यह श्लोक राष्ट्रभक्ति, नागरिक कर्तव्य और राष्ट्रद्रोही प्रवृत्तियों के दुष्परिणामों को रेखांकित करने वाला एक अत्यंत प्रभावशाली नैतिक संदेश देता है।
श्लोक-
दुह्यन्ति ये स्वराष्ट्राय कामयन्ते च मङ्गलम्।
पोतच्छिदो विनश्यन्ति यथा सिन्धुं तितीर्षवः॥
श्लोक का भावार्थ:
अपने राष्ट्र के साथ तो द्रोह करते हैं, पर चाहते हैं हमारा मङ्गल हो, वे पुरुष समुद्र के पार जाने की इच्छा रख कर पोत (समुद्री जहाज) को तोड़ डालने वाले के समान नष्ट हो जाते हैं।
“जो लोग अपने देश के संवर्धन और कल्याण की कामना करते हुए उससे सकारात्मक योगदान प्राप्त करते हैं (या राष्ट्र का पोषण करते हैं), वे ही सच्चे नागरिक हैं। इसके विपरीत, जिस प्रकार समुद्र (सिंधु) पार करने की इच्छा रखने वाले लोग यदि खुद ही अपनी नाव में छेद कर लें (पोतच्छिद) तो वे डूबकर नष्ट हो जाते हैं, ठीक उसी प्रकार अपने राष्ट्र को नुकसान पहुँचाने वाले लोग भी अंततः स्वयं ही विनष्ट हो जाते हैं।”
वर्तमान समय में इस श्लोक की प्रासंगिकता-
राष्ट्र की संपत्ति और सुरक्षा की रक्षा: नाव का उदाहरण आज के राष्ट्रीय बुनियादी ढांचे (Infrastructure), अर्थव्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा पर सटीक बैठता है। कोई व्यक्ति जिस राष्ट्र में रहकर स्वतंत्रता, सुरक्षा और आजीविका प्राप्त कर रहा है, यदि वह सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाता है या राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल होता है, तो वह उसी नाव को डुबा रहा है जिस पर वह स्वयं सवार है।
नागरिक कर्तव्य और अधिकार का संतुलन: “दुह्यन्ति ये स्वराष्ट्राय” का तात्पर्य है राष्ट्र से अपने हिस्से का अधिकार या लाभ पाना। लेकिन यह अधिकार तभी तक सुरक्षित है जब तक नागरिक “कामयन्ते च मङ्गलम्” (राष्ट्र के मंगल और विकास की कामना) के सिद्धांत पर चलते हैं। अधिकार और कर्तव्य एक दूसरे के पूरक हैं।
आंतरिक कलह और असहिष्णुता से बचाव: आज के दौर में साइबर वारफेयर और समाज में विभाजन पैदा करने वाली ताकतों के संदर्भ में यह श्लोक आगाह करता है कि देश के भीतर रहकर राष्ट्र के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने वालेअंततः पूरे समाज और स्वयं के विनाश का कारण बनते हैं।
पारिस्थितिकी और सतत विकास- इस श्लोक को पर्यावरण के दृष्टिकोण से भी देखा जा सकता है। जिस धरती और पर्यावरण से हम अपने संसाधन प्राप्त करते हैं, यदि हम उसी का दोहन और विनाश (नाव में छेद) करेंगे, तो पूरी मानव सभ्यता संकट में पड़ जाएगी।
निष्कर्ष: यह श्लोक हमें सिखाता है कि “राष्ट्र हित ही सर्वोपरि हित है।” जिस देश की व्यवस्था, सीमाओं और संसाधनों पर हमारा जीवन निर्भर है, उसकी रक्षा और समृद्धि में योगदान देना ही प्रत्येक नागरिक का परम धर्म है। राष्ट्र को क्षति पहुँचाकर कोई भी नागरिक स्वयं सुरक्षित नहीं रह सकता।

















