1950 में चुनाव आयोग के गठन के बाद से शायद ही कोई ऐसा दौर होगा, जब उसकी भूमिका, संरचना या फैसलों पर सवाल न उठे हों। बीते 4-5 मतदाता पहचान-पत्र से ईवीएम और चुनाव प्रक्रिया तक, चुनाव आयोग लगातार विवादों के केंद्र में रहा है। इन्हीं सवालों को लेकर न्यायालयों में बार-बार याचिकाएं पहुंचती रही हैं। ऐसे विवाद संस्थाओं की विश्वसनीयता पर संदेह की परत चढ़ाते हैं और राजनीति में संदेह पैदा करना एक प्रभावी हथियार बन चुका है।
इस बार चुनाव आयोग से जुड़ी एक नई बहस ने इसी इतिहास को फिर सामने ला दिया। 23 सितंबर को एक अंग्रेजी अखबार में रिपोर्ट छपी। संयोग से उसी दिन सर्वोच्च न्यायालय को 2023 के मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम की संवैधानिक वैधता पर फैसला सुनाना था। दो सदस्यीय पीठ में मतभेद के बाद मामला संविधान पीठ के गठन के लिए मुख्य न्यायाधीश के पास भेज दिया गया।
2023 के अधिनियम को चुनौती का मुख्य आधार यह है कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाली समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को बाहर कर दिया गया है। सवाल है कि क्या यह अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023) में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की भावना के विपरीत है? जिस धारा 7 को चुनौती दी गई है, जिसके तहत समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री हैं।
रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद एक और याचिका दायर हुई है। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर आरोप लगाया गया है कि वे चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की मंजूरी के बिना आयोग के नाम पर फैसले कर रहे हैं। याचिका में क्वो वारंटो रिट की मांग की गई है। अदालत अगले सप्ताह इस पर सुनवाई करेगी। अखबार की रिपोर्ट और मुख्य चुनाव आयुक्त का पक्ष भी न्यायिक जांच का हिस्सा होगा। अदालत में प्रक्रिया आगे बढ़ रही है, लेकिन बाहर माहौल अलग है। सड़कों पर ‘फांसी दो’, ‘खंभे से लटका दो’ जैसे उग्र नारे लोकतांत्रिक विमर्श को और गंभीर बना रहे हैं।
आयोग का जवाब
रिपोर्ट में दावा किया गया कि आयोग के कुछ फैसले सर्वसम्मति से नहीं हुए। दोनों आयुक्तों ने 10 माह में कम-से-कम 14 बार आपत्तियां दर्ज कीं। यह भी कहा गया कि उन्होंने कैबिनेट सचिव को आयोग के आंतरिक कामकाज से जुड़े पत्र भी लिखे। चुनाव आयोग ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि सभी फैसले बहुमत से हुए और कैबिनेट सचिव को भेजे पत्र प्रतिनियुक्ति पर तैनात एक अधिकारी से जुड़े थे। उनका नीति या सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के मामलों से कोई संबंध नहीं था। आयोग के अनुसार, पिछले वर्ष करीब 40 नई पहल और चुनाव सुधार पूरे आयोग की सहमति से हुए, जिनमें मतदाता सूचियों का गहन पुनरीक्षण भी शामिल है। इस तरह एसआईआर से शुरू विवाद आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली तक पहुंच गया है। रिपोर्ट, आयोग का जवाब और राजनीतिक आरोप सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा हैं। अंतिम सत्य न्यायिक जांच से ही सामने आएगा।
‘वोट चोरी’ का सियासी नारा
पिछले डेढ़-दो वर्ष से कांग्रेस और उसके सहयोगी एसआईआर को ‘वोट चोरी’ बताते हुए इसे राजनीतिक मुद्दा बनाए हुए हैं। 8 जून को इंडि गठबंधन ने पांच-सूत्री प्रस्ताव पारित कर मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखने की बात कही थी। यह वितंडा तब है, जब शीर्ष अदालत चुनाव आयोग को क्लीन चिट दे चुका है। फिर भी 30 सितंबर की गठबंधन बैठक में भी इस आरोप को और जोर से दोहराया गया।
हाल में लालकृष्ण आडवाणी, जगदीप धनखड़, एस. जयशंकर, रेखा गुप्ता और अरविंद केजरीवाल समेत कई प्रमुख लोगों को मतदाता प्रपत्रों में विसंगतियां मिलने पर नोटिस दिए गए। सवाल उठाया गया कि क्या इन्हें मतदाता सूची से बाहर करने की कोई ‘साजिश’ है?
