यदि हम अपनी विद्या और साहित्य का क्षरण होने देंगे, तो राष्ट्र का सर्वस्व नष्ट हो जाएगा; और यदि हम इनका संवर्धन करेंगे, तो राष्ट्र हर क्षेत्र में सुरक्षित और सशक्त रहेगा: पढ़ें आज का श्लोक
श्लोक-
विद्या राष्ट्रस्य खाद्यान्नं साहित्यं पानमिष्यते।
तन्निघ्नता किं न हतं रक्षता किं न रक्षितम्।।
भावार्थ-
राष्ट्र का खाद्य उसकी ‘विद्या’ है और ‘साहित्य’ उसका पान (पेय पदार्थ) है। इन्हें नष्ट करने (विकृत करने) वाले ने क्या नहीं बिगाड़ा? और इन्हें सुरक्षित करने वाले ने क्या सुरक्षित नहीं किया?
आज क्यों प्रासंगिक- मनीषियों द्वारा रचित यह श्लोक आज के आधुनिक, सूचना-प्रधान और डिजिटल युग में अत्यंत प्रासंगिक है:
वैश्विक पहचान और गौरव: जो राष्ट्र अपनी विद्या और साहित्य का संरक्षण करता है, वही विश्व मंच पर वैचारिक और तकनीकी नेतृत्व प्रदान कर सकता है। शिक्षा और साहित्य का संरक्षण केवल इतिहास को बचाना नहीं है, बल्कि राष्ट्र के भविष्य को सुरक्षित और आत्मनिर्भर बनाना है। आज जब वैश्विक स्तर पर सांस्कृतिक क्षरण और सूचनात्मक युद्ध का दौर है, तब अपनी विद्या और साहित्य को विकृत होने से बचाना राष्ट्र की स्वाधीनता और अस्तित्व की रक्षा करने जैसा है।

















