यह श्लोकआधुनिक संस्कृत सुभाषितों और संगठनशास्त्र से संबंधित सूक्तियों में से है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रशिक्षण तथा बौद्धिक कार्यक्रमों में संगठन-कौशल सिखाने के लिए इस श्लोक का प्रयोग किया जाता है।
श्लोक :
सर्वमेव मनोमूलं कार्यं संघटनात्मकम्।
वैमनस्यं न तत् संघे लेशतोऽप्यवशेषयेत्।।
भावार्थ :
संगठन का सम्पूर्ण कार्य मनोमूल (मन को तल्लीन करके करने योग्य) है। संघ कार्य में वैमनस्यता (मन का द्वेष) थोड़ी सी भी न रहे।
आज के समय में प्रासंगिकता :
मानसिक एकता ही वास्तविक शक्ति है: आधुनिक युग में कॉर्पोरेट टीम, सामाजिक संस्था या राजनीतिक दल—सबकी सफलता सदस्यों की मानसिक एकरूपता और संरेखण (Alignment) पर निर्भर करती है।
सहानुभूति और संवाद: आपसी मनमुटाव या ‘ईगो’ (Ego) से बड़े-बड़े संगठन बिखर जाते हैं। यह श्लोक सिखाता है कि मतभेद उभरते ही उन्हें बातचीत से तुरंत समाप्त कर देना चाहिए।
स्वस्थ कार्य संस्कृति : किसी भी टीम में सकारात्मक माहौल तभी बनता है जब सहकर्मियों के बीच ईर्ष्या और वैमनस्य न हो।

















