यह बात न तो नरेंद्र मोदी की है, न राहुल गांधी की, और न ही किसी अन्य राजनीतिक चेहरे की। यह बात न भाजपा की है, न कांग्रेस की, न वामदलों की और न ही किसी अन्य दल की। इतिहास के अनवरत प्रवाह में अगर हम कालचक्र को थोड़ा सा आगे बढ़ाकर देखें, तो आज के राजनीतिक परिदृश्य का नेतृत्व कर रहा कोई भी चेहरा कल नहीं रहने वाला। समय की धारा में जब कुछ और पड़ाव गुजर जाएंगे, तो कौन से दल बचेंगे, कौन से नए गठबंधन जन्म लेंगे और जो संरचनाएं शेष रह जाएंगी, उनके मौजूदा वैचारिक आधारों का कौन सा रूप शेष रहेगा – कोई नहीं जानता। हां, भारत नाम का यह देश रहेगा। लेकिन एक देश के रूप में भारत की यात्रा की दिशा क्या होगी, इसका निर्धारण व्यक्तियों, दलों और समाज से होता है।
देश की यात्रा में इन सबकी भूमिका होती है। नेता भटके तो दल रास्ता दिखाए, दल भटके तो समाज संभाले। लेकिन क्या हो जब समाज की इस भूमिका को अगवा कर लिया जाए? इन बातों को ध्यान में रखते हुए दिल्ली के जंतर-मंतर का रुख करते हैं। वहां जो कुछ दिखता है, वह अत्यधिक गंभीर है। यहां से कई रास्ते फूट रहे हैं, जो अलग-अलग मंजिलों को जा रहे हैं और जिनके निहितार्थ एक राष्ट्र के रूप में भारत के लिए अलग-अलग होने वाले हैं। इसलिए इस मोड़ पर ठहरने, सोचने, पीछे मुड़कर देखने और फिर आगे बढ़ने की आवश्यकता है।जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन और सामाजिक न्याय के नाम पर जिस भाषा का प्रदर्शन किया गया, जिस प्रकार की वीभत्स, अश्लील और विचलित कर देने वाली गालियों का उच्चारण हुआ, वह भारतीय सार्वजनिक जीवन के लिए सर्वथा अपरिचित और चिंताजनक है।
अनैतिक ही नहीं आपराधिक
हम सब इसी समाज का हिस्सा हैं। दैनिक जीवन में सार्वजनिक स्थानों पर जाते हैं, युवाओं के बीच उठते-बैठते हैं और नई पीढ़ी की संवाद-शैली से भली-भांति परिचित हैं। इसमें संदेह नहीं कि उनकी बोलचाल में कुछ ‘मामूली’ सी गालियां जगह बना चुकी हैं, लेकिन जंतर-मंतर पर जो कुछ हुआ, वह केवल युवाओं की अनौपचारिक भाषा नहीं थी। वहां हाथों में लहराई जा रही तख्तियों पर उकेरे गए शब्द, देश के शीर्ष संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को लयबद्ध तुकबंदी में दी गई गालियां- क्या वे हमारे सामान्य समाज की अभिव्यक्ति का हिस्सा हो सकते हैं?
