‘पाञ्चजन्य सुशासन संवाद राजस्थान’ कार्यक्रम की भूमिका रखते हुए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री मुकुल कानितकर विभिन्न मुद्दों पर अपने विचार रखे। उन्होंने भारत को लेकर कहा कि ये भारत का दुर्भाग्य है कि आज हम जिस भारत को देखते हैं, वो हमारे अखंड भारत का मात्र एक तिहाई है। 1946-47 में जब भारत का विभाजन हुआ, तो वह भारत का पहला विभाजन नहीं, बल्कि अंतिम विभाजन था।
इसके साथ ही उन्होंने विभाजन की विभीषिका को लेकर कहा कि यह 14 अगस्त केवल विभाजन की विभीषिका का स्मरण करना और उसे इतिहास के तौर पर याद रखना ही आवश्यक नहीं है, बल्कि यह वर्तमान और भविष्य के लिए भी उतना ही आवश्यक है। यह इतिहास की ऐसी दुखद घटना थी, जिसमें लाखों लोग मारे गए, महिलाओं के साथ अत्याचार हुए। जो लोग बचकर भारत आ भी गए, उन लाखों हिन्दुओं के परिवार बिछड़ गए। इसलिए 1 से 15 अगस्त तक एक इस पूरे पक्ष में हम इस विभाजन की विभीषिका का स्मरण करें। हमारे देश में आझ हमें हिन्दू मुस्लिमों के दंगे के बारे में बताया जाता है, लेकिन सत्य ये है कि बड़ी ही बेरहमी से दो राष्ट्र सिद्धांत की थ्योरी को गढ़ा गया।
हिन्दू-मुस्लिम दंगा कोरा असत्य
कानितकर जी कहते हैं कि जिस प्रकार से हमें ये बताया जाता है कि इन दंगों में दोनों ही तरफ बड़ी जनहानि हुई यह बड़ा ही असत्य है। जिस प्रकार से वर्तमान पाकिस्तान, पूर्व पंजाब औऱ पूर्व के बंगाल में हिन्दुओं, बौद्धों, जैनियों और सिखों की हत्याएं हुई हैं, उसका सारे विश्व में कोई सानी ही नहीं है। इसकी तुलना दुनिया के किसी भी नरसंहार से नहीं की जा सकती है। यह एकतरफा मजहब के आधार पर निर्दयता से की गई हत्या थी। ट्रेनें लाशों से भरकर भारत भेजी गई थीं। जब ट्रेनें रेलवे स्टेशन पर आकर लगीं तो उसमें सारे के सारे इंसान मृत पाए गए। विभाजन का दंश ये था कि अनेक लोग जैसे तैसे अपनी जीवनभर की जमा संपत्ति को छोड़कर अपने अपनों को बचाते हुए किसी भी तरह से भारत में आए थे।
वरिष्ठ प्रचारक बताते हैं कि वो राजस्थान में ही कई ऐसे लोगों को जानते हैं, जिनके रिश्तेदार आज भी पाकिस्तान में रहने को मजबूर हैं। क्योंकि वे समय पर वहां से निकल नहीं पाए। विभाजन का घाव अभी भरा नहीं है, आज भी उसमें से रक्त स्त्रावित हो रहा है। जो वहां रह गए हैं, वे उस दर्द को आज भी भुगतने को मजबूर हैं।
बंगाल विभाजन में ही दिख गई थी इसकी जड़
कानितकर जी कहते हैं कि विभाजन की ये विभीषिका अचानक ही 1946-47 में सामने नहीं आई थी। इसके मूल 1905 के बंगाल विभाजन में ही दिख गए थे। लियाकत अली, मोहम्मद अली, सर सैय्य़द खान जैसे तथाकथित विद्वानों के द्वारा द्विराष्ट्र सिद्धांत का प्रतिपादन 19वीं शताब्दी के अंत में ही कर दिया गया था। अंग्रेजों द्वारा जो जनगणना की गई थी, उसी इस विभेद की शुरुआत हुई थी।
