Odisha Ki Udaan 2.0: पाकिस्तान को अचानक क्यों याद आई इस्लाम से पहले की विरासत, डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने बताया कारण
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होम भारत ओडिशा

Odisha Ki Udaan 2.0: पाकिस्तान को अचानक क्यों याद आई इस्लाम से पहले की विरासत, डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने बताया कारण

डॉ. सच्चिदानंद जोशी जी ने कहा कि पाकिस्तान की ओर से अपनी प्राचीन सभ्यता और विरासत को लेकर किए जा रहे दावों को केवल इतिहास के संदर्भ में नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक नैरेटिव भी दिखाई देता है, जिसे समझना आवश्यक है।

Written byMahak SinghMahak Singh
Sep 3, 2026, 03:13 pm IST
inओडिशा
IGNCA के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी जी

IGNCA के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी जी

‘पाञ्चजन्य’ द्वारा आयोजित दो दिवसीय ‘सुशासन संवाद-ओडिशा की उड़ान 2.0’ में देश, समाज, संस्कृति और सुशासन से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर सार्थक विमर्श हुआ। इसी क्रम में एक विशेष सत्र में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी जी ने ‘पाञ्चजन्य’ की कंसल्टिंग एडिटर तृप्ति श्रीवास्तव जी के साथ संवाद किया।

प्रश्न- हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान, जो मजहब के आधार पर भारत से अलग हुआ था, अब इस्लाम से पहले की अपनी जड़ों को स्वीकार करने और उन्हें तलाशने की कोशिश करता हुआ दिखाई दे रहा है। आज पाकिस्तान तक्षशिला, पाणिनि, सिंधु सभ्यता और गांधार जैसी अपनी प्राचीन विरासतों की बात कर रहा है। आपको क्या लगता है पाकिस्तान की ये कोशिशें वास्तव में अपनी प्राचीन जड़ों और विरासत से जुड़ने की इच्छा का परिणाम हैं, या इसके पीछे कोई रणनीतिक और अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव भी दिखाई देता है?

उत्तर- डॉ. सच्चिदानंद जोशी जी ने कहा कि पाकिस्तान की ओर से अपनी प्राचीन सभ्यता और विरासत को लेकर किए जा रहे दावों को केवल इतिहास के संदर्भ में नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक नैरेटिव भी दिखाई देता है, जिसे समझना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2025 में पहलगाम की घटना के बाद भारत ने पाकिस्तान के संदर्भ में सिंधु जल संधि को लेकर कड़ा रुख अपनाया। इसके बाद अचानक पाकिस्तान की ओर से सरस्वती-सिंधु सभ्यता पर अपना अधिकार जताने और स्वयं को उसकी विरासत का स्वाभाविक वाहक बताने की बातें सामने आने लगीं। इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए पाकिस्तान के निर्माण की मूल पृष्ठभूमि को देखना होगा। पाकिस्तान का निर्माण द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के आधार पर हुआ और धर्म के आधार पर भारत का विभाजन हुआ। ऐसे में विभाजन के बाद यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण हो गया कि उस भूभाग की हजारों वर्षों पुरानी सभ्यतागत और सांस्कृतिक विरासत का उत्तराधिकारी कौन है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान धर्म के आधार पर भारत से अलग हुआ, लेकिन जिस भूभाग पर वह देश बना, उसकी सभ्यता, संस्कृति और ज्ञान-परंपरा की जड़ें इस्लाम के आगमन से कहीं अधिक पुरानी हैं। लंबे समय तक पाकिस्तान के इतिहास-लेखन में इस्लाम-पूर्व इतिहास और उस क्षेत्र की प्राचीन भारतीय सभ्यता को अपेक्षित महत्व नहीं मिला। लेकिन अब सरस्वती-सिंधु सभ्यता, तक्षशिला, गांधार, पाणिनि और संस्कृत को लेकर नए दावे सामने आ रहे हैं। जब कोई देश अचानक अपनी प्राचीन विरासत को नए सिरे से परिभाषित करने का प्रयास करता है, तो यह देखना जरूरी हो जाता है कि इसके पीछे केवल अपनी जड़ों से जुड़ने की स्वाभाविक इच्छा है या इसके साथ कोई व्यापक नैरेटिव भी चल रही है।