यह केवल एक नैतिक अनाचार नहीं है, बल्कि देश के आपराधिक कानून की दृष्टि में गंभीर अपराध भी है। भारतीय न्याय संहिता, 2023 (बीएनएस) की धारा 296 स्पष्ट रूप से कहती है कि जो कोई भी किसी सार्वजनिक स्थान पर कोई अश्लील कृत्य करेगा या अश्लील शब्द/गालियां देगा जिससे दूसरे आहत हो जाएं तो वह कानूनी रूप से दंडनीय अपराध है। वहीं, बीएनएस की धारा 352 में सार्वजनिक रूप से किसी व्यक्ति को जानबूझकर इस उद्देश्य से अपमानित करना या उकसाना ताकि सार्वजनिक शांति भंग हो, इसके तहत कठोर कारावास का प्रावधान है। जंतर-मंतर पर हुआ यह भाषाई विस्फोट कोई अकस्मात घटना नहीं थी।

मूक सहमति का षड्यंत्र
इस भाषाई विस्फोट का एक दूसरा आयाम भी है, जो गालियों के सीधे उच्चारण से कहीं अधिक खतरनाक और षड्यंत्रकारी है। वह है मंच पर मौजूद शीर्ष नेतृत्व और आयोजकों की रणनीतिक चुप्पी। क्या उस विरोध प्रदर्शन के आयोजकों, उनके साथ मंच साझा करने वाले नेताओं और नागरिक समाज की हस्तियों का यह प्राथमिक दायित्व नहीं था कि वे उन युवाओं की अभिव्यक्ति शैली को रोकते? उन्हें समझाते कि विरोध करने का अधिकार तो संविधान भी देता है, लेकिन इस तरह की बातें बोलना न केनल अनैतिक बल्कि उस संविधान के भी विरुद्ध हैं जिसकी बात आज खूब हो रही है और हर कोई इसकी प्रतियां लहराता फिरता है। क्या उन्हें यह नहीं कहना चाहिए था कि लोकतांत्रिक विरोध में इस प्रकार की अश्लील और हिंसक भाषा का कोई स्थान नहीं है?
किसी भी संगठित आयोजन में आयोजकों की भूमिका केवल माइक और मंच की व्यवस्था करने तक सीमित नहीं होती। कानून की नजर में किसी भी सार्वजनिक सभा के आयोजकों पर बीएनएस धारा 2023 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता), धारा 163 (पूर्व में आईपीसी 144/149) और बीएनएस धारा 189 (गैर कानूनी सभा) के तहत प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष जिम्मेदारी बनती है। फिर प्रश्न उठता है कि जंतर-मंतर के कर्ताधर्ताओं ने ऐसी भाषा का प्रयोग करने वालों को क्यों नहीं रोका?
क्या यह उनकी सोची-समझी रणनीति थी? एक ऐसी रणनीति, जिसमें विशेष रूप से युवा लड़कियों को आगे किया गया। उन्हें नैतिकता की सारी सीमाओं को पार करने, गंदे शब्दों का इस्तेमाल करने और अश्लील हावभाव दिखाने और नारे लगाने की खुली छूट दी गई। यह सब अत्यंत विचलित करने वाला था। अग्रिम पंक्ति में महिलाओं को खड़ा करके बनाई गई अश्लीलता और आक्रामकता की व्यूह रचना सीजेपी आंदोलन का ऐसा प्रयोग था जो उनके लिए ढाल बन गया और कानून प्रवर्तन एजेंसियों (सुरक्षा बलों) की कानून व्यवस्था को संभालने की राह का सबसे बड़ा रोड़ा। ऐसे में कानून व्यवस्था बनाए रखने की उनकी जिम्मेदारी काफी जटिल हो गई। बार-बार चेतावनी देने के बाद जब भड़कती और बेकाबू हिंसक भीड़ के विरुद्ध कार्रवाई की गई तो सरकार पर ‘बर्बरता’ और मानवाधिकार हनन के आरोप लगने लगे। क्या सीजेपी की ओर से अश्लीलता और अमर्यादित टिप्प्णियों को मौन स्वीकृति देना यह शक नहीं पैदा करता कि यह व्यवस्था के विरुद्ध एक आक्रामक माहौल तैयार करने की सुनियोजित साजिश थी?
आंदोलन का ‘पैटर्न’
इस आंदोलन से एक विशिष्ट ‘पैटर्न’ उभरता है। प्रदर्शन के दौरान देश के शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ जो अश्लील और अमर्यादित नारे लगाए गए, जो आपत्तिजनक तख्तियां लहराई गईं और जो गालियां दी गईं, दोहे के रूप में जो गालियां दी गईं, उसके एल्गोरिद्म पर ध्यान देना आवश्यक है। इस आक्रामक अग्रिम दस्ते की कमान लड़कियों ने संभाल रखी थी। जब लड़कियां अश्लील नारे लगा रही थीं, भद्दी-भद्दी गालियां दे रही थीं, तब पुरुष प्रदर्शनकारी पीछे खड़े होकर या तो कैमरे से इन्हें रिकॉर्ड कर रहे थे या पृष्ठभूमि में नारे लगा रहे थे। क्या यह उनकी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था? एक ऐसी रणनीति, जिसमें विशेष रूप से युवा लड़कियों को आगे करके उनसे शर्मनाक गालियां दिलवाई गईं?
