस्तिष्क द्वारा विकसित सबसे शानदार, सबसे पूर्ण, सबसे प्रमुख और अद्भुत रूप से सक्षम साहित्यिक माध्यमों में से एक” बताया था। भाषा दुनिया भर के लोगों को जोड़ने वाले एक पुल का काम करती है; यह भावनाओं की अभिव्यक्ति, रिश्तों, शिक्षण-अधिगम, विचारों के आदान-प्रदान और विज्ञान व तकनीक की नींव को सुगम बनाती है। भारत और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं, और हर भाषा की अपनी अनूठी पहचान होती है जो उसे बोलने वालों के बीच समुदाय की भावना को बढ़ावा देती है।
हमारी मूल भाषाओं और उनसे जुड़ी कहानियों व प्रभाव का खोना
अपनी मातृभाषा को समझने और उसका उपयोग करने से सभी को लाभ होता है। हमें सभी भाषाओं का सम्मान करना चाहिए, लेकिन अपनी भाषा की उपेक्षा न करना भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। हम एक ऐसी औपनिवेशिक मानसिकता से प्रभावित रहे हैं जो हमें अपनी जड़ों से दूर करती है। इसके कारण संस्कृत-जो एक महान वैज्ञानिक भाषा है-और हमारी स्थानीय व राष्ट्रीय भाषाओं का ह्रास हुआ है, जिसका हमारे आध्यात्मिक, सामाजिक और आर्थिक कल्याण पर गहरा प्रभाव पड़ा है।
हमारी मूल भाषाओं के खोने के दूरगामी परिणाम हुए हैं, जिसके कारण उनका पुनर्मूल्यांकन करने और उन्हें पुनः अपनाने के प्रयासों की आवश्यकता है। इतिहास में आध्यात्मिक शक्ति के केंद्र के रूप में मान्यता प्राप्त होने और आज भी जीवन का एक महत्वपूर्ण पहलू होने के बावजूद, संस्कृत और स्थानीय भाषाओं को छोड़ने के कारण हमने महत्वपूर्ण सामाजिक और आर्थिक आधार खो दिया है।
यूरोप और अमेरिका के विभिन्न विश्वविद्यालयों ने संस्कृत पर शोध किया है। इन शोध से पता चलता है कि श्लोकों के दैनिक पाठ के साथ संस्कृत का अभ्यास करने से याददाश्त, बुद्धि और मानसिकता में सुधार होता है। दुर्भाग्य से, स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस और वामपंथी सरकारों ने धर्मनिरपेक्षता और राजनीतिक एजेंडे की आड़ में व्यवस्थित रूप से संस्कृत को हाशिए पर धकेल दिया है। इसके अलावा, हमने संस्कृत में मौजूद समृद्ध वैदिक साहित्य के अध्ययन की भी उपेक्षा की है, जिसमें विज्ञान, तकनीक और विभिन्न विषयों की ऐसी महत्वपूर्ण अवधारणाएँ शामिल हैं जो हमारे जीवन को गहराई से प्रभावित करती हैं।
शोध से यह सिद्ध हुआ है कि बच्चे द्वारा नई अवधारणाओं को शुरुआती स्तर पर समझने के लिए संस्कृत और मातृभाषा अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। नई शिक्षा नीति छात्रों में वैचारिक समझ और तर्कशक्ति विकसित करने के साथ-साथ आत्मविश्वास बढ़ाने की इस आवश्यकता को पहचानती है—एक ऐसा आत्मविश्वास जिसे विदेशी भाषाओं के अत्यधिक महिमामंडन के कारण आज की पीढ़ी के कई लोगों ने खो दिया है। किसी देश का अस्तित्व और निरंतरता इस बात पर निर्भर करती है कि वहां के लोग अपनी जड़ों-जिसमें उनकी भाषा भी शामिल है-से कितने गहराई से जुड़े हैं। समय के साथ, हमारी सोच अपनी भाषाओं को महत्व देने से दूर हो गई है, जिससे हम अपनी विरासत से कट गए हैं। नई शिक्षा नीति को जल्द लागू करके इस जुड़ाव को सक्रिय रूप से बढ़ावा देना ज़रूरी है।
