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पंढरपुर परंपरा पर प्रस्तुति

नई दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) में 'पंढरपुर वारी–700 वर्ष पुरानी परंपरा पर संवाद एवं प्रस्तुति

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jul 29, 2026, 09:42 pm IST
inधर्म-संस्कृति
कार्यक्रम में पुस्तक का लोकार्पण करते (बाएं से) प्रो. सुधीर लाल, श्री वैभव डांगे, डॉ. सच्चिदानंद जोशी, डॉ. विजय चौथाईवाले और श्री विवेक गाडगे

कार्यक्रम में पुस्तक का लोकार्पण करते (बाएं से) प्रो. सुधीर लाल, श्री वैभव डांगे, डॉ. सच्चिदानंद जोशी, डॉ. विजय चौथाईवाले और श्री विवेक गाडगे

गत 23 जुलाई को नई दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) में ‘पंढरपुर वारी–700 वर्ष पुरानी परंपरा पर संवाद एवं प्रस्तुति’ विषयक एक विशेष कार्यक्रम हुआ। इसका उद्देश्य विभिन्न देशों के राजनयिकों एवं सांस्कृतिक प्रतिनिधियों को वारी के सांस्कृतिक, सामाजिक और सभ्यतागत महत्व से परिचित कराना था। कार्यक्रम में रूस, सूरीनाम, फिलीपींस, अंगोला, मॉरीशस, थाईलैंड, संयुक्त राज्य अमेरिका, मोल्दोवा, ऑस्ट्रेलिया, भूटान, इंडोनेशिया और ब्राजील के राजनयिक एवं सांस्कृतिक प्रतिनिधियों ने सहभागिता की।

इस अवसर पर आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कुंभ मेले का उल्लेख करते हुए कहा कि पंढरपुर वारी भी ऐसी ही एक अद्वितीय परंपरा है, जिसने सात शताब्दी से भारतीय समाज के सांस्कृतिक चरित्र, सामाजिक समरसता, भक्ति और सामूहिक चेतना को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। भाजपा अंतरराष्ट्रीय संपर्क विभाग के प्रमुख डॉ. विजय चौथाईवाले ने वारकरी परंपरा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उसके उद्भव की परिस्थितियों पर प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि विदेशी आक्रमणों और सामाजिक अस्थिरता के दौर में संत ज्ञानेश्वर, संत नामदेव, संत एकनाथ और संत तुकाराम जैसे संतों ने भक्ति आंदोलन के माध्यम से समाज में आत्मविश्वास, नैतिक शक्ति और आध्यात्मिक चेतना का संचार किया। उन्होंने कहा कि वारी ने समाज का मनोबल बढ़ाने, सांस्कृतिक अस्मिता को सुरक्षित रखने तथा सामाजिक एकता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कार्यक्रम में दिल्ली मराठी प्रतिष्ठान के संस्थापक श्री वैभव डांगे द्वारा लिखित पंढरपुर वारी पर आधारित पुस्तक का लोकार्पण भी किया गया।

श्री डांगे ने वारी को केवल एक धार्मिक यात्रा न बताते हुए इसे 700 वर्ष से चली आ रही एक जीवंत सभ्यतागत परंपरा के रूप में प्रस्तुत किया, जो समता, विनम्रता, सेवा, अनुशासन, सामूहिक सहभागिता और भक्ति के मूल्यों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाती रही है। उपस्थित राजनयिक प्रतिनिधियों ने वारी के इतिहास, संगठनात्मक व्यवस्था, अनुशासन, सामाजिक प्रभाव, समता के दर्शन, समुदाय निर्माण में इसकी भूमिका तथा आधुनिक विश्व में इसकी प्रासंगिकता को लेकर उत्सुकतापूर्वक अनेक प्रश्न पूछे।

कार्यक्रम का समापन इस साझा भावना के साथ हुआ कि पंढरपुर वारी केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, सामाजिक समावेश, मानवता और भारतीय सभ्यता की निरंतरता का एक सशक्त प्रतीक है। इस आयोजन ने भारत और विभिन्न देशों के राजनयिक समुदाय के बीच सांस्कृतिक संवाद को और अधिक सुदृढ़ किया तथा भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की एक अनूठी परंपरा को वैश्विक समुदाय के समक्ष प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।

 

Topics: वारकरी परंपरासभ्यतागत परंपरासांस्कृतिक एवं सामाजिकसंत ज्ञानेश्वरसंत एकनाथसामाजिक समरसतासंत तुकारामइंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्रअंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिभक्ति आंदोलनडॉ. सच्चिदानंद जोशीसंत नामदेवडॉ. विजय चौथाईवालेसांस्कृतिक संवादश्री वैभव डांगेपंढरपुर वारी
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