यह अत्यंत प्रसिद्ध श्लोक मूल रूप से महोपनिषद् से लिया गया है। इसके अतिरिक्त, यह श्लोक पंचतंत्र (अपरिक्षितकारकम्) और हितोपदेश जैसे प्रसिद्ध नीति-ग्रंथों में भी सन्निहित है।
श्लोक :
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।
भावार्थ :
‘यह मेरा है’ और ‘वह तेरा है’, इस प्रकार का व्यवहार तो छोटे मन के व्यक्ति करते हैं। उदार चरित्र वाले तो सारी पृथ्वी को अपना परिवार मानते हैं।
आज के युग की प्रासंगिकता :
वैश्विक बंधुत्व और कूटनीति : आज की वैश्वीकृत दुनिया में कोई भी देश अकेले प्रगति नहीं कर सकता। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का विचार भारत की विदेश नीति का मूल स्तंभ रहा है। यह सिद्धांत संकीर्ण राष्ट्रवाद से ऊपर उठकर वैश्विक शांति, सहयोग और सह-अस्तित्व का संदेश देता है।
जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण : पर्यावरण की समस्या किसी एक देश की सीमा तक सीमित नहीं है। ग्लोबल वॉर्मिंग और प्रदूषण जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए पूरी दुनिया को एक परिवार की तरह मिलकर ‘सामूहिक प्रयास’ करने होंगे।
सामाजिक समरसता और समावेशिता : जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के नाम पर बढ़ता विभाजन समाज को कमजोर करता है। यह श्लोक संकीर्ण मानसिकता को छोड़कर सभी के प्रति उदारता, सहानुभूति और समावेशी दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देता है।
मानवीय संकट में सहायता : चाहे कोई महामारी हो, युद्ध हो या प्राकृतिक आपदा-विश्व के किसी भी कोने में पीड़ितों की मदद के लिए हाथ बढ़ाना इसी उदार चरित्र का प्रमाण है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का भाव हमें निस्वार्थ सेवा और मानव-कल्याण की ओर अग्रसर करता है।

