इसके अलावा, संस्कृत और स्थानीय भाषाएं किसी देश के सांस्कृतिक और आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। जब हम जीडीपी के मामले में शीर्ष 20 देशों को देखते हैं, तो पाते हैं कि उनमें से कई अपनी मातृभाषा को प्राथमिकता देते हैं; वैश्विक संचार के लिए अंग्रेज़ी का उपयोग करने के बावजूद, यह उनकी आर्थिक और सांस्कृतिक प्रगति में सहायक होता है।
पश्चिमी और पश्चिमी प्रभाव वाले भारत-विदों (Indologists) का एक वर्ग ऐसी धारणा फैला रहा है जो संस्कृत के अध्ययन को एक राजनीतिक मुद्दा बनाता है। उनका तर्क जो पुरी तरह गलत है कि इसमें ऐसी बातें हैं जो वैदिक, ब्राह्मणवादी और शाही वर्चस्व को बनाए रखती हैं, और शूद्रों, महिलाओं, मुसलमानों तथा ‘अन्य’ माने जाने वाले समूहों के प्रति दमनकारी दृष्टिकोण को बढ़ावा देती हैं। ऐसे लोग संस्कृत को केवल वैदिक ज्ञान या राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित साहित्य का संग्रह मानते हैं, जिसे केवल ऐतिहासिक जिज्ञासा की वस्तु के रूप में देखा जाना चाहिए। वे मौखिक परंपराओं को खारिज करते हैं और संस्कृत को एक जीवित भाषा के रूप में पुनर्जीवित करने के प्रयास को सांप्रदायिक हिंसा और हाशिए पर मौजूद समूहों के प्रति शत्रुतापूर्ण मानते हैं।
संस्कृत अध्ययन केंद्र, जो पहले भारत से यूरोप ले जाए गए थे, अब अमेरिका चले गए हैं, जहाँ आजकल संस्कृत पर ज़्यादातर शैक्षणिक अनुसंधान होता है। यह अनुसंधान अक्सर पश्चिमी सिद्धांतों से प्रभावित होती है, जिसे ‘अमेरिकन ओरिएंटलिज़्म’ कहा जाता है। युवा समाज विज्ञानी को इस संदर्भ में प्रशिक्षण दी जा रही है ताकि वे संस्कृत के लिए नए “डिटॉक्सिफाइड” (शुद्ध किए गए) तरीके विकसित कर सकें, जो स्मृतियों जैसे हों लेकिन विकृत हो। अगर यह प्रचलन जारी रहा, तो भारत अपनी सभ्यता के बारे में ज्ञान पैदा करने वाले देश से गलत ज्ञान आयात करने वाले देश में बदल सकता है।
साथ ही, पश्चिमी विद्वानों और जानकारों का एक विविध समूह प्राचीन संस्कृत में गहरी रुचि ले रहा है। वे इसकी दार्शनिक गहराई, आध्यात्मिक समझ और भौतिकी व मनोविज्ञान जैसे विभिन्न क्षेत्रों में इसके संभावित योगदान से आकर्षित हैं। ये लोग सदियों से जमा संस्कृत की मूल्यवान सांस्कृतिक विरासत को सामने लाने के लिए प्रेरित हैं।
संक्षेप में, पश्चिम में संस्कृत और उसके सांस्कृतिक महत्व की खोज दो मुख्य उद्देश्यों से प्रेरित है: समाज विज्ञानी और मानविकी के अभ्यासक हिंदू धर्म में मानी जाने वाली समस्याओं को उजागर करके भारत के इतिहास की नई व्याख्या करना और उसके भविष्य को नया रूप देना चाहते हैं; और वैज्ञानिक व आध्यात्मिक साधक इसके ज्ञान के समृद्ध भंडार का लाभ उठाना चाहते हैं।
बातचीत में संस्कृत के ऐसे शब्द जिनका अनुवाद नहीं