तभी इस्लाम को मानने वाले मुसलमान, हिन्दुओं के साथ नहीं रह सकते, इस टूल का इस्तेमाल करके दो राष्ट्र सिद्धांत को इन मुस्लिम नेताओं ने दिया था। इसमें खाद-पानी डाला था, लेकिन इसके लिए जो हिन्दू महासभा, सावरकर और हिन्दुओं को दोष दिया जाता है, वो पूर्णत: गलत है। हमने दो राष्ट्र सिद्धांत को स्वीकार तक नहीं किया। यहां तक कि अनेक वर्षों तक तो कांग्रेस ने भी इसे नहीं स्वीकारा था। उस दौरान कांग्रेस ही हिन्दुओं की ओर से अंग्रेजों के साथ बातचीत कर रहे थे। बड़ी संख्या में जनहानि होने का एक कारण यह भी था। यहां तक कि पूर्वी पंजाब, कश्मीर में रहने वाले अनके हिन्दुओं को ये विश्वास ही नहीं हुआ था कि विभाजन हो गया है।
सारे कांग्रेसी ये यह कह रहे थे कि विभाजन हमारी लाशों पर होगा। ऐसे में जो हिन्दू अपनी संपत्तियों को सालभर या 11 माह पहले ही बेचकर स्थानांतरित हो सकते थे, अचानक किए गए विभाजन के शिकार हो गए। लोगों को पहले विश्वास था कि भारत के टुकड़े नहीं हो सकते, लेकिन फिर अचानक से ये कर दिया गया।
विभाजन के समय लाहौर में 80 फीसदी थे हिन्दू
कानितकर जी बताते हैं कि विभाजन से पहले तक लाहौर पूर्ण हिन्दू बहुल स्थान था। वहां करीब 80 फीसदी हिन्दू जनसंख्या थी। जिस वक्त मौलाना आजाद ने कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में विभाजन को स्वीकार कर लिया और उस पर हस्ताक्षर किया। इसको लेकर अमृतसर की राजकुमारी प्रीतम कौर ने अपनी आत्मकथा में लिखा था, “महात्मा गांधी को अंधेरे में रखकर मौलाना आजाद ने विभाजन को मान्यता दी थी। बाद में पता चलने पर गांधी मौलाना आजाद पर बहुत क्रोधित हुए थे।” विभाजन का एक कारण झूठा भरोसा था।
भारत विभाजन का विरोध कांग्रेस ने क्यों नहीं किया
कानितकर जी बताते हैं कि 1905 में बंगाल का विभाजन अंग्रेजों ने करवाया था, उसका जोरदार विरोध हुआ और उसे 1911 में वापस ले लिया गया। तो 1946-47 में भारत विभाजन के बाद कांग्रेस ने इसका विरोध क्यों नहीं किया? नेहरू कहते थे कि हम बहुत थके हुए थे। अरे उस समय जय प्रकाश नारायण, आचार्य कृपलानी जैसे युवा कार्यकर्ता थे, जिनके हाथ में आप नेतृत्व दे सकते थे। सत्य यह है कि कांग्रेस ने सत्ता के लालच में विभाजन को स्वीकार किया था। शेषाद्री जी ने कई अभिलेखों के आधार पर इस बात का खुलासा किया था कि जिन्ना को प्रधानमंत्री बना देते तो भी भारत का विभाजन टल सकता था।
