16 अगस्त 1946 का दिन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में एक अत्यंत दुखद और रक्तरंजित अध्याय के रूप में दर्ज है। मुस्लिम लीग ने इस दिन को ‘डायरेक्ट एक्शन डे (प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस) के रूप में मनाने का निर्णय लिया था। बंगाल, विशेषकर कलकत्ता में, इस आह्वान के बाद जिस प्रकार की हिंसा भड़की, निर्दोष हिंदुओं को जिस बर्बरता से मारा गया, उसे भुलाया नहीं जा सकता। इसके ठीक एक वर्ष बाद 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। इससे एक दिन पहले, 14 अगस्त की रात पाकिस्तान स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आया और उसके बाद 15 अगस्त को भारत की स्वतंत्रता की घोषणा हुई। लेकिन इस स्वतंत्रता के पीछे विभाजन की ऐसी त्रासदी छिपी हुई थी, जिसकी कीमत लाखों लोगों को अपनी जान, संपत्ति, घर और सामाजिक जीवन खोकर चुकानी पड़ी।
यहां कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न उठते हैं। क्या मुस्लिम लीग ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया था? क्या उसका मुख्य उद्देश्य पूरे भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराना था? क्या वह भारत की साझा सांस्कृतिक और राजनीतिक परंपरा के साथ स्वयं को जोड़ती थी? या उसका राजनीतिक लक्ष्य धीरे-धीरे एक पृथक मुस्लिम राष्ट्र की स्थापना की दिशा में केंद्रित हो गया था? इन प्रश्नों का उत्तर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास और मुस्लिम लीग की राजनीति के अध्ययन से मिलता है। मुस्लिम लीग का राजनीतिक दृष्टिकोण समय के साथ बदलता गया और 1940 के दशक में उसका केंद्रीय लक्ष्य अलग मुस्लिम राष्ट्र की मांग बन गया। इसके विपरीत, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और उसके साथ जुड़े अनेक नेता अखंड भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में थे, लेकिन उनकी नहीं सुनी गई
दब गई विरोध की आवाजें
इस संदर्भ में सीमांत गांधी के नाम से प्रसिद्ध खान अब्दुल गफ्फार खान का उदाहरण अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे भारत के विभाजन के कट्टर विरोधी थे। विभाजन स्वीकार किए जाने के बाद उन्होंने महात्मा गांधी से अत्यंत पीड़ा के साथ कहा था कि उन्हें ऐसा महसूस हो रहा है मानो उनके लोगों को भेड़ियों के सामने डाल दिया गया हो। वे ब्रिटिश शासन के दौरान लंबे समय तक जेल में रहे और पाकिस्तान बनने के बाद भी पाकिस्तानी शासन ने उन्हें कई बार जेल में रखा। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि मुस्लिम समाज के भीतर भी ऐसे अनेक नेता और समूह थे जो विभाजन के विरुद्ध थे।
फिर प्रश्न उठता है कि पाकिस्तान की मांग इतनी प्रभावी कैसे हुई? आखिर वह राजनीतिक कल्पना, जिसका कुछ समय पहले तक कोई निश्चित भौगोलिक स्वरूप नहीं था, कुछ ही वर्षों में वास्तविकता कैसे बन गई?
इस प्रश्न का उत्तर केवल कुछ नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं में खोजने से पूरा नहीं होता। इसके पीछे उस समय की साम्प्रदायिक राजनीति, राजनीतिक प्रचार, भय, असुरक्षा, प्रतिनिधित्व की चिंता, ब्रिटिश नीतियां, कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच बढ़ते मतभेद तथा जनता के बीच फैलते सामुदायिक अविश्वास-इन सभी कारकों की भूमिका थी।
भीड़ की मानसिकता और हिंसा
इसी प्रकार विभाजन के समय हुई हिंसा को समझने के लिए भी यह देखना आवश्यक है कि सामान्य नागरिक किस प्रकार सामुदायिक उन्माद और राजनीतिक प्रचार से प्रभावित हुए। सामान्य परिस्थितियों में जो व्यक्ति अपने पड़ोसी के साथ शांतिपूर्वक जीवन बिताता था, वही जब भीड़ की मानसिकता, प्रतिशोध की भावना और सामुदायिक भय से घिर गया, तो हिंसा में शामिल हो सकता था। यही भीड़-मानसिकता विभाजन के समय अनेक स्थानों पर भयानक रूप में दिखाई दी। 1947 में जब भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान अस्तित्व में आया, तब पश्चिमी पंजाब, सिंध, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत और पूर्वी बंगाल सहित अनेक क्षेत्रों में साम्प्रदायिक हिंसा तेज हो गई। हिंदू और सिख समुदायों को अपने घर छोड़कर भारत की ओर पलायन करना पड़ा। इस विस्थापन के दौरान हत्याएं, लूट, अपहरण, बलात्कार और संपत्ति पर कब्जे जैसी असंख्य घटनाएं हुईं। महिलाओं पर विशेष रूप से अत्याचार हुए। परिवार बिखर गए और करोड़ों लोगों को अपने पुश्तैनी घरों से विस्थापित होना पड़ा। विभाजन केवल राजनीतिक सीमा-निर्धारण नहीं था; वह करोड़ों मनुष्यों के जीवन में आया एक गहरा सामाजिक और मानवीय संकट था।
