स्वतंत्रता संग्राम के समानांतर विभाजन की गाथा बार-बार दोहराई जाती है। विभाजन की विभीषिका अभी तक भारतीय इतिहासकारों एवं साहित्यकारों का पीछा कर रही है। आठ दशक बीतने पर भी बहुत कुछ परेशान करने वाला है। एशिया के देशों ने अपनी आजादी के मौके पर भारत-पाक विभाजन से कई सबक सीखे। पंजाब के संदर्भ में विभाजन की त्रासदी आज भी जनमानस के साथ चलती है। पंजाब के किसी बड़े शहर में बुजुर्गों के साथ जब भी बात होती है तो वे अपने अनुभव विभाजन के साथ जोड़कर प्रायः सुनाते हैं।
ठीक उत्तर नहीं मिल रहे
विभाजन का गहरा प्रभाव पंजाबियों पर पड़ा, खासकर सिख समुदाय पर। विभाजन से पूर्व सिख समुदाय समृद्धि के कई पड़ाव पार कर चुका था। सिख उस समय संयुक्त पंजाब में सबसे बड़े काश्तकार होते थे। लायलपुर में जमीन को आबाद करने में भी सिख समुदाय की बहुत बड़ी भूमिका थी। सचाई बहुत कड़वी है। एक लाख से अधिक लोगों ने सांप्रदायिक दंगों में अपनी जान गंवाई और एक करोड़ से ऊपर लोग बेघर हो गए। इतनी बड़ी त्रासदी 20वीं शताब्दी में पंजाब, विशेषकर सिख समुदाय को झेलनी पड़ी।
राजनीतिक कारणों पर दर्जनों पुस्तकें लिखी गईं, बेशुमार फिल्में बनीं और उर्दू, पंजाबी, हिंदी और अंग्रेजी के बड़े साहित्यकारों ने इस त्रासदी पर उपन्यास लिखे। कविताएं रचीं और बेशुमार कहानियों के माध्यम से पंजाब के दर्द को रेखांकित किया। सआदत हसन मंटो, नानक सिंह, यशपाल, भीष्म साहनी और अंग्रेजी के बड़े लोकप्रिय पत्रकार खुशवंत सिंह ने पंजाब की इस भयानक त्रासदी पर बहुत कुछ रचा। पता नहीं क्यों, आज भी विभाजन के बारे में न सही सवाल उठाए गए हैं और न ठीक उत्तरों तक हम पहुंचे हैं।
आज भी हरे हैं घाव
कहा तो यह भी जाता है कि देश को आजादी मिली और पंजाब को विभाजन की पीड़ा। आज भी सिख समुदाय और पंजाबियों के जख्म रिसते हैं। विभाजन क्यों हुआ? कैसे हुआ? इसके कारणों की पड़ताल हम करें। उस समय सत्ता पर हावी होने के लिए मुस्लिम लीग और कांग्रेस के कर्णधारों ने पंजाब के विभाजन को न केवल स्वीकार किया, बल्कि भारत के एक बहुत बड़े भू-भाग से देश को वंचित कर दिया। पंजाबी, खासकर सिख, अपनी जायदाद, घर-बार, व्यापार छोड़कर शरणार्थी बनकर पंजाब के इस हिस्से में खाली हाथ आ गए।
शरणार्थी शिविरों में कई महीनों तक रहे। मुझे याद है कि मेरे पापा और मां जब भी दुख की घड़ियों को गिना करती थीं, उन्हें लगता था कि शरणार्थी होकर हमने वाघा बॉर्डर पार किया था। यह दर्द की कहानी का अंत नहीं था। खालसा कॉलेज, अमृतसर में शरणार्थियों का बहुत बड़ा शिविर लगा। हजारों सिख, हिंदू और मुसलमान खालसा कॉलेज के कैंप में खाना खाने के लिए लंबी कतारों में बैठ जाते थे। अमृतसर का हिंदू और पंजाबी भाईचारा अपने इन भाइयों के लिए खाने की व्यवस्था करता था।
श्रीगुरुजी ने भी इस कैंप का दौरा किया था। वे अपने साथियों के साथ वाघा बॉर्डर पर पंजाबी भाइयों का हौसला बढ़ाने के लिए प्रायः जाते थे। श्रीगुरुजी ने अपने कई संस्मरणों में इस घटना का उल्लेख किया है। चारों तरफ हाहाकार था। कोई किसी को नहीं पहचानता था। फटेहाल पंजाबी एक-दूसरे से मुंह छिपाते घूम रहे थे।
बहुत गहरा दुख
सिख समुदाय के बहुत गहरे रिश्ते संयुक्त पंजाब के साथ थे। अनेक गुरुद्वारों को भरे मन से सिख समुदाय ने अलविदा कही थी। दुख बहुत गहरा था। अरदास में हर रोज पूरा सिख जगत वाहेगुरु से बिछड़े हुए गुरु धामों के दर्शन के लिए नतमस्तक होता था। कभी ननकाना साहिब को याद किया जाता था। कभी गुरु अर्जुन देव जी की शहादत स्थल के बारे में सोचकर सिखों की आंखें भर आती थीं और कभी गुरु नानक देव जी के पांव को जिस धरा ने स्पर्श किया था, उसके दर्शन-दीदार के लिए सिख समुदाय की आत्माएं बेचैन रहती थीं।
