भारत में सनातन काल से ही क्रीड़ा का क्रमिक विकास होता आया है। परंपरागत व्यायामY एवं खेलों से लेकर वर्तमान में स्थापित आधुनिक खेलों तक यह विकास विभिन्न कालखंडों में अलग-अलग रूपों में हुआ है। खेलों में निहित मूल्यों, विविध गुणों, युद्धविद्या, व्यायाम, योग से लेकर आनंद की अनुभूति तक इस की विकास यात्रा है। हमारे जीवन में खेलों का अपना विशिष्ट स्थान रहा है। गांव का दृश्य किस प्रकार होना चाहिए, इसका वर्णन तुकडोजी महाराज लिखित मराठी भाषा के ग्रामगीता में प्रतिपादित है।
कोणी धावती, कोणी चालती, कोणी आसने, सुर्यनमस्कार घालती ।
कोणी गाती, चिंतन करिती, हे दृश्य दिसो प्रभासी।।
अर्थात् उस समय कोई दौड़ लगा रहा हो, कोई चल रहा हो, कोई योगासन-सूर्य नमस्कार या व्यायाम कर रहा हो, कोई गा रहा हो, कोई ध्यान कर रहा हो, ऐसा सुंदर दृश्य प्रातः दिखना चाहिये । भारत में बल, सौष्ठव और शरीर-साधना की परंपरा प्राचीन काल से ही आम जनजीवन की दैनिक साधना का अंग रही है।
नियमित रूप से चलना, मेहनत करना और आलस्य से बचना स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए आवश्यक है। इसका उद्देश्य समग्र शारीरिक विकास के साथ व्यक्तित्व एवं मानसिक विकास को भी उससे जोड़ा गया था। व्यायाम, शरीर-साधना और विभिन्न क्रीड़ाओं के माध्यम से स्वस्थ, सक्षम और संतुलित जीवन की कल्पना की गई है।
सामाजिक भाव को सुदृढ़ करने में खेलों की भूमिका
खेल व्यक्ति को व्यक्ति से जोड़ने, सामाजिक समरसता को बढ़ाने तथा मन से मन को जोड़ने का प्रभावी माध्यम हैं। खेलों के माध्यम से ‘मैं’ से ‘हम’ की यात्रा को गति मिलती है। सामूहिक खेलों में सहयोग, सहभागिता, परस्पर विश्वास, नेतृत्व विकास और सामाजिक बंधुत्व की भावना विकसित होती है। भगवान श्रीकृष्ण के जीवन और उनसे संबंधित अनेक प्रसंगों में खेल तथा सामूहिक जीवन के ऐसे स्वरूपों के उदाहरण दिखाई देते हैं।
विजय प्राप्त करने की इच्छा
खेलों का एक महत्वपूर्ण पक्ष प्रतिस्पर्धा भी रहा है। प्रतिस्पर्धा के माध्यम से विजिगीषु वृत्ति अर्थात् विजय प्राप्त करने की इच्छा, पराक्रम, साहस और श्रेष्ठ प्रदर्शन की प्रेरणा विकसित होती है। इसके लिए अनेक प्रकार की विद्याएं, कलाएं और खेल विकसित हुए। आखेट, शिकार, रथ-संचालन तथा विभिन्न प्रकार की स्पर्धाओं का उल्लेख हमारे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। मनोरंजन अथवा रुचि के लिए खेले जाने वाले खेल भी इसी व्यापक परंपरा का हिस्सा रहे हैं। इन स्पर्धाओं में प्रतिस्पर्धा अवश्य थी, परंतु आज के समान प्रत्येक उपलब्धि को आंकड़ों और अभिलेखों में दर्ज करने की प्रवृत्ति प्रमुख नहीं थी।
व्यावसायिक और आर्थिक दृष्टि