हालांकि 20-25 साल पहले के मुकाबले आज की मतदाता सूचियां अधिक तकनीकी और सघन जांच से बन रही हैं। आधार में नाम, वर्तनी या रिश्तेदारों की जन्मतिथि जैसी विसंगतियां कंप्यूटर स्वतः चिन्हित कर सकता है।
एडीआर जैसे संगठनों का मानना है कि मौजूदा प्रक्रिया 2003 की प्रक्रिया से अलग है। साथ ही, आशंका जताई जा रही है कि इस बार की मतदाता सूची नागरिकता से भी जुड़ सकती है। सर्वोच्च न्यायालय भी कह चुका है कि चुनाव के लिए मतदाता सूची सटीक और विश्वसनीय होनी चाहिए। राजनीतिक दल भी इससे इनकार नहीं करते कि प्रवासन, शहरीकरण, अवैध सीमा-पार आवागमन, मृत्यु की सूचना न मिलना और दोहरी प्रविष्टियों जैसी वजहों से मतदाता सूची की समय-समय पर समीक्षा जरूरी है। समस्या यह है कि विवाद प्रक्रिया की जरूरत पर कम और उसके पीछे ‘साजिश’ होने के आरोप पर अधिक है।
राजनीति का चश्मा!
23 सितंबर की रिपोर्ट के बाद अखबार ने संपादकीय टिप्पणी में लिखा कि एसआईआर कराना चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है। कई राज्यों की प्रारूप मतदाता सूचियों से करीब 13 करोड़ नाम हटे हैं। इन्हें चुनाव परिणामों से जोड़ना एक राजनीतिक तर्क हो सकता है, लेकिन अखबार के अनुसार इसकी बुनियाद तथ्यों से अधिक राजनीति पर है। जिस संस्था की स्वतंत्रता पर आज कांग्रेस सवाल उठा रही है, उसी चुनाव आयोग की संरचना आघात करने का उसका पुराना इतिहास रहा है। कांग्रेस ने ही नापसंद अधिकारियों की आलोचना और पसंदीदा अधिकारियों इनाम देने की परंपरा शुरू की। दो पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन और एम.एस. गिल बाद में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े। गिल तो केंद्र सरकार में मंत्री भी रहे।
बोझ का तर्क, टकराव की पृष्ठभूमि
आजादी के बाद 1950 में गठन से लेकर 15 अक्तूबर, 1989 तक चुनाव आयोग एक-सदस्यीय संस्था रहा। तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त आर.वी.एस. पेरी शास्त्री से मतभेद के बाद 16 अक्तूबर, 1989 को राजीव गांधी सरकार ने आयोग को तीन सदस्यीय बना दिया। दो नए आयुक्त थे-एस.एस. धनोआ तथा वी.एस. सीगल। दिलचस्प बात यह है कि सीईसी शास्त्री को सरकार के फैसले की जानकारी ही नहीं थी। उसी वर्ष मतदाताओं की न्यूनतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दिया गया। इसके कारण बड़ी संख्या में नए मतदाता बढ़ गए। तक दिया गया कि आयोग पर काम का बोझ बढ़ रहा है, इसलिए दो अतिरिक्त आयुक्तों की नियुक्ति करनी पड़ी।
सचाई यह है कि सीईसी शास्त्री के साथ राजीव गांधी की तनातनी पुरानी थी। राजीव गांधी के तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के साथ संबंध तनावपूर्ण थे। इसलिए वे चाहते थे कि राष्ट्रपति चुनाव के लिए नामांकन का कार्यक्रम इस तरह तय हो कि जैल सिंह दूसरे कार्यकाल के लिए चुनाव न लड़ सकें। सरकार हरियाणा विधानसभा में भी विलंब चाहती थी, लेकिन शास्त्री ने सहयोग नहीं किया। 1988 के फरीदाबाद लोकसभा उपचुनाव और असम की मतदाता सूची को लेकर मतभेदों ने सरकार और आयोग के बीच अविश्वास और बढ़ा दिया। इसलिए लोकसभा चुनाव निकट आने पर कांग्रेस सरकार ने यह फार्मूला निकाला, जो ज्यादा दिन नहीं चली।
वीपी सिंह ने राजीव का फैसला पलटा
सत्ता में आने के तुरंत बाद वीपी सिंह की नेशनल फ्रंट सरकार ने वीपी सिंह सरकार ने 1 जनवरी, 1990 को पिछली अधिसूचना रद्द करके आयोग को फिर एक सदस्यीय बना दिया। धनोआ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, पर अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी। साथ ही, यह टिप्पणी भी की कि महत्वपूर्ण संवैधानिक कार्यों को करने वाले निकाय में एक से अधिक सदस्य बेहतर होते हैं। केंद्र सरकार ने 1991 में मुख्य चुनाव आयुक्त एवं चुनाव आयुक्त (सेवा शर्तें) अधिनियम लागू किया। इसमें सीईसी को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश और चुनाव आयुक्तों को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान दर्जा दिया गया। साथ ही, उनकी सेवानिवृत्ति की आयु भी क्रमश: 65 व 62 तय की कई। इससे संकेत मिला कि यदि आयोग फिर बहु-सदस्यीय बना तो मुख्य आयुक्त अध्यक्ष होंगे और चुनाव आयुक्त उनके अधीन रहेंगे। अगले दो वर्ष तक आयोग एक सदस्यीय रहा।