पलायन और पुनर्वास
पंजाबी और सिंधी हिंदू-सिख समुदायों को इस त्रासदी का विशेष रूप से सामना करना पड़ा। सिंध, पंजाब, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत और वर्तमान पाकिस्तान के अन्य हिस्सों से बड़ी संख्या में शरणार्थी भारत आए। अनेक लोग रेलगाड़ियों के माध्यम से लाहौर और दिल्ली तथा अन्य शहरों की ओर पहुंचे। रास्तों में हिंसा और असुरक्षा के कारण यात्राएं अत्यंत भयावह हो गई थीं। भारत सरकार ने स्वतंत्रता के बाद विस्थापित लोगों के पुनर्वास के लिए पुनर्वास मंत्रालय सहित अनेक व्यवस्थाएं स्थापित कीं। शरणार्थी शिविर बनाए गए और बाद में लोगों को विभिन्न राज्यों तथा शहरों में बसाने के प्रयास किए गए। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में पंजाबी और सिंधी शरणार्थियों की बड़ी आबादी इसी पुनर्वास प्रक्रिया के परिणामस्वरूप बसी।
अपनी बेटी को ही मारना पड़ा
मेरठ भी इस विस्थापन की कहानी से अछूता नहीं रहा। यहां आए अनेक परिवारों ने अपने साथ विभाजन की ऐसी स्मृतियां लेकर जीवन शुरू किया, जिन्हें वे कभी भूल नहीं सके। इसी संदर्भ में मेरठ के सुभाष बाजार क्षेत्र से जुड़ा भगवान दास मक्कड़ परिवार का एक संस्मरण उल्लेखनीय है। भगवान दास मक्कड़ वस्त्र व्यवसाय से जुड़े थे और विभाजन के बाद विस्थापित होकर मेरठ आए थे। उनके परिवार के एक बुजुर्ग सदस्य का साक्षात्कार मैंने 1980 के दशक में किया था। उन्होंने विभाजन के दौरान अपने परिवार के साथ घटी एक अत्यंत मार्मिक घटना सुनाई थी।
उन्होंने बताया कि उनकी लगभग जवान बेटी थी। परिवार पर हमला होने का खतरा बढ़ गया था और आसपास हिंसक भीड़ जमा हो चुकी थी। ऐसी स्थिति में परिवार के सामने अपनी महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा का गंभीर संकट था। उन्होंने बताया कि अपनी बेटी को हमलावरों के हाथों पड़ने से बचाने के लिए उन्होंने स्वयं उसकी हत्या कर दी। यह निर्णय कितना असहनीय और भयावह रहा होगा, इसकी कल्पना करना भी कठिन है।
इसके बाद परिवार जब वहां से निकल रहा था, तब एक और हृदयविदारक घटना हुई। परिवार के साथ लगभग छह महीने का एक बच्चा भी था। महिलाएं और अन्य सदस्य एक गाड़ी में थे, जबकि कुछ लोग सुरक्षा के लिए उसके आगे-पीछे चल रहे थे। पीछे से हिंसक भीड़ के आने का खतरा बना हुआ था और परिवार तेजी से आगे बढ़ रहा था। इसी दौरान बच्चा गाड़ी से गिर गया। परिवार का ध्यान उस समय पीछे से आ रही भीड़ से बचाव पर था। बच्चे की मां चीखती रही, लेकिन ऐसी परिस्थिति में गाड़ी रोककर वापस जाना पूरे परिवार को खतरे में डाल सकता था। अंततः परिवार को उस बच्चे को वहीं छोड़कर आगे बढ़ना पड़ा। यह घटना विभाजन के दौरान उत्पन्न उस अमानवीय परिस्थिति का उदाहरण है जिसमें लोगों के सामने ऐसे निर्णय लेने की नौबत आ गई थी, जिनकी कल्पना सामान्य जीवन में नहीं की जा सकती। एक ओर परिवार की रक्षा का प्रश्न था और दूसरी ओर अपने ही बच्चे को पीछे छूटते देखने की असहनीय पीड़ा।
इतिहास के पन्नों से आगे की पीड़ा
विभाजन की त्रासदी को समझने के लिए ऐसे व्यक्तिगत संस्मरण अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इतिहास केवल राजनीतिक समझौतों, नेताओं के भाषणों और सीमाओं के नक्शों का नाम नहीं है। इतिहास उन सामान्य लोगों की पीड़ा में भी मौजूद है, जिन्होंने अपने घर खोए, अपने परिजनों को खोया और जीवन भर उन घटनाओं की स्मृतियां ढोईं।
इसलिए विभाजन की हिंसा को समझते समय केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि हिंसा हुई और लाखों लोग मारे गए। हमें यह भी समझना होगा कि सामान्य समाज में सामुदायिक अविश्वास, भय, राजनीतिक प्रचार और भीड़ की मानसिकता किस प्रकार इतनी तीव्र हो गई कि पड़ोसी ही एक-दूसरे के शत्रु बन गए।
विभाजन की त्रासदी का अध्ययन तभी सार्थक होगा जब हम उसके सभी कारणों को निष्पक्षता से समझने का प्रयास करें, मुस्लिम लीग की पृथकतावादी राजनीति, कांग्रेस और लीग के राजनीतिक मतभेद, ब्रिटिश शासन की नीतियां, साम्प्रदायिक संगठनों की भूमिका, राजनीतिक प्रचार, स्थानीय परिस्थितियां और सबसे बढ़कर वह मनोविज्ञान जिसके चलते हिंदुओं के साथ इतनी बर्बरता की गई।

