यह वही जाना-पहचाना पैटर्न है, जिसमें जन-आंदोलनों के दौरान महिलाओं और लड़कियों को ‘मानवीय ढाल’ की तरह इस्तेमाल करने की रणनीति अपनाई जाती है। जब विरोध के अग्रिम मोर्चे पर महिलाओं का इस्तेमाल किया जाए, बेशक वह अश्लीलता से भरा क्यों न हो, तो कानून प्रवर्तन एजेंसियों (सुरक्षा बलों) के लिए कार्रवाई करना नैतिक और रणनीतिक रूप से कठिन और जटिल हो जाता है। यह चुप्पी लापरवाही नहीं थी; यह अमर्यादित भाषा को मौन स्वीकृति देकर आक्रामक माहौल तैयार करने का एक सुचिंतित उपक्रम था।
तैयार की जाती रही भूमिका
जब आप संविधान निर्देशित दायित्वों को नजरअंदाज करते हैं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग करते समय यह भूल जाते हैं कि आपका अधिकार किसी और के अधिकारों को कुचलकर सुनिश्चित नहीं होता तो आप उसी संविधान के अंतर्गत विभिन्न कानूनों के उल्लंघन के दोषी होते हैं। तब आपके ऊपर उचित कार्रवाई करने का काम संवैधानिक संस्थाओं का होता है। और जब तक इन संस्थाओं की शुचिता पर धब्बा न लगाया जाए, जब तक इनकी विश्वसनीयता को लेकर संदेह का माहौल न बनाया जाए, तब तक इस देश में अराजकता नहीं फैलाई जा सकती। और जब तक अराजकता को हथियार बनाकर लोकतंत्र को भीड़तंत्र में न बदला जाए, तब तक उन लक्ष्यों को पाना मुश्किल है जो विधि-सम्मत लोकतांत्रिक तरीके से हासिल नहीं किए जा सके। यह एक संभावित कारण है कि संवैधानिक संस्थाओं के विरुद्ध सुनियोजित तरीके से अभियान चलाए जाते रहे हैं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि जिन लोगों ने पहले राज किया, उन्हें इन संस्थाओं के ‘इस्तेमाल’ की कुंजी का पता था, जिस कारण जब-तब उन्हें लगता है कि ये संस्थाएं बिकी हुई हैं।
इसलिए संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाना कई दलों-जमातों को रास आता है, लेकिन इसका सबसे खतरनाक आयाम यह है कि जब इस देश की जनता को अराजकता का आधार बनाकर अपने राजनीतिक हितों को पूरा करने वाले औजार की तरह इस्तेमाल किया जाए तो इन संवैधानिक संस्थाओं के किसी भी उपचारात्मक कदम की जन स्वीकार्यता न हो। इसी क्रम में जेएनयू में नारे लगते हैं- “अफजल हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा हैं”। यह सीधे-सीधे न्यायपालिका को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास था और यही विचारधारा शरजील इमाम के रूप में भी सिर उठाती है, जब वह चिकन नेक काटने का आह्वान करता है। जब-जब छात्रों के असंतोष को ईंधन बनाया जाता है, तब-तब वही विखंडनकारी नैरेटिव नए रूपों में सामने आ जाता है। वरना सोचिए, नीट आंदोलन में इस तरह के नारों का क्या काम है- ‘अनुच्छेद 370 बहाल करो’, ‘कश्मीर में फौजी दमन बंद करो’, ‘कश्मीर की आजादी तक जंग रहेगी-जंग रहेगी’, ‘छीनो-छीनो आजादी, राज व्यवस्था से आजादी।’