संस्कृत और संस्कृति को फिर से जीवंत करने के लिए, संस्कृत के ऐसे शब्दों को मुख्यधारा की बातचीत में शामिल करना ज़रूरी है जिनका अनुवाद नहीं किया जा सकता। महत्वपूर्ण संस्कृत अवधारणाओं की समझ बढ़ाना प्राथमिकता होनी चाहिए, भले ही लोग भाषा में पूरी तरह माहिर न हों। इससे यह स्पष्ट होगा कि पश्चिमी संदर्भों में आम अनुवाद (जैसे ‘आत्मा’ का अनुवाद ‘सोल’ के रूप में करना) क्यों भ्रामक हो सकते हैं। उद्देश्य इन शब्दों को आम बोलचाल की अंग्रेज़ी में शामिल करना होना चाहिए, ताकि इनके विचार मुख्यधारा की बातचीत का हिस्सा बन सकें। मौजूदा अनुवाद अक्सर शब्दों को उनके संदर्भ से हटाकर उनके अर्थ को बिगाड़ देते हैं, इसलिए गलत इस्तेमाल से बचने के लिए संस्कृत शब्दों और उनकी ऐतिहासिक व आध्यात्मिक पृष्ठभूमि की शुद्धता बनाए रखना ज़रूरी है।
संस्कृत को फिर से स्थापित करना
प्राचीन शास्त्रों को नवाचार के लिए गतिशील मंच माना जाना चाहिए; ये ऐसे विश्वकोश हैं जिनमें वास्तुकला, खगोल विज्ञान और दर्शन जैसे विभिन्न क्षेत्रों की बौद्धिक उपलब्धियाँ शामिल हैं। इस ज्ञान को संदर्भ के अनुसार समझा जाना चाहिए, जहाँ संभव हो वैज्ञानिक रूप से फिर से परखा जाना चाहिए, और भविष्य की प्रगति के लिए आधार के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए। उद्देश्य केवल गर्व के कारण प्राचीन श्लोकों का पाठ करना नहीं है, बल्कि संस्कृत के ज्ञान को समकालीन समझ के साथ मिलाकर आधुनिक चुनौतियों का समाधान करना है। शास्त्र कभी भी स्थिर नहीं थे; वे बहस और अनुकूलन के माध्यम से विकसित हुए। अफ़सोस की बात है कि पारंपरिक विशेषज्ञ कम होते जा रहे हैं; वे अक्सर नए ग्रंथ लिखने के बजाय पुराने ग्रंथों की नकल करने पर ज़्यादा ध्यान देते हैं। नतीजतन, शास्त्र-ज्ञान पर ज़्यादातर शोध पश्चिमी विद्वान करते हैं, जो अक्सर इसके मूल सांस्कृतिक संदर्भ को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। इससे संस्कृत परंपरा में सामाजिक और आर्थिक पूंजी का नुकसान होता है।
फिलहाल, वेदांत शास्त्रों के बीच एक जीवंत क्षेत्र बना हुआ है, जिसे मोक्ष-शास्त्र के रूप में जाना जाता है। मोक्ष की खोज को अलग काम मानने के बजाय इसे अलग-अलग व्यावहारिक संदर्भों में शामिल किया जाना चाहिए, ताकि परमार्थिक और व्यावहारिक क्षेत्रों के अटूट संबंध को उजागर किया जा सके। शास्त्र ज्ञान का एक ऐसा संगठित समूह हैं जिन्हें समग्र रूप से समझा जाना चाहिए, जिसमें सभी व्यावहारिक पहलुओं पर ध्यान दिया जाए। दिलचस्प बात यह है कि पश्चिमी भारत-विज्ञानी पोलक वैदिक ब्रह्मांड-विज्ञान के साथ शास्त्रों की अभिन्न एकता की आलोचना करते हैं; हालाँकि, हमें इसी एकता को बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि हर शास्त्र एक अनोखी बौद्धिक परंपरा पर आधारित है।
