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होम भारत

डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर: विकसित भारत की अटूट नींव

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वडोदरा में 'वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर' के शेष भाग का उद्घाटन किया। यह माल ढुलाई के लिए बनाया गया एक विशेष और उच्च क्षमता वाला रेल मार्ग है।

Written byप्रेम शुक्लप्रेम शुक्ल
Sep 16, 2026, 07:18 pm IST
inभारत, मत अभिमत

अभी हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वडोदरा में ‘वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर’ के शेष भाग का उद्घाटन किया। यह माल ढुलाई के लिए बनाया गया एक विशेष और उच्च क्षमता वाला रेल मार्ग है। यह दादरी (उत्तर प्रदेश) से शुरू होकर रेवाड़ी, पालनपुर, वडोदरा होते हुए जवाहरलाल नेहरू पोर्ट (मुंबई) तक जाता है। इसकी लंबाई लगभग 1,502 किमी है। अब रेल के जरिए माल ढुलाई की गति बढ़ गई है।

वर्षों तक संप्रग सरकार ने जिस ‘डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर’ को केवल कागजों और शिलान्यासों तक सीमित रखा, उसे मोदी सरकार ने जमीन पर उतारकर दिखा दिया। ईस्टर्न और वेस्टर्न फ्रेट कॉरिडोर (लगभग 2,843 किलोमीटर) आज लगभग पूर्णता की ओर हैं। मालगाड़ियां, जो पहले पैसेंजर ट्रेनों को रास्ता देने के लिए घंटों लूप लाइनों पर खड़ी रहती थीं और जिनकी औसत गति 25 किमी/घंटा थी, वे आज 75 से 90 किमी/घंटा की गति से फर्राटा भर रही हैं। इससे बंदरगाहों से उत्तर और मध्य भारत के औद्योगिक केंद्रों तक कच्चे माल और तैयार उत्पादों की ढुलाई का समय 60 प्रतिशत तक घट गया है, जिससे देश के व्यापारिक तंत्र को वैश्विक बढ़त मिली है।

अडिग संकल्प का जीवंत उद्घोष

वास्तव में देखा जाए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीते 12 वर्ष केवल निर्माण के नहीं, बल्कि भारत के पुनरुत्थान के साक्षी रहे हैं। देश ने नीतिगत पंगुता और गड्ढों से जूझती व्यवस्था को पीछे छोड़कर आधुनिक ‘इंफ्रास्ट्रक्चर’ की जो गगनचुंबी छलांग लगाई है, उसने भारत के भूगोल और अर्थशास्त्र को ही नए सिरे से नहीं गढ़ा, बल्कि दशकों पुरानी हीनभावना और औपनिवेशिक मानसिकता को जड़ से उखाड़ फेंका है। हिमालय की दुर्गम चोटियों से लेकर सुदूर सागर तटों तक बिछता विश्वस्तरीय नेटवर्क अब केवल कंक्रीट का ढांचा नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों के अदम्य सामर्थ्य और ‘विकसित भारत’ के अडिग संकल्प का जीवंत उद्घोष है।

