इस देश में कौटिल्य हैं, अशोक हैं, चोल हैं और एक से एक वीर हैं। हमारे पास इतिहास और संस्कृति की इतनी समृद्ध परंपरा है कि कहानियों का कभी अकाल नहीं हो सकता। प्रश्न यह है कि हम उन कहानियों को जानने और समाज तक पहुंचाने के लिए कितना प्रयास करते हैं?
रामायण के एक प्रसंग में लक्ष्मण श्रीराम से धन की महत्ता की चर्चा करते हैं। महाभारत में भी युद्ध के बाद युधिष्ठिर के वैराग्य के प्रसंग में द्रौपदी और अर्जुन धन के महत्व को रेखांकित करते हैं। मेरे लिए इसका अर्थ बहुत स्पष्ट है-धन के बिना रचना कठिन है, समाज और राष्ट्र के निर्माण के लिए भी संसाधन आवश्यक हैं। यदि हिंदू समाज ने छत्रपति शिवाजी महाराज की खुले मन से मदद की होती तो उन्हें सूरत नहीं जाना पड़ता। सच्चाई यह है कि हमारा समाज अपनी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है। लेकिन अपेक्षा करते हैं कि चोल, शिवाजी या चाणक्य जैसे चरित्र फिर सामने आएं।
श्रेष्ठ शिक्षा के साथ श्रेष्ठ सिनेमा जरूरी
हम अपने बच्चों को श्रेष्ठ विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाना चाहते हैं, लेकिन कितने माता-पिता यह तय करते हैं कि वे श्रेष्ठ सिनेमा देखें, इतिहास पढ़ें और भारतीय संस्कृति को समझें? सिनेमा में समाज की भागीदारी जितनी कम होगी, उससे अपनी अपेक्षाओं के अनुरूप रचना की मांग भी उतनी ही कमजोर रहेगी। मैंने ‘चाणक्य’ बनाया, लेकिन उसे बनाने से अधिक समय उसके लिए संघर्ष करने में लगा। 1988 से 2026 तक लोगों, सत्ता, दूरदर्शन और अधिकारियों से मेरा संघर्ष चलता रहा। चिकित्सा का क्षेत्र छोड़कर मैंने इतिहास और संस्कृति के अध्ययन को चुना।
‘जन जन में राम’ की आर्थिक चुनौती
हाल में मैंने ‘जन जन में राम’ धारावाहिक बनाया। इसमें श्रीराम की अयोध्या से रामसेतु और लंका तक की यात्रा, उनके अनुभवों और भारत में प्रचलित विविध रामकथाओं के माध्यम से यह समझाने का प्रयास किया कि श्रीराम भारतीय मानस को कैसे जोड़ते हैं और मर्यादा पुरुषोत्तम क्यों हैं। लेकिन ऐसे काम की बाधा केवल रचनात्मक नहीं, आर्थिक भी है। दूरदर्शन पर धारावाहिक के लिए करोड़ों रुपये की बैंक गारंटी देनी पड़ती है। मुझसे 12 प्रकरणों के लिए 12 करोड़ रुपये की गारंटी मांगी गई। मैंने कहा-यदि मेरे पास 12 करोड़ रुपये हैं तो मैं धारावाहिक क्यों बनाऊंगा?
सिनेमा में समाज की भागीदारी कम
सच्चाई यह है कि सिनेमा और धारावाहिकों में समाज की भागीदारी बहुत कम है। इसलिए समाज को अपनी पसंद का सिनेमा न बनने की शिकायत करने से पहले उसमें अपनी भूमिका पर विचार करना चाहिए। ‘चाणक्य’ के लिए मैंने मुंबई की एशियाटिक सोसायटी, केंद्रीय पुरातत्व पुस्तकालय और खुदाबख्श पुस्तकालय जैसी जगहों पर 5 वर्ष तक शोध किया। तब लोगों का पहला प्रश्न होता था-इसे कौन देखेगा? ‘चाणक्य’ के 52 प्रकरणों पर सरकार ने करोड़ों रुपये खर्च किए, लेकिन उसका प्रचार अपेक्षित स्तर पर नहीं हुआ। तुषार उप्रेती जैसे विद्यार्थियों ने भी शोध में बहुत मेहनत की। प्रश्न यह है कि क्या हम सचमुच अध्ययन और शोध का सम्मान करते हैं?