पिछले कुछ दशकों के दौरान खेलों का व्यापक विस्तार हुआ है। खेलों से संबंधित व्यावसायिक व्यवस्थाएं विकसित हुई हैं। खेल अब एक विशिष्ट व्यावसायिक क्षेत्र के रूप में भी स्थापित हो चुके हैं। आज भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड (BCCI) की आर्थिक शक्ति अत्यंत प्रभावशाली है। प्रो कबड्डी, अल्टीमेट खो-खो तथा विभिन्न प्रीमियर लीग जैसी प्रतियोगिताओं के माध्यम से खिलाड़ियों की नीलामी होती है। इसके साथ ही खिलाड़ियों को प्रसिद्धि और आर्थिक संसाधन भी बड़ी मात्रा में प्राप्त होते हैं। विज्ञापन, संचार माध्यम, दूरदर्शन चैनल, ओटीटी मंच, ई-गेमिंग, ई-स्पोर्ट्स, प्रायोजन तथा खेल-सामग्री निर्माण, पर्यटन जैसे अनेक क्षेत्र खेलों से जुड़े हैं। खेल अब एक विस्तृत उद्योग का रूप ले चुके हैं। वैश्विक बाजार शक्तियों का प्रभाव भी खिलाड़ियों की खेल-वृत्ति और खेल के मूल उद्देश्य को प्रभावित कर रहा है। ऐसे में खेल-सृष्टि के प्रत्येक क्षेत्र में भारतीय दृष्टि से चिंतन की आवश्यकता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
खेलों की प्राचीन परंपरा
भारत में हजारों वर्षों से खेलों की परंपरा रही है। भारत की क्रीड़ा-परंपरा आज भी समाज में जीवित है। राजा महाराजाओं की व्यायामशालाओं की प्रथाओं के अनुसार आज भी प्रासंगिक प्रतीकात्मक कुश्ती का प्रचलन है। विविध उत्सव तीज त्योहारों के निमित्त खेलने की वृत्ति यह दर्शाती है कि भारत में सदियों से खेलने की परंपरा रही है। भालाफेंक, धनुर्विद्या, घुड़दौड़, भारत्तोलन, पोलो, चतुरंग, चौसर सहित अनेक परंपरागत खेलों को भारत सदियों से खेलता आ रहा है।
खेलों का भारतीय दर्शन
भारत में अनेक खेल स्थानीय और स्वाभाविक रूप से विकसित हुए हैं। इन खेलों में भारतीय दर्शन और जीवन-दृष्टि का प्रभाव दिखाई देता है। साहित्य के दृष्टि से मल्लपुराण, धनुर्वेद, संत रामदास एवं तुकडोजी महाराज द्वारा लिखित दासबोध तथा ग्रामगीता सहित श्री सुरेशजी देशपांडे द्वारा किया गया शोध-Physical Education In Ancient India, तथा श्री द. चि. करंदीकर द्वारा संकलित दस खण्डों की श्रृंखला व्यायाम ज्ञानकोश में इन विषयों के संदर्भ प्राप्त होते हैं।
व्यायाम पद्धतियों की लोकप्रियता
भारतीय व्यायाम-पद्धतियों में प्रयुक्त अनेक उपकरण आज भी लोकप्रिय हैं। मुदगल , रस्सी कूद, गदा, मल्लखंभ, कलारिपट्टू, गतका, थंगता आदि इसके उदाहरण हैं। इनका उपयोग शरीर की शक्ति, संतुलन, लचीलापन और सामर्थ्य के विकास के लिए किया जाता रहा है। राजा महाराजाओं की सेना व्यायाम शालाओं और अखाड़ों में युद्धकला सीखती थीं। छत्रपति शिवाजी महाराज के कालखंड में संत रामदास स्वामी द्वारा हनुमानजी के मंदिर तथा मठों में व्यायाम शालाएं हुआ करती थीं।
महापुरुषों का खेलों से संबंध
भारत के अनेक स्वतंत्रता सेनानी और राष्ट्रीय जागरण के अग्रणी व्यक्ति खेल एवं शारीरिक साधना के महत्व को समझते थे। वीरांगना झांसी की रानी लक्ष्मीबाई अनेक युद्धकलाओं में निपुण थीं। तात्या टोपे अपनी दिनचर्या में व्यायाम को प्राथमिकता देते थे। स्वामी प्रणयानंद द्वारा स्थापित भारत सेवा संघ की कार्यप्रणाली में खेलों का प्रावधान रहा करता था। स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित गुरुकुलों में व्यायाम नित्य जीवन का अंग था। स्वामी विवेकानंद का स्वयं विविध खेल खेलना और फुटबॉल के प्रति उनका अनुराग सर्वज्ञात है। गुजरात के अंबुभाई एवं छोटूभाई पुराणी बंधुओं द्वारा स्थापित गुजरात व्यायाम प्रचारक मंडल युवाओं को संगठित कर उन्हें सशस्त्र क्रांतिकार्य के लिए प्रेरित करता था।