यदि यह दावा किया जाए कि सरस्वती-सिंधु सभ्यता के वास्तविक वाहक हम ही हैं, उसकी विरासत को आगे बढ़ाने वाले भी हम ही हैं और उसके सांस्कृतिक प्रतिनिधि भी हम ही हैं, तो यह केवल इतिहास की चर्चा नहीं रह जाती। यह अपनी सभ्यतागत पहचान को नए सिरे से स्थापित करने का प्रयास भी बन जाती है। एक तरफ भारत लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की आतंकवाद-समर्थक गतिविधियों को उजागर करता रहा है और विभिन्न घटनाओं के संदर्भ में प्रमाण भी प्रस्तुत करता रहा है। जब हम विरासत की बात करते हैं, तो हमें भूगोल, संस्कृति और निरंतरता इन तीनों पहलुओं को साथ लेकर चलना होगा। भूगोल यह बता सकता है कि कोई स्थान आज किस देश की सीमा में स्थित है, लेकिन केवल भूगोल यह तय नहीं कर सकता कि उस स्थान से जुड़ी संपूर्ण सभ्यतागत विरासत किसकी है। विरासत उस संस्कृति से भी निर्धारित होती है, जिसने उस ज्ञान को समझा, संरक्षित किया, आत्मसात किया और पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया। इसलिए दुनिया के सामने यह अंतर स्पष्ट करना आवश्यक है कि किसी विरासत का जन्मस्थान एक ऐतिहासिक तथ्य हो सकता है, लेकिन उस विरासत की सांस्कृतिक निरंतरता उससे कहीं बड़ा प्रश्न है। हमारा दायित्व है कि हम अपनी सभ्यता और अपनी ज्ञान-परंपरा को केवल भावनात्मक गौरव के रूप में प्रस्तुत न करें, बल्कि प्रमाण, शोध और तर्क के आधार पर दुनिया के सामने रखें। तभी हम यह स्पष्ट रूप से बता पाएँगे कि भारतीय सभ्यता की विरासत का भूगोल कितना व्यापक है और उसकी सांस्कृतिक निरंतरता कितनी गहरी, समृद्ध और जीवंत रही है।

प्रश्न- अखंड भारत की जब हम बात करते हैं तो पाकिस्तान को लेकर भी यह चर्चा होती है कि वह आज अपनी जड़ों और अपनी प्राचीन विरासत को खोजने की कोशिश कर रहा है। रणनीतिक, राजनीतिक या भौगोलिक दृष्टि से इसके अलग-अलग अर्थ हो सकते हैं। लेकिन अगर हम भारत के संदर्भ में देखें तो ‘अखंड भारत’ और ‘वृहत्तर भारत’ की अवधारणा को हम किस रूप में समझें? वृहत्तर भारत से वास्तव में हमारा आशय क्या है?

उत्तर- विष्णु पुराण सहित हमारे अनेक प्राचीन ग्रंथों में भारतभूमि की महिमा का वर्णन मिलता है। कहा गया है-

‘गायन्ति देवाः किल गीतकानि, धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।’

अर्थात भारतभूमि में जन्म लेना भी सौभाग्य की बात मानी गई है। प्राचीन ग्रंथों में भारत की जो कल्पना है, वह केवल आज की राजनीतिक या भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं है। लेकिन जब हम ‘अखंड भारत’ या ‘वृहत्तर भारत’ की बात करते हैं, तो इनके राजनीतिक और सांस्कृतिक अर्थ को अलग-अलग समझना जरूरी है। वर्तमान भारत की अपनी राजनीतिक और भौगोलिक सीमाएँ हैं, जबकि वृहत्तर भारत मूलतः एक सांस्कृतिक संकल्पना है। भारत केवल एक भूखंड नहीं, बल्कि एक महान सांस्कृतिक राष्ट्र है। हमारी कला, संगीत, साहित्य, दर्शन, भाषा, खान-पान और जीवन-पद्धति का प्रभाव भारत की वर्तमान सीमाओं से बाहर भी दिखाई देता है। बाली यात्रा इसका एक उदाहरण है, जो भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के प्राचीन समुद्री एवं सांस्कृतिक संबंधों की याद दिलाती है। भारत की यह सांस्कृतिक यात्रा मध्य एशिया से लेकर इंडोनेशिया, कंबोडिया और थाईलैंड तक दिखाई देती है। रामायण, संस्कृत, बौद्ध परंपरा और भारतीय दर्शन के अनेक रूप इन क्षेत्रों में विकसित हुए। रामकथा भी अलग-अलग देशों में स्थानीय परंपराओं के साथ जुड़कर आगे बढ़ी।

इंडोनेशिया में तो अनेक मुस्लिम कलाकार भी रामायण का मंचन करते हैं। उनसे जब पूछा जाता है कि आप इस्लाम को मानते हैं, फिर रामायण कैसे प्रस्तुत करते हैं, तो उनका उत्तर होता है-

‘इस्लाम हमारा मत है, लेकिन राम हमारी संस्कृति हैं।’

यह बताता है कि संस्कृति की सीमाएँ धर्म और भूगोल से कहीं व्यापक होती हैं।वृहत्तर भारत का अर्थ किसी देश की सीमा पर दावा करना नहीं, बल्कि भारत के उन सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंधों को समझना है, जो सदियों से विभिन्न देशों और समाजों को आपस में जोड़ते आए हैं।

Topics: पाञ्चजन्य “सुशासन संवादडॉ. सच्चिदानंद जोशीSachchidanand Joshiओडिशा की उड़ान 2.0Odisha Udaan 2.0Odisha Ki Udaan 2.0#panchjanyaअखंड भारतसुशासन संवादIGNCA
Mahak Singh
Mahak Singh
2022 में ज़ी न्यूज़ से पत्रकारिता की शुरुआत की। उसके बाद न्यूज़ नेशन, दैनिक जागरण और न्यूज़ 24 जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए पत्रकारिता के विभिन्न आयामों का अनुभव प्राप्त किया। वर्तमान में पाञ्चजन्य में सब एडिटर के रूप में कार्यरत हूं। ज़िमा ज़ी इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया आर्ट्स से मैने पत्रकारिता की है। [Read more]
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