राव सरकार का आयोग से टकराव
1990 में पेरी शास्त्री की मृत्यु के बाद वीएस रमादेवी को अस्थायी प्रभार दिया गया। चंद्रशेखर की कार्यवाहक सरकार के दौरान 12 दिसंबर 1990 को टीएन शेषन सीईसी बने। इस तरह, 2 जनवरी 1990 से 30 सितंबर 1993 तक आयोग एक-सदस्यीय निकाय रहा।
इसके बाद नरसिंह राव के नेतृत्व वाली सरकार बनी। शेषन की कार्यशैली से नाराज सरकार ने 1 अक्तूबर 1993 से आयोग फिर तीन-सदस्यीय बना दिया। एम.एस. गिल और जी.वी. जी. कृष्णमूर्ति को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया। साथ ही, अध्यादेश के जरिए 1991 के कानून में संशोधन कर सीईसी और दोनों चुनाव आयुक्तों को समान दर्जा और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समकक्ष सेवा-शर्तें दी गईं। इसे शेषन ने नियुक्तियों को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। 1995 के फैसले में अदालत ने बहुसदस्यीय आयोग को वैध ठहराते हुए स्पष्ट किया कि तीनों सदस्य समान हैं और आयोग के निर्णय बहुमत से लिए जा सकते हैं। इसके बाद तीन-सदस्यीय व्यवस्था स्थायी हो गई।
नवीन चावला प्रकरण
नवीन चावला का प्रकरण भी चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उठे सवालों का चर्चित अध्याय है। जनवरी 2009 में मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील को पत्र लिखकर चावला को चुनाव आयुक्त पद से हटाने की सिफारिश की। उन्होंने चावला पर राजनीतिक निष्पक्षता के अभाव, कांग्रेस के प्रति पक्षपात और गोपनीय सूचनाएं साझा करने के आरोप लगाए थे। लेकिन यूपीए सरकार ने गोपालस्वामी की सिफारिश खारिज कर दी। कांग्रेस ने चावला का बचाव किया और आरोपों को नकारा। फिर अप्रैल 2009 में चावला को मुख्य चुनाव आयुक्त बना दिया। इससे पहले 2006 में भाजपा और सहयोगी दलों के 200 से अधिक सांसदों ने राष्ट्रपति से चावला को हटाने की मांग की थी। आरोप था कि उनके परिवार से जुड़े स्वयंसेवी संगठन को कुछ कांग्रेस सांसदों की सांसद निधि से धन मिला था, जिससे उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं। कांग्रेस ने इन आरोपों को भी खारिज किया।
सांसदों की शिकायत पर तत्कालीन राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने सरकार से राय मांगी। मामला अटॉर्नी जनरल मिलन बनर्जी को भेजा गया, जिन्होंने नवीन चावला को क्लीन चिट दी। इसके बाद भाजपा नेता जसवंत सिंह सर्वोच्च न्यायालय पहुंचे। अदालत की सलाह पर 2008 में अरुण जेटली के नेतृत्व में विपक्ष के 180 सांसदों ने मुख्य चुनाव आयुक्त को ज्ञापन सौंपा। चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर आज कांग्रेस सवाल उठा रही है, लेकिन इतिहास उसके अपने शासनकाल के सवालों से भी भरा है। राजीव गांधी सरकार द्वारा आयोग को अचानक बहुसदस्यीय बनाना, नरसिंह राव सरकार का टी.एन. शेषन से टकराव और नवीन चावला प्रकरण-ये अध्याय बताते हैं कि सत्ता में रहते हुए कांग्रेस का आयोग से रिश्ता हमेशा सहज नहीं रहा।
इसलिए आज एसआईआर और मतदाता सूची को लेकर उठाए जा रहे सवालों के साथ यह भी पूछा जाना चाहिए कि संस्थागत स्वतंत्रता का पैमाना सत्ता बदलते ही क्यों बदल जाता है? चुनाव आयोग की विश्वसनीयता किसी दल की राजनीतिक सुविधा से नहीं, समान नियम, पारदर्शी प्रक्रिया और सत्ता से संस्थागत दूरी से तय होती है। कांग्रेस को भी अपने अतीत के इन अध्यायों का सामना किए
बिना आज की बहस को केवल राजनीतिक आरोपों तक सीमित नहीं करना चाहिए।

