1926 में यतीन्द्रनाथ बोस के नेतृत्व में प्रारंभ हुई समिति शारीरिक प्रशिक्षण का प्रमुख केंद्र थी। महाष्टमी को ‘वीराष्टमी दिवस’ के रूप में मनाया जाता था, जिसमें व्यायाम, कुश्ती, मुक्केबाजी, लाठी और तलवारबाजी के माध्यम से साहस एवं शक्ति का प्रदर्शन होता था। सुभाषचंद्र बोस इससे निकटता से जुड़े थे और कई वर्षों तक वीराष्टमी उत्सव का उद्घाटन करते रहे। लोकमान्य तिलक ने पुणे में डेक्कन जिमखाना की स्थापना खेलों को प्रोत्साहन देने के लिए ही की थी। चंद्रशेखर आजाद जैसे व्यक्तित्व शारीरिक सौष्ठव के उदाहरण हैं। इन सभी महानुभावों ने खेलों को सामर्थ्य, साहस और व्यक्तित्व-निर्माण का माध्यम बनाया था। इससे स्वाधीनता संग्राम के अनेक क्रांतिकारियों का निर्माण हुआ।
खेल और शारीरिक शिक्षा के केंद्र
हनुमान व्यायाम प्रसारक मंडल, अमरावती, महाराष्ट्र-वैद्य बंधुओं द्वारा 1914 में स्थापित यह भारत का प्रथम भारतीय खेल एवं व्यायाम शिक्षा केंद्र है। इसका मुख्य उद्देश्य स्वतंत्रता संग्राम के दौरान युवाओं को शारीरिक एवं मानसिक रूप से सशक्त बनाना रहा है। इसी संस्था द्वारा 1936 में बर्लिन ओलंपिक के समय भारतीय खेल एवं व्यायाम का प्रदर्शन किया गया था। योग, सूर्यनमस्कार, भारतीय आहार-पद्धति तथा पारंपरिक उपचार-पद्धतियों का उपयोग आज भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के अनेक भागों में हो रहा है। इनका शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य से गहरा संबंध है। विचलित अवस्था में भी बुद्धि एवं मन को संयमित रखने का मार्ग महाभारत के श्रेष्ठ योद्धा अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण द्वारा दिए गए श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेश में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
युद्धविद्याओं का खेलों में रूपांतरण
भारत की अनेक पारंपरिक युद्धविद्याओं ने समय के साथ खेलों का स्वरूप धारण किया है। कलरीपयट्टु, कुश्ती, थांग-टा, गतका, नियुद्ध, भाला, मुष्टियुद्ध और धनुर्विद्या आदि इसके उदाहरण हैं। इनमें शारीरिक सामर्थ्य के साथ अनुशासन, एकाग्रता, साहस और आत्मसंयम का भी विकास होता है। गुजरात स्थित प्राचीन नगर-सभ्यता के अवशेषों में प्राप्त धोलावीरा का विशाल सार्वजनिक क्रीड़ा मैदान तथा अन्य संरचनाएं यह संकेत देती हैं कि भारत की प्राचीन सभ्यता में सार्वजनिक गतिविधियों और सामुदायिक जीवन के लिए विकसित क्रीड़ा संरचनाओं की समृद्ध परंपरा रही है।
खेल-जगत की कमियां