असहमति हो, पर सत्य की खोज न रुके
‘चाणक्य’ के कुछ प्रकरणों में भगवा ध्वज दिखाई दिया तो उसे एक विचारधारा से प्रेरित बताकर रोकने की मांग हुई। मैंने राष्ट्रीय ध्वज के इतिहास पर स्वयं शोध किया। उस समय स्वर्गीय अभय मोकाशी ने मेरी सहायता की। वे मेरे विचारों से सहमत नहीं थे, लेकिन उन्होंने कहा-देश को सच मालूम होना चाहिए। मेरे लिए असहमति के बावजूद सत्य की खोज के सम्मान का यह बड़ा उदाहरण है।
‘पिंजर’ के समय भी इसी प्रकार का अनुभव हुआ। एक दृश्य में स्वयंसेवक के दिखाई देने के कारण फिल्म को हिंदूवादी सोच से प्रेरित बताया गया। मैं सोचता रहा कि मेरे पक्ष में कोई तो बोलेगा, लेकिन कोई नहीं आया। मेरी शिकायत फिल्मकारों से अधिक समाज से है। किसी रचना से असहमति हो तो उसका उत्तर दूसरी रचना से होना चाहिए। किसी की रचना को नष्ट करने के बजाय अपनी रचना खड़ी करनी चाहिए और उसके लिए श्रम, दृष्टि और धन चाहिए।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न भी इसी से जुड़ा है।‘वाटर’ के विरोध ने भी मुझे यही सिखाया। बाद में अमीरचंद जी ने माना कि फिल्म का विरोध करना उनकी बड़ी भूल थी। फिल्म श्रीलंका में बनी और लोगों ने उसे देखा। समाज को अपनी असहमति व्यक्त करने का अधिकार है, लेकिन संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान भी उतना ही जरूरी है। हर गली-मोहल्ले और हर सामाजिक माध्यम को अपना सेंसर मंडल बना देना उचित नहीं है।
इतिहास का पुनर्पाठ जरूरी
इतिहास पर फिल्म बनाने का अर्थ उसे जस का तस दोहराना नहीं है। भारत में रामकथा की अनेक परंपराएं रही हैं। भास, भवभूति और अन्य संस्कृत रचनाकारों ने मूल कथा की आत्मा ग्रहण की और अपने समय तथा समाज के अनुरूप उसकी पुनर्रचना की। फादर कामिल बुल्के के रामकथा पर शोध को पढ़कर मेरी अपनी धारणाएं बदलीं। मैंने सीखा कि किसी विद्वान को उसकी पहचान से नहीं, उसके अध्ययन से समझना चाहिए।
‘पृथ्वीराज’ बनाते समय मैंने लोकप्रिय मान्यताओं की भी पड़ताल की। ‘चार बांस चौबीस गज’ जैसी प्रसिद्ध पंक्ति का प्रमाण खोजा, लेकिन वह स्पष्ट नहीं मिला। मैं यह जानना चाहता था कि क्या वास्तव में हुआ और क्या बाद की लोकस्मृति है। मुझे पता था कि इतिहासकार पृथ्वीराज द्वारा मोहम्मद गोरी की हत्या की कथा को स्वीकार नहीं करते। फिर भी लोकप्रिय कथा पर फिल्म बनाते समय तथ्य और लोकविश्वास के बीच संतुलन जरूरी था। मैं मानता हूं कि ‘पृथ्वीराज’ मेरी अच्छी फिल्मों में नहीं है, लेकिन इतिहास के नाम पर केवल वही दोहराना उचित नहीं जिसे लोग पहले से मानते हैं। फिल्मकार को शोध करना चाहिए।
जब ‘चाणक्य’ को नए रूप में बनाने का प्रस्ताव आया तो सुझाव मिला कि चाणक्य और चंद्रगुप्त को अधिक ‘धूसर’ और षड्यंत्रकारी दिखाया जाए, क्योंकि समाज में चाणक्य की ऐसी छवि है।
मेरा प्रश्न था-क्या तीन दशक बाद बाजार और मनोरंजन की मांग पर चरित्र बदल दूं?
सिनेमा कला भी है और व्यवसाय भी सिनेमा अंततः एक व्यवसाय भी है। निर्माता करोड़ों रुपये लगाता है और उसके लिए लाभ महत्वपूर्ण है। इसलिए मैं हमेशा कहता हूं-फिल्म ऐसी बनाओ जिसमें निर्माता रोए नहीं। सफलता अपने आप में श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं है। कभी-कभी दो करोड़ की फिल्म सैकड़ों करोड़ कमा लेती है, लेकिन यह सफलता का चमत्कार है, कोई निश्चित सूत्र नहीं।
हम इतिहास को इतना पवित्र और अछूता बना देते हैं कि उससे प्रश्न पूछना ही भूल जाते हैं। हम कहते हैं कि हम विश्वगुरु थे। ठीक है, लेकिन आज दूसरा ब्रह्मगुप्त क्यों नहीं है? दूसरा आर्यभट्ट क्यों नहीं है? वात्स्यायन जैसी प्रतिभा फिर क्यों नहीं दिखाई देती?
मेरे लिए इतिहास का पुनर्पाठ केवल अतीत को गौरवान्वित करने का माध्यम नहीं है। वह वर्तमान से प्रश्न करने का अवसर भी है। हमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि हमारे पूर्वज कितने महान थे; हमें यह भी पूछना चाहिए कि आज हम वैसी प्रतिभा, वैसा ज्ञान और वैसी सृजनशीलता क्यों नहीं पैदा कर पा रहे हैं। अतीत पर गर्व तभी सार्थक है, जब वह वर्तमान को बेहतर बनाने की प्रेरणा बने।
















