ओडिशा की उड़ान 2.0 : ‘पूरा जीवन कम है भारत को समझने के लिए’
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होम भारत ओडिशा

ओडिशा की उड़ान 2.0 : ‘पूरा जीवन कम है भारत को समझने के लिए’

पाञ्चजन्य के ‘सुशासन संवाद : ओडिशा की उड़ान 2.0’ में  पाञ्चजन्य की सलाहकार संपादक तृप्ति श्रीवास्तव ने महिला यायावर कायनात काजी और लेखक राहुल नील से उनकी यात्राओं और चुनौतियों को लेकर चर्चा की।

Written byतृप्ति श्रीवास्तवतृप्ति श्रीवास्तव
Sep 12, 2026, 10:11 am IST
inओडिशा, साक्षात्कार, पाञ्चजन्य इवेंट
यायावर कायनात काजी और लेखक राहुल नील से चर्चा करते हुए तृप्ति श्रीवास्तव

यायावर कायनात काजी और लेखक राहुल नील से चर्चा करते हुए तृप्ति श्रीवास्तव

पाञ्चजन्य के ‘सुशासन संवाद : ओडिशा की उड़ान 2.0’ में  पाञ्चजन्य की सलाहकार संपादक तृप्ति श्रीवास्तव ने महिला यायावर कायनात काजी और लेखक राहुल नील से उनकी यात्राओं और चुनौतियों को लेकर चर्चा की। प्रस्तुत हैं  मुख्यांश

भारत जैसे देश में महिला एकल यात्री बनना कितना चुनौतीपूर्ण है?
कायनात-जब मैं छोटी थी तो सामाजिक विज्ञान की पुस्तकों में लोगों की तस्वीर देखती थी, तो लगता था कि ये कितने अद्भत लोग होंगे, जो अपने देश से निकलकर अनजान देशों की यात्रा करते हैं और उसके बारे में लिखते हैं। मुझे भी इसका शौक लगा और वहीं से इस यात्रा की शुरुआत हो गई। जब आप अपने देश को किताबों से इतर देखने के लिए निकलते हैं तो आपको अहसास होता है कि ये कितना अद्भुत देश है और पूरा जीवन कम है भारत को देखने के लिए। इन्हीं यात्राओं ने मुझे सशक्त बनाया।

 आप भारत में कहां-कहां की यात्रा कर चुकी हैं?
कायनात-मैं लगभग पूरे भारत का भ्रमण कर चुकी हूं। लद्दाख से लेकर कन्याकुमारी तक और गुजरात से अरुणाचल तक। मेरी ये यात्राएं केवल शहरों तक सीमित नहीं रही वरन् ये आत्मा को आत्मा से जोड़ने की रही है, जो कि गांवों में मिलती है। पहले किताबों के माध्यम से सब कुछ देखा था। फिर यात्राएं शुरू कीं तो अनुभव हुआ कि कल्पनाएं हकीकत से अधिक खूबसूरत नहीं होतीं।

भारत को जब घूम कर देखते हैं और उसे लिखते हैं तो दोनों में  क्या अंतर होता है?
राहुल नील-2021 में हमने पूर्वोत्तर भारत की यात्रा की। जहां नागालैंड और मणिपुर की सीमा पर स्थित जुहॉय वैली की ट्रैकिंग की। मैं आज उस यात्रा वृत्तांत को लिखने की हिम्मत नहीं जुटा पाया क्योंकि, मुझे ऐसा लगता है कि मैं कितना भी लिखूं, वो उस यात्रा के साथ न्याय नहीं होगा। इस देश में असंख्य स्थान हैं, जो बहुत सुंदर हैं कि उनका वर्णन संभव ही नहीं है।
जब यात्राएं शुरू की थीं तो इसके बारे में लिखना है, यह सोचा नहीं था। केवल यात्रा करने के लिए यात्राएं की थीं। जिस पल में आप यात्राएं कर रहे होते हैं, उसे अनुभव करना बहुत जरूरी है। उसे कैमरे में उतारने की कोशिश कम करता हूं। अपनी आंखों को संग्रहालय  बनाना सीखिए आपकी यात्राएं सफल होंगी। मैं एक बार कश्मीर में यात्रा करने के दौरान ट्रक ड्राइवर से जम्मू जाने के लिए लिफ्ट मांगी और मुझे लिफ्ट मिली। उस घटना के तीन साल बाद उसने मुझे अपनी बहन की शादी का कार्ड भेजा। यह भारत है!

जो वायरल कंटेंट और ट्रैवल ब्लॉग की वास्तविकता होती है, उसमें आप क्या अंतर देखते हैं?
राहुल नील- जिन लम्हों में आप यात्राएं कर रहे हैं उनको जीना बहुत जरूरी है, उन्हें कैमरे में उतारने के बजाय। उन दृश्यों को आंखों में उतारना बहुत जरूरी है।

युवाओं में ट्रेवल ब्लॉग और उनकी सामग्री कैसे समृद्ध बन सकती है ?
कायनात-यह पीढ़ी तकनीक के मामले में बहुत आगे है। उनके साथ एक ही कमी खलती है। मुझे महसूस होता है कि उनके पास गति है मगर उनके पास ठहराव कम है। सामग्री की कमी है।
वे हर पंक्ति के बाद अटक जाते हैं, क्योंकि उनके शब्दकोश में शब्द नहीं है। दिमाग में भाव है मगर शब्द नहीं है। शब्द इसलिए नहीं है क्योंकि उन्होंने शब्द पढ़े नहीं हैं। आपके भीतर कोई शब्दों को निकालने वाली मशीन नहीं है। आप 10,000 अच्छे शब्द पढ़ेंगे तब कहीं 1000 शब्द आपके मस्तिष्क में रह पाएंगे।
हमेशा से कहा जाता है कि अच्छा साहित्य पढ़ें। अच्छे साहित्य की अपनी भूमिका है। अच्छा पढ़ना और अच्छे पढ़ने से दोगुना अच्छा है अच्छा सुनना। आप जब यात्राएं कर रहे हैं। आप यात्रा अपने लिए कर रहे हैं न कि इंस्टाग्राम या फेसबुक के लिए।

Topics: यायावर कायनात काजीपठन और श्रवणमहिला एकल यात्रीभारत भ्रमणयात्रा वृत्तांतआत्मा से आत्मा का जुड़ाववायरल कंटेंटट्रैवल ब्लॉगमहिला सशक्तिकरणतकनीक और ठहरावपाञ्चजन्य विशेषपठन संस्कृति। पूर्वोत्तर भारतलद्दाख से कन्याकुमारीराहुल नीलगुजरात से अरुणाचल। अच्छा साहित्य
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