यह सही है कि शीर्ष संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति के एक-एक वाक्य, एक-एक शब्द का महत्व होता है और उसे यह देखना चाहिए कि उसकी बातों का गलत संदेश न जाए, लेकिन भारत के मुख्य न्यायाधीश ने ऐसा क्या गलत कह दिया? 15 मई 2026 को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने एक मामले की सुनवाई के दौरान नकली लॉ डिर्गीधारियों को ‘कॉकरोच’ कह दिया। इसमें गलत क्या था? क्या कोई इससे इनकार कर सकता है कि अदालती व्यवस्था में ऐसे लोगों की भरमार है, जिनके पास वकालत करने के लिए जरूरी डिग्री तो है, लेकिन इसे पाने के तरीके अनुचित थे? लेकिन इससे दूर अमेरिका में अभिजीत दीपके को बहाना मिल जाता है और इसके लिए सूचना उद्योग के सबसे खतरनाक और स्व-आरोपित निषिद्ध आचरण का सहारा लिया जाता है-पूरे संदर्भ से काटकर किसी वाक्यांश का औजार की तरह इस्तेमाल करना।
आम आदमी पार्टी का डिजिटल कैंपेन संभाल चुके दीपके को वे सारे गुर पता थे जिनसे सोशल मीडिया के जरिये किसी अभियान को खड़ा किया जाता है। वह ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के साथ भारत लौटते हैं और अचानक देश भर में ऐसा भड़काऊ आंदोलन खड़ा करते हैं जो सरकार को घुटने पर ला देता है। उसके साथ आ खड़े होते हैं सौरभ दास जिन्होंने उमर खालिद को जेल भेजे जाने के मामले में 30 दिसम्बर 2025 को ट्वीट किया था ‘परमानेंट ब्लाट ऑन इंडियन ज्यूडीशियरी’। उनके दूसरे साथी हैं आम आदमी पार्टी के सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप संभालने वाले आशुतोष। यह आंदोलन इसलिए सफल हो जाता है, क्योंकि इसकी जड़ में जो समस्या थी, वह काल्पनिक नहीं थी, उसे युवा पीढ़ी अनुभव कर रही थी और उसके अंदर एक ज्वार उफन रहा था। शिक्षा तंत्र में मौजूद समस्याओं और दोषों के कारण सुलगता रोष, नैराश्य और घुटन विस्फोटक बन चुका था।
ऐसे में यह बात सोचने को मजबूर करती है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी को लेकर दीपके की यह मुहिम कहीं संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को संदिग्ध बनाने की सुनियोजित रणनीति का ही हिस्सा तो नहीं थी? यहां एक और बात पर ध्यान देना आवश्यक है- सौरभ दास ऐलान करते हैं कि सु्प्रीम कोर्ट कुछ भी कहे, सरकार ने उनसे वादा किया है कि सभी आंदोलनकारियों के विरुद्ध दायर एफआईआर वापस की जाएगी। इससे जुड़े दो प्रश्न हैं- संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने वाले और संविधान की कसमें खाने वाले खुद ही संविधान-विरोधी मांग कर रहे हैं? यानी, वे संविधान का उल्लंघन करें, तो क्षम्य? और दूसरा, इस आंदोलन में जो वैसे लोग शामिल हुए जिनके खिलाफ पहले से मामले दर्ज थे, उन्हें भी क्या इस छूट का लाभ मिलना चाहिए? ‘कॉकरोचों’ की मंशा अगर इतनी ही अच्छी थी तो क्या उन्हें यह भी नहीं कहना चाहिए था कि अगर इस आंदोलन को किन्हीं आतंकवादी लक्ष्यों के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की गई है, तो हम उनके साथ किसी भी रहम का समर्थन नहीं करेंगे?
भटकाव प्रायोजित तो नहीं!
आम जनता और विश्लेषकों के बीच यह धारणा उभर रही है कि नीट परीक्षा में हुई