नीतिगत पंगुता से निकला देश

एक राष्ट्र के रूप में भारत जब 2014 के मुहाने पर खड़ा था, तब निराशा, नीतिगत पंगुता और विकास के नाम पर भ्रष्टाचार का बोलबाला था। 2014 से पहले के भारत का वह बदहाल चेहरा आज भी हर किसी को याद है। मुझे भली-भांति स्मरण है कि जब हम उस दौर में उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश या पूर्वोत्तर के राज्यों में जाते थे, तो यात्रा की योजना केवल दूरी देखकर नहीं, बल्कि सड़कों के गड्ढों का अनुमान लगाकर बनानी पड़ती थी। राष्ट्रीय राजमार्गों पर 200 किलोमीटर की दूरी तय करने में 7 से 8 घंटे का समय व्यर्थ होता था। रेलवे स्टेशनों पर फैली गंदगी, ट्रेनों की अंतहीन लेटलतीफी, बंदरगाहों पर हफ्तों फंसे रहने वाले मालवाहक जहाज और देश के दूरदराज के क्षेत्रों का देश की मुख्यधारा से कटाव– यही यूपीए सरकार की पहचान थी। यूपीए सरकार में योजनाएं फाइलों में दम तोड़ती थीं, पर्यावरण और अंतर-मंत्रालयीय मंजूरियों के नाम पर वर्षों तक योजनाएं लटकाई जाती थीं और देश के विकास का पहिया पूरी तरह थमा हुआ था। लेकिन मई, 2014 में देश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में एक नए युग का सूत्रपात किया। प्रधानमंत्री जी ने देश को एक स्पष्ट विजन दिया– “आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों के आत्मसम्मान, आर्थिक समृद्धि और 2047 तक ‘विकसित भारत’ के संकल्प की मजबूत नींव है।”

असली प्रतिबिंब

किसी भी देश की विकास दृष्टि का असली प्रतिबिंब उसका केंद्रीय बजट होता है। यूपीए सरकार में तो ‘इंफ्रास्ट्रक्चर’ पर खर्च को प्राथमिकता ही नहीं माना जाता था। 2013-14 में देश का कुल पूंजीगत व्यय महज 1.87 लाख करोड़ रु. के आसपास था। ‘इंफ्रास्ट्रक्चर’ को केवल चुनावी रेवड़ियों के बाद बची हुई राशि का झुनझुना समझा जाता था, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में वित्तीय वर्ष 2024-25 और उसके आगे पूंजीगत व्यय यानी कैपेक्स को ऐतिहासिक रूप से बढ़ाते हुए 11.11 लाख करोड़ रु से अधिक कर दिया गया। यानी बीते 12 वर्ष में बुनियादी ढांचे पर सरकारी निवेश में 6 गुना से अधिक की अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है। जब सरकार स्वयं ‘इंफ्रास्ट्रक्चर’ में पूंजी झोंकती है, तो इसका गुणात्मक प्रभाव पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इस कारण सीमेंट, स्टील, लॉजिस्टिक्स और भारी मशीनरी उद्योग को अभूतपूर्व गति मिली है और करोड़ों युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर सृजित हुए हैं।

बढ़ते राजमार्ग

2014 से पहले जहां देश में प्रतिदिन मात्र 11 से 12 किलोमीटर राजमार्ग का निर्माण होता था, वहीं मोदी सरकार के कार्यसंस्कृति परिवर्तन के बल पर निर्माण की यह गति बढ़कर 30 से 35 किलोमीटर प्रतिदिन तक पहुंच चुकी है। 2014 में देश में कुल राष्ट्रीय राजमार्ग लगभग 91,287 किलोमीटर थे, जो आज 2026 में बढ़कर 1.46 लाख किलोमीटर से अधिक हो चुके हैं। यानी मात्र 12 वर्ष में 55,000 किलोमीटर से अधिक नए राष्ट्रीय राजमार्ग जोड़े गए। 2014 से पहले देश में आधुनिक एक्सेस-कंट्रोल्ड एक्सप्रेसवे की अवधारणा लगभग नगण्य थी। आज भारत ‘एक्सप्रेसवे कैपिटल’ बनने की ओर अग्रसर है। दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे एवं गंगा एक्सप्रेसवे, समृद्धि महामार्ग (मुंबई-नागपुर), बेंगलुरु-मैसूरु एक्सप्रेसवे–इन विश्वस्तरीय गलियारों ने न केवल यात्रा का समय 50 से 60 प्रतिशत तक घटाया है, बल्कि लॉजिस्टिक्स लागत को घटाकर भारतीय विनिर्माण को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाया है।