क्योंकि जिन्ना और नेहरू दोनों ही प्रधानमंत्री बनना चाहते थे, इसलिए अपनी व्यक्तिगत आकाक्षाओं के कारण देश के टुकड़े कर दिए। बंगाल का विभाजन तो इतना अधिक क्रूर था कि उसे शब्दों में बयां ही नहीं किया जा सकता है। बंगाल फाइल्स में थोड़ा था सुहरावर्दी को दिखाया गया था। चटगांव, सिलेट आदि जगहें, जो आज बांग्लादेश में हैं, वहां तो 90 प्रतिशत हिन्दू आबादी थी। वहां इसका विरोध हुआ और अंग्रेजों ने वहां जनमत संग्रह करवाया, लेकिन हिन्दू अपनी करनी के कारण वहां भी हार गया। अंग्रेजों ने विभाजन में भी धोखाधड़ी की थी, लेकिन हमारा उस समय का नेतृत्व सत्ता का स्वप्न देखते हुए सोता रहा। हमें उस वीभत्स इतिहास का स्मरण करना आवश्यक है। क्योंकि, सामाजिक, आर्थिक, मानसिक और पारिवारिक रूप से विभाजन की विभीषिका का दर्द आज भी हमारे मन में है। अगर हम जागृत नहीं रहे तो अभी भी ये विभाजन होता रहेगा।
सीएए का विरोध
सीएए के खिलाफ में देश में देश में प्रदर्शन हुए। जबकि, सीएए 2014 से पहले से देश में रह रहे ऐसे हिन्दू, सिखों को भारत की नागरिकता देने के लिए था, उसे भी इस्लाम विरोधी बताकर प्रचारित किया गया। कष्ट इस बात का भी है कि इसका विरोध करने वाले केवल मुसलमान बस नहीं, बल्कि हमारे हिन्दू भी थे। हिन्दू आज भी नहीं जगा है, वो विभाजन की विभीषिका को भूल गया है। नेपाल में हिन्दू जाग गया है, और उसने अत्याचार का प्रतिकार किया, लेकिन हम। हम कब जगेंगे?
जब तक हम नहीं जागेंगे, डेमोग्राफी कमीशन अपना काम नहीं कर सकेगा। भारत का अखंड होना इसकी सुरक्षा के लिए आवश्यक है। भारत का अखंड होना विश्व के कल्याण की आवश्यकता है। डोमनिक लापेर ने अपनी पुस्तक फ्रीडम ऑफ मिडनाइट में अंग्रेजों के षड्यंत्र के बारे में लिखा था। लेकिन, अंग्रेजों के अलावा विभाजन के लिए मुस्लिम लीग भी इतना ही जिम्मेदार था। बड़ी बात ये है कि भारत का विभाजन करवाने वाली मुस्लिम आज भी केरल में सत्ता में है। वही मुस्लिम लीग आज हैदराबाद में भी म्युनिसिपल कार्पोरेशन संचालित कर रही है। यही मुस्लिम लीग पूर्ण वंदेमातरम गान का विरोध कर रही है।
इस तरह के लोग आज भी इस देश में चुनकर आ रहे हैं, क्योंकि हम लोग विभाजन की विभीषिका को भूल गए। हम भूल गए हैं अपने पूर्वजों के कष्टों को। हमें इसलिए भी एक संकल्प लेने की आवश्यकता है, क्योंकि राष्ट्रगान में शामिल बंग आज अधूरा है, वो ढाकेश्वरी देवी का मंदिर हमसे दूर हो गया। हमसे वो लाहौर भी दूर हो गया है, जहां कभी पाणिनि ने अष्टाध्यायी की रचना की थी।
भारत फिर एक होगा
15 अगस्त 1947 को पॉंडिचेरी के आकाशवाणी केंद्र से रेडियो के जरिए महर्षि अरविंद ने भविष्यवाणी की थी कि भारत फिर एक होगा। उन्होंने विभाजन को अप्राकृतिक और अभौगोलिक करार दिया था। महर्षि अरविंद का स्वप्न और अटल जी कि कविता में लिखा गया संकल्प, भारत की संसद में लिए गए फैसलों के संकल्प से अफगानिस्तान से लेकर सामदेश (थाइलैंड) तक भारत को अखंड भारत बनाना होगा। इन सभी को अंग्रेजों ने प्रशासनिक बताकर अलग कर दिया था। जम्बूद्वीप में से 27 देश बाहर निकले हैं। इन सभी को मिलाकर एक दिन यूनाइटेड स्टेट ऑफ भारत खड़ा होगा।