आज खेल-सृष्टि में कुछ ऐसी स्थितियां भी दिखाई देती हैं, जिनमें भारतीय दृष्टि और भारतीय भाव का पर्याप्त समावेश नहीं हो पा रहा है। वैश्विक बाजार शक्तियों के प्रभाव के कारण खेल प्रतियोगिताओं में अत्यधिक मात्रा में धन का आदान-प्रदान होता है। खेल में देश, दल और राष्ट्रभाव के लिए खेलने की भावना अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। किंतु वर्तमान में कहीं-कहीं सामूहिक उपलब्धि की अपेक्षा व्यक्तिगत कीर्तिमान और व्यक्तिगत प्रसिद्धि को अधिक महत्व दिए जाने की प्रवृत्ति दिखाई देती है।
पारदर्शिता और सेवा-भाव की आवश्यकता
खेल समाज का है और खेल को चलाने तथा विकसित करने वाली व्यवस्थाएं भी समाज से ही निर्मित होनी चाहिए। इसी भावना से खेलों को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए अनेक गैर-शासकीय संस्थाओं और संगठनों का निर्माण हुआ। किंतु वर्तमान परिदृश्य में कुछ स्थानों पर अनियमितता, अपारदर्शिता, शोषण तथा विशिष्ट व्यक्तियों का लंबे समय तक प्रभाव दिखाई देता है। ऐसी स्थितियां खेल-व्यवस्था को कमजोर करती हैं।
शारीरिक शिक्षा में भारतीयता का अभाव
भारतीय ज्ञान, भारतीय व्यायाम-पद्धतियों, योग, आयुर्वेद, शरीर-विज्ञान, मानसशास्त्र और भारतीय जीवन-दृष्टि को समुचित स्थान देते हुए शारीरिक शिक्षा के पाठ्यक्रम का भारतीय ज्ञान के आधार पर संशोधन तथा पुनर्लेखन किया जाए। ई-गेमिंग और ई-स्पोर्ट्स का विस्तार तेजी से हो रहा है। ऐसे में यह विचार करना आवश्यक है कि इनमें शारीरिक और मानसिक विकास का संतुलन किस प्रकार स्थापित हो सकता है।
क्या इनका अनियंत्रित विस्तार भविष्य में शारीरिक निष्क्रियता और अन्य चुनौतियों का कारण बन सकता है? इस विषय पर गंभीर दीर्घकालिक दृष्टि आवश्यक है। खेल और शिक्षा के बीच पर्याप्त समन्वय स्थापित करना अभी भी एक चुनौती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति और राष्ट्रीय खेल नीति के उद्देश्यों में प्रभावी तालमेल विकसित करना आवश्यक है, ताकि शिक्षा व्यवस्था में खेल केवल अतिरिक्त गतिविधि न रहकर व्यक्तित्व-विकास का अभिन्न अंग बन सके।
ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिभा की खोज
जनजातीय क्षेत्रों में प्रतिभा की खोज कर वहां की स्थानीय जीवन-पद्धति, संस्कृति और मानसिकता के अनुरूप खेल-जगत में उनकी सहभागिता बढ़ाने की आवश्यकता है। स्थानीय खेल-कौशल और पारंपरिक शारीरिक क्षमताओं को पहचानकर उन्हें आधुनिक प्रशिक्षण और अवसरों से जोड़ना उपयोगी हो सकता है। भारत की क्रीड़ा-परंपरा अत्यंत प्राचीन, व्यापक और जीवन के विविध पक्षों से जुड़ी हुई है। यहां खेल केवल मनोरंजन या प्रतिस्पर्धा का माध्यम नहीं रहे, बल्कि शरीर-साधना, व्यक्तित्व-विकास, सामाजिक समरसता, साहस, अनुशासन, आनंद और जीवन-मूल्यों के विकास का साधन रहे हैं।
वर्तमान समय में खेलों का स्वरूप व्यावसायिक, वाणिज्यिक और वैश्विक हो चुका है। इस परिवर्तन को नकारना उचित नहीं है, किंतु इसके बीच खेल के मूल उद्देश्य और भारतीय जीवन-दृष्टि को बनाए रखना आवश्यक है। आधुनिक खेल विज्ञान और वैश्विक अनुभवों को स्वीकार करते हुए भारतीय ज्ञान, परंपरा, जीवन-मूल्य और समाज-केंद्रित दृष्टि का समन्वय ही खेल-सृष्टि को अधिक स्वस्थ, सार्थक और समाजोपयोगी दिशा दे सकता है।

