रेल की गति और प्रगति

रेलवे, जो कभी कांग्रेस शासन में राजनीतिक तुष्टीकरण और घाटे का साधन बनी हुई थी, आज मोदी सरकार में देश के विकास का सबसे तेज इंजन बन चुकी है। 2014 से 2026 के बीच 31,000 किलोमीटर से अधिक नए ट्रैक (नई लाइनें, दोहरीकरण और गेज कन्वर्जन) जोड़े जा चुके हैं। आज हर साल औसतन 4,000 से 5,000 किलोमीटर ट्रैक बिछाए जा रहे हैं, जो रोजाना लगभग 14 किलोमीटर बैठता है। तुलना कीजिए 2004-2014 के बीच यह औसत मात्र 4 किलोमीटर प्रतिदिन था। 2014 तक देश के 65,000 किलोमीटर से अधिक के ब्रॉड गेज नेटवर्क में से मात्र 21,801 किलोमीटर (लगभग 35%) का ही विद्युतीकरण हुआ था। मोदी सरकार ने तेजी से काम करते हुए लगभग 100% ब्रॉड गेज नेटवर्क का विद्युतीकरण पूरा कर लिया है। आज भारत का रेल नेटवर्क पर्यावरण के अनुकूल, ऊर्जा-कुशल और तेज गति से दौड़ रहा है। देश के कोने-कोने को स्वदेशी तकनीक से बनी 100 से अधिक ‘वंदे भारत’ ट्रेनों ने जोड़ा है। ‘अमृत भारत स्टेशन योजना’ के तहत देश के 1,300 से अधिक रेलवे स्टेशनों को हवाई अड्डे जैसी आधुनिक सुविधाओं से लैस कर विश्वस्तरीय बनाया जा रहा है।

अभी हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने देश के आर्थिक रूप से सबसे व्यस्त 7 प्रमुख रेल कॉरिडोर (गोल्डन क्वाड्रिलेटरल और डायगोनल रूट्स) को पूरी तरह 4-लेन (फोर-ट्रैकिंग) करने की विशाल परियोजना को गति दी है। यह पूरा 11,000 किलोमीटर का रणनीतिक रेल नेटवर्क देश के कुल रेल यातायात का लगभग 40% हिस्सा संभालता है। इस विशाल नेटवर्क में से लगभग 2,000 किमी पहले से फोर-लेन है, लगभग 5,000 किमी पर कार्य प्रगति पर है और शेष 4,000 किमी को अंतिम मंजूरी देकर आगे बढ़ाया जा रहा है। इसके साथ ही कैबिनेट ने लगभग 20,800 करोड़ रु से अधिक की लागत से आठ मल्टी-ट्रैकिंग परियोजनाओं को मंजूरी दी है, जो पश्चिम बंगाल, ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना के 31 से अधिक जिलों को कवर करेंगी। इस फैसले का क्रांतिकारी परिणाम यह होगा कि आने वाले समय में यात्री ट्रेनों की लेटलतीफी की समस्या पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। मालगाड़ियों और यात्री गाड़ियों के लिए पृथक ट्रैक उपलब्ध होने से पैसेंजर ट्रेनों की औसत गति में 30 से 40 किमी/घंटा का सुधार होगा।

शक्ति पोर्टल की मदद

पूर्ववर्ती सरकारों में सबसे बड़ी विकृति यह थी कि एक विभाग सड़क बनाता था, दूसरा विभाग पानी की पाइपलाइन डालने के लिए उसे खोद देता था और तीसरा विभाग दूरसंचार केबल बिछाने के लिए दोबारा तोड़फोड़ शुरू कर देता था। इस तालमेल की कमी से जनता के टैक्स का अरबों रुपया बर्बाद होता था और परियोजनाएं दशकों लटकती थीं। प्रधानमंत्री ने अक्तूबर, 2021 में ‘पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान’ का ऐतिहासिक शुभारंभ किया। इसके तहत 16 से अधिक केंद्रीय मंत्रालयों और सभी राज्य सरकारों के डाटा को एक एकीकृत जीआईएस (GIS) मंच पर लाया गया है। सड़क, रेल, ऑप्टिकल फाइबर, गैस पाइपलाइन, बिजली के खंभे और जलमार्ग अब एक साथ योजनाबद्ध किए जाते हैं। पहले जिस रेलवे लाइन या हाईवे के संरेखण और वन विभाग की मंजूरी में 2 से 3 साल का समय लगता था, आज गति शक्ति पोर्टल के माध्यम से वह काम कुछ महीनों में पूरा हो जाता है। हाल ही में कैबिनेट द्वारा मंजूर किए गए सभी 7 रेल कॉरिडोर और मल्टी-ट्रैकिंग परियोजनाओं की पूरी मैपिंग पीएम गति शक्ति के जरिए ही की गई है, जिससे भूमि अधिग्रहण और लॉजिस्टिक्स की लागत न्यूनतम स्तर पर आ गई है।

