यह श्लोक श्रीमद्भागवत पुराण का है। (इसी प्रकार के नीति-श्लोक हितोपदेश तथा अन्य प्राचीन नीति-ग्रंथों में भी निरंतर प्रयास और उद्यम के महत्त्व को दर्शाने के लिए उद्धृत किए जाते हैं।)
श्लोक :
आरभेतैव कर्माणि श्रान्तः श्रान्तः पुनः पुनः।
कर्माण्यारभमाणं हि पुरुषं श्रीर्निषवते।।
भावार्थ :
पुनः पुनः श्रान्त होने पर भी काम करता ही जाये। काम में लगे रहने पर पुरुष को विजय-श्री मिलती ही है।
आज की प्रासंगिकता :
निरंतरता और धैर्य : आज के तीव्र और प्रतिस्पर्धी युग में पहली बार में सफलता मिलना कठिन होता है। बार-बार थकने या असफलता मिलने के बावजूद पुनः प्रयास करने का जज़्बा ही व्यक्ति को उसके लक्ष्य तक पहुंचाता है।
असफलता का डर दूर करना : यह श्लोक सिखाता है कि थकावट या रुकावटें जीवन का एक सामान्य हिस्सा हैं। थकान के कारण हार मानकर रुक जाना समाधान नहीं है; विश्राम के बाद पुनः कार्य में जुट जाना ही प्रगति का मार्ग है।
प्रयास केंद्रित दृष्टिकोण : सफलता (लक्ष्मी/विजय) उन्हीं का वरण करती है जो परिणाम की केवल इच्छा करने के बजाय लगातार कर्म में संलग्न रहते हैं। इसे ‘Grit’ या मानसिक दृढ़ता कहा जाता है।
उद्यमशीलता : किसी नए स्टार्टअप, शोध, खेल या करियर में सफलता रातों-रात नहीं मिलती। बार-बार की असफलताओं के बाद भी प्रयास जारी रखना ही अंततः सिद्धि दिलाता है।

















