कारंजा, लांजी (बालाघाट)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक स्वर्गीय बालासाहेब देवरस एवं ज्येष्ठ प्रचारक स्वर्गीय भाऊराव देवरस के पैतृक ग्राम कारंजा में स्मृति भवन एवं माधव नेत्रालय का लोकार्पण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने किया।
इस अवसर पर मानकर ट्रस्ट के अध्यक्ष अतुल शिरोडकर जी, मध्य क्षेत्र संघचालक पूर्णेंदु सक्सेना जी, विदर्भ प्रांत संघचालक दीपक तामशेट्टीवार जी तथा न्यास के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. पवन जी उपस्थित रहे। लोकार्पण कार्यक्रम में बड़ी संख्या में नागरिक, समाजबंधु एवं गणमान्यजन भी उपस्थित रहे।

भाषण से अधिक कार्य का महत्व
लोकार्पण अवसर पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि जहाँ प्रत्यक्ष रूप से सेवा और समाजहित का कार्य हो रहा हो, वहाँ भाषण से अधिक कार्य का महत्व होता है। भाषण समय के साथ भुला दिए जाते हैं, लेकिन समाज के लिए किया गया कार्य चिरंतन रहता है।
उन्होंने कहा कि पूजनीय बालासाहेब देवरस एवं स्वर्गीय भाऊराव जी का जीवन देश और समाज की सेवा के लिए समर्पित रहा। उनकी स्मृति को जीवंत बनाए रखने का सबसे सार्थक माध्यम उनके विचारों और कार्यों को आगे बढ़ाना है। स्मृति भवन एवं महापुरुषों के जीवन पर आधारित प्रदर्शनी नई पीढ़ी को उनके जीवन और विचारों से प्रेरणा देने का महत्वपूर्ण माध्यम है।

“किसी महापुरुष के प्रति सच्ची श्रद्धा केवल उनके जीवन-चरित्र को पढ़ने या उनका स्मरण करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उनके जीवन से मिलने वाले संदेश को अपने आचरण में उतारना चाहिए।” — डॉ. मोहन भागवत जी, सरसंघचालक, आरएसएस
मानव सेवा और सामूहिक सहभागिता
मुख्य बिंदु:
- उन्होंने एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि जब समाज के सामने संकट आया, तब पुस्तक प्रकाशन के लिए एकत्रित धन को पीड़ितों की सहायता में लगाया गया। इससे यह संदेश मिलता है कि मानव सेवा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
- सेवा कार्यों में सामूहिक सहभागिता के महत्व को रेखांकित करते हुए सरसंघचालक जी ने कहा, “सेवा में सबका साथ, श्रेय की नहीं कोई बात; प्रकल्प में सबका हाथ होना चाहिए।” समाजसेवा किसी एक व्यक्ति के श्रेय का विषय नहीं, बल्कि सभी के सहयोग और सहभागिता से आगे बढ़ने वाला कार्य है। किसी भी सामाजिक प्रकल्प की सफलता में प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
- वीर सावरकर की कविता का संदर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि व्यक्ति को प्राप्त ज्ञान, विद्वत्ता और प्रतिभा का उपयोग मातृभूमि एवं समाज के हित में होना चाहिए। शिक्षा और क्षमता का लाभ यदि समाज एवं राष्ट्र को नहीं मिलता, तो वह केवल व्यक्तिगत उपलब्धि बनकर रह जाती है।
- उन्होंने कहा कि राष्ट्र के उत्थान के लिए विभिन्न महापुरुषों ने अलग-अलग क्षेत्रों में कार्य किया। किसी ने स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया, किसी ने सामाजिक सुधार का कार्य किया, तो किसी ने राजनीतिक जागरण, धर्म एवं संस्कृति के क्षेत्र में योगदान दिया। इन सभी प्रयासों का अंतिम उद्देश्य राष्ट्र का उत्थान ही रहा।
उन्होंने भारतीय जीवन-दृष्टि में सेवा, त्याग एवं करुणा की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि दूसरों के दुःख को देखकर स्वयं व्यथित होना और उसे दूर करने का प्रयास करना भारतीय संस्कृति की विशेषता है।

सरसंघचालक जी ने आह्वान किया कि महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेकर समाज और राष्ट्र के लिए कार्य करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है। राष्ट्रहित, मानव सेवा, त्याग, समर्पण और सामूहिक सहभागिता की भावना को जीवन में उतारना आज की आवश्यकता है।

स्मृति भवन एवं माधव नेत्रालय का लोकार्पण सेवा, संस्कार, सामूहिक सहभागिता एवं समाजहित की भावना को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।