150 हवाई अड्डे

भारत की यह ‘इंफ्रास्ट्रक्चर’ क्रांति केवल रेल और सड़क तक सीमित नहीं है, बल्कि जल, नभ और डिजिटल क्षेत्र में भी एक समान तीव्रता से विस्तारित हुई है। 2014 तक देश में मात्र 74 क्रियाशील हवाई अड्डे थे। ‘उड़ान’ योजना के माध्यम से हवाई चप्पल पहनने वाले सामान्य नागरिक के हवाई यात्रा के सपने को साकार करते हुए देश में हवाई अड्डों और हेलीपोर्ट्स की संख्या बढ़कर 150 से अधिक हो चुकी है। जहां देश में अंतर्देशीय जलमार्गों की उपेक्षा की गई थी, वहीं गंगा (राष्ट्रीय जलमार्ग-1) और ब्रह्मपुत्र में कार्गो जहाजों का नियमित संचालन शुरू हुआ और देश में 111 राष्ट्रीय जलमार्ग अधिसूचित किए गए। साथ ही, 6 लाख से अधिक गांवों तक ऑप्टिकल फाइबर बिछाने और दुनिया में सबसे तेज गति से 5G रोलआउट करने वाला देश आज भारत बन चुका है। यूपीआई ने डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में न केवल भारत की श्रेष्ठता साबित की है, बल्कि लाभार्थियों के लिए एक लीक प्रूफ तंत्र भी विकसित हुआ है, जिसे पूरी दुनिया अपना रही है।

सशक्त भारत की तस्वीर

आज जब एक सामान्य नागरिक दिल्ली से मेरठ 45 मिनट में पहुंचता है, कटरा से श्रीनगर तक ट्रेन से चिनाब के ऊंचे आर्च ब्रिज से होकर गुजरता है, अटल टनल और सेला टनल से सीमांत क्षेत्रों में सेना और नागरिक मिनटों में पहुंचते हैं, तो यह केवल आधुनिक ढांचा नहीं दिखता, यह एक स्वाभिमानी, सशक्त और आत्मनिर्भर भारत की तस्वीर प्रस्तुत करता है।

प्रधानमंत्री के इन 12 वर्ष के कार्यकाल ने यह सिद्ध कर दिया है कि जब नेतृत्व में राष्ट्र प्रथम की इच्छाशक्ति हो, भ्रष्टाचार के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ हो और क्रियान्वयन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण हो, तो सदियों से पिछड़े माने जाने वाले देश भी वैश्विक इंफ्रास्ट्रक्चर के सिरमौर बन सकते हैं। यह विकास यात्रा रुकने वाली नहीं है; यही विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर 2047 के स्वर्णिम और विकसित भारत की सबसे अटूट नींव सिद्ध हो रहा है।

Topics: रेल नेटवर्कपीएम-गति शक्तिपाञ्यजन्य विशेषप्रेम शुक्लाप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीडेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोरभारतीय रेलवेपीएम मोदी का गुजरात दौरावडोदरा में पीएम मोदी
प्रेम शुक्ल
प्रेम शुक्ल
राष्ट्रीय प्रवक्ता, भारतीय जनता [Read more]
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