पाञ्चजन्य के ‘सुशासन संवाद : ओडिशा की उड़ान 2.0’ में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी से पाञ्चजन्य की सलाहकार संपादक तृप्ति श्रीवास्तव ने बात की। प्रस्तुत हैं मुख्यांश
पाकिस्तानी वाकई अपनी जड़ों से जुड़ना चाहते हैं या कोई आपको इसके पीछे रणनीति दिखाई देती है?
अचानक पाकिस्तान को याद आ गया कि उसको सरस्वती सिंधु सभ्यता, संस्कृत, पाणिनि के बारे में बात करनी चाहिए। इन सारी चीजों के पीछे एक बहुत बड़ी अंतरराष्ट्रीय रणनीति है, जिसके बारे में हमें समझना चाहिए। 2025 में पहलगाम की घटना हुई। उसके बाद भारत ने सिंधु के जल को पाकिस्तान के लिए रोकने की बात की। वहां से सारी बातें उभर के सामने आने लगीं। सरस्वती-सिंधु-सभ्यता पर दावा करना, अपना हक जताना यह बात आई। इसमें कोई नई बात नहीं है।
ऐसे में क्या यह दुनिया को बताना आवश्यक है कि किसी विरासत का भूगोल क्या है? उसकी विरासत की निरंतरता कहां से है?
सभ्यता की विरासत का संबंध या सभ्यता और विरासत सिर्फ भूगोल से नहीं होती। सभ्यता और विरासत उसकी संस्कृति से होती है। अपने परंपरागत अविर्भाव से होती है। हम सिर्फ पाणिनि के जन्म स्थान को लेकर बात करते हैं। पाणिनि का जन्म शालातुर में हुआ होगा। पर उनकी पूरी शिक्षा-दीक्षा या उन्होंने जो पूरा ज्ञान अर्जन किया या उस ज्ञान को आगे बढ़ाया वो तो बात बहुत आगे गई। संस्कृत, भाषा की परंपरा को आगे पतंजलि और कौटिल्य जैसे विद्वान लेकर गए। विष्णु पुराण में कहा गया है कि उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणं! अर्थात इसमें भारत का भूगोल भी है और भारत की संस्कृति भी है। यह विष्णु पुराण में आज से कई हजार साल पहले कहा गया है। जब हम भारत की बात कर रहे हैं तो उस भारत की बात कर रहे हैं जिस भारत में पाणिनि भी जन्मे, जिस भारत में हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो की सभ्यता, नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय भी थे, जिस भारत में ज्ञान की अविरल धारा उत्तर से दक्षिण तक और पूरब से पश्चिम तक बहती थी।
अखंड भारत में वृहत्तर भारत की अवधारणा क्या है ?
वृहत्तर भारत की जो कल्पना है उसमें भारत का जो सांस्कृतिक विस्तार है या भारत के जो सांस्कृतिक संबंध हैं, वे अलग-अलग राष्ट्रों से कैसे रहे हैं। किस तरह भारत ने उन राष्ट्रों से क्या प्राप्त किया है और भारत ने उन राष्ट्रों को क्या दिया है। हमारी भौगोलिक सीमाएं अगर हमें तोड़ती हैं तो सांस्कृतिक दृष्टिकोण हमें आपस में जोड़ता है। इसको सौम्य शक्ति कहते हैं। भारत की सबसे बड़ी शक्ति-सांस्कृतिक शक्ति है और उसी आधार पर इस वृहत्तर भारत की कल्पना है।
अभी हाल ही में ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूर्ण हुए। राष्ट्रगीत पर विवाद होना क्या उचित है ?
वंदे मातरम् इस गीत के 150 वर्ष पूरे होना, एक ऐतिहासिक घटना है। पूरे विश्व में शायद ही किसी साहित्यिक अंश को इस तरह की प्रतिष्ठा मिली होगी जैसी ‘वंदे मातरम्’ को मिली है। हम सब भारतवासियों को इसके बारे में गर्व होना चाहिए कि सिर्फ एक गीत पूरे देश के स्वतंत्रता आंदोलन का मूल मंत्र बना। लोगों के अंदर भारत की स्वतंत्रता का जयघोष करने का जो प्रकटीकरण है-वो ‘वंदे मातरम्’ बन गया। उस्ताद साबिर खान, जो बहुत प्रसिद्ध सारंगी वादक थे, ने 1947 में पहली बार ‘वंदे मातरम्’ को आकाशवाणी पर बजाया। ये सजीव प्रसारण था। उन्होंने कोई विरोध नहीं किया। गर्व से बजाया तो फिर इस बात में किसका क्या विरोध होना चाहिए? आज देश के कई दूसरे मत-पंथ को मानने वाले गायक बहुत सुंदर भजन गाते हैं। इस बात पर लोगों को बांटना कि हम मजहब के आधार पर कोई राष्ट्रगीत नहीं गाएंगे। यह विशुद्ध रूप से एक राजनीतिक तुष्टीकरण का हिस्सा है।

