भारतीय पुनर्जागरण की नींव के रूप में संस्कृत को फिर से स्थापित करने का मकसद स्मृतियों को लिखने की कला में नई जान डालना है। उदाहरण के लिए, हमें पिछले एक हज़ार सालों की दो बड़ी दुखद घटनाओं को दिखाने के लिए नए इतिहास-ग्रंथों की ज़रूरत है: इस्लामी आक्रमण (खासकर भारत के बड़े हिस्से पर औरंगज़ेब का शासन) और 18वीं से 20वीं सदी तक ब्रिटिश उपनिवेशवाद। यह जानना ज़रूरी है कि ऐसे इतिहास-ग्रंथ कैसे लिखे जाते हैं, क्योंकि हम आज भी इस साहित्यिक शैली का सही तरीके से इस्तेमाल कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, महाभारत न सिर्फ़ राजनीतिक विषयों पर बात करती है, बल्कि व्यक्ति, समूह, समुदाय और समाज के स्तर पर दुखद घटनाओं से जुड़े सबक भी देती है। इस कथा को वेदों के व्यापक ढांचे के संदर्भ में समझा जाना चाहिए, जिससे भारतीय नज़रिए को उपनिवेशवाद के प्रभाव से मुक्त करने और ऐतिहासिक संदर्भों की हमारी समझ को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।
‘भारतीय महा आख्यान’ पहल के हिस्से के तौर पर, हमें भारतीय विज्ञान और तकनीक के इतिहास को भी दर्ज करना चाहिए। सिंधु-सरस्वती सभ्यता के समय से लेकर हमारे अतीत के सभी ज्ञान को विश्लेषणात्मक रूप से और इतिहास-ग्रंथ के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए ताकि इसे व्यापक रूप से साझा किया जा सके।
संस्कृत पारिस्थितीकी तंत्र को पूरी तरह से फिर से जीवंत करने की ज़रूरत है। सबसे ज़रूरी बात यह है कि हमें संस्कृत को एक ऐसी जीवित परंपरा के हिस्से के तौर पर पढ़ने-पढ़ाने का नमूना बनाना चाहिए जो आज भी चलन में है। भारतीय पहचान के लिए संस्कृत और संस्कृति के महत्व को समझना ज़रूरी है। कई लोग और संस्थाएं, जैसे कि ‘संस्कृत भारती’ (जिसके भारत में लगभग 5,000 केंद्र और करीब 15 अन्य देशों में शाखाएं हैं), संस्कृत को फिर से जीवित करने के लिए लगन से काम कर रही हैं। वे इस भाषा को बढ़ावा देने के लिए लगभग 10,000 स्वयंसेवकों की मदद ले रहे हैं और साथ ही मुद्रित और अंकीय दोनों प्रारूप में 500 से ज़्यादा किताबें भी प्रकाशित कर रहे हैं।
भाषा परिवार, दोस्तों और समुदायों के बीच संबंध बनाने में अहम भूमिका निभाती है। कोरोना महामारी के दौरान लोगों के एक-दूसरे का साथ देने से आपसी जुड़ाव पर भाषा के असर को साफ देखा गया। अलग-अलग इलाकों में साल भर मनाए जाने वाले त्योहार लोगों में खुशियां लाते हैं और अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देते हैं, और इसमें काफी हद तक अपनी मातृभाषा का प्रभाव होता है।
सभी भाषाओं की सराहना करें
आइए, हम सब मिलकर अपनी भाषाओं का जश्न मनाएं। इस बात पर मुकाबला न करें कि कौन सी भाषा बेहतर है, बल्कि सभी भाषाओं की सराहना करें। साथ ही, आने वाली पीढ़ियों को संवारने और अपनी जड़ों को बचाए रखने के लिए संस्कृत के साथ-साथ स्थानीय और राष्ट्रीय भाषाओं पर भी ध्यान दें। हर माता-पिता, स्कूल, विरोधी पक्ष और सरकार को राजनीतिक स्वार्थ के बजाय नई शिक्षा नीतियों को लागू करने को प्राथमिकता देनी चाहिए।