वाहेगुरु की कृपा से हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साहस भरे कदम उठाए। वाहेगुरु की कृपा हुई। डेरा बाबा नानक कॉरिडोर बना और करतारपुर के दर्शनों के लिए नानक नाम लेवा संगत को आत्मसम्मानपूर्वक करतारपुर साहिब के दर्शन होने लगे। विभाजन की कुछ पीड़ा कम हुई। सिख समुदाय ने करतारपुर साहिब के दर्शन कर आत्म उल्लास अनुभव किया। पंजाबी, खासकर सिख, कभी भी हिम्मत नहीं हारते। कठिन से कठिन समय में भी उनकी जिजीविषा कायम रहती है।
शरणार्थी होकर विभाजन के दर्द को झेलते हुए उन्होंने पुनः अपने साहस के बल पर आर्थिक विकास में बेजोड़ योगदान दिया। देश की आजादी और विभाजन के इतिहास में सब कुछ दर्ज है। भारत के विकास में सिख समुदाय की भूमिका उल्लेखनीय है। काले पानी की सजाओं में 80 प्रतिशत से ऊपर सिख देशभक्तों का अवदान है। विभाजन ने बहुत बड़े सवाल खड़े किए, विशेषकर मुस्लिम लीग की भूमिका ने सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया। सिख, मुसलमान और हिंदुओं के रिश्तों पर प्रश्नचिह्न लगाए। यह प्रश्नचिह्न राजनीतिक नकारात्मक संवेदना को बहुत दूर तक प्रभावित नहीं कर पाए। अखंड भारत की चेतना में पूरा सिख जगत उसी तरह अपनी भूमिका निभा रहा है, जिस तरह कभी उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में निभाई थी।
करतारपुर के वीजा-मुक्त दर्शन

करतारपुर स्थित गुरुद्वारा दरबार साहिब रावी नदी के तट पर और भारत-पाकिस्तान की सीमा से लगभग 5 किलोमीटर दूर है। यहां सिखों के प्रथम गुरु गुरु नानक देव अपनी यात्राओं से लौटने के बाद बस गए। यहीं उन्होंने सिख समुदाय को संगठित कर 1522 में गुरुद्वारा दरबार साहिब की स्थापना की। यहीं उन्होंने 1539 में अंतिम सांस ली। इस कारण यह स्थल सिखों के लिए बहुल ही पवित्र है। विभाजन के बाद श्रद्धालु आसानी से करतारपुर साहिब जा नहीं पाते थे।
श्रद्धालु इस स्थल के दर्शन केवल दूरबीन से करते थे। ऐसा वर्षों तक होता रहा। इसे देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर भारत सरकार ने यहां एक गलियारे का निर्माण कराया। यह भारत के पंजाब में गुरदासपुर स्थित डेरा बाबा नानक को पाकिस्तान के नारोवाल स्थित पवित्र गुरुद्वारा दरबार साहिब से जोड़ता है। इसकी लंबाई लगभग पांच किलोमीटर है। इसके माध्यम से श्रद्धालु बिना वीजा के करतारपुर साहिब जाते हैं।
समझदारी बरकरार
दूर जाने की जरूरत नहीं, विभाजन के दुख ने इतिहास को समझने का भी एक नजरिया पंजाबियों को दिया। 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध में सिख योद्धाओं की वीरता को कभी नहीं भुलाया जा सकता। एक बात और ध्यान देने वाली है-इतना सब कुछ होने पर भी पंजाब में कभी सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए। हिंदू-सिख भाईचारा सदा कायम रहा।
आज भी पूरे पंजाब में हिंदू-सिख एकता, रिश्ते और समझदारी उसी तरह बरकरार है, जिस तरह कभी महा पंजाब में होती थी। विभाजन के बाद आज भी वह धरती व खेत पंजाबियों के मन में बसे हुए हैं। अखंड भारत के संकल्प में पंजाबियों की यह चेतना सिद्धि की ओर बढ़ेगी। आने वाला भारत अपनी पूर्व गौरव गाथा के साथ उस भूगोल के साथ दोबारा विकास की ऊंचाइयों को छुएगा, जिसका सूक्ष्म अन्वेषण पंजाबियों के रक्त में समाया हुआ है।
विभाजन के दर्द ने सिख समाज को एकात्मकता एवं उस गौरव के साथ पुनः जोड़ा, जिसकी पहचान पंजाब के संतों, भक्तों और गुरुओं की वाणी में विद्यमान है। गुरु नानक देव जी ने ठीक कहा था-किरत करनी, भाईचारे के साथ किरत की कमाई को बराबरी के स्तर पर ग्रहण करना और वाहेगुरु की रजा में रहकर नाम जपना।
माननीय प्रधानमंत्री जी ने विभाजन की त्रासदी की स्मृति में पुनः संवाद करने की जो पहल की है, इससे विभाजन के ऐतिहासिक महत्व और सिख समुदाय की साहस गाथा पर पुनर्विचार करने का अवसर मिलेगा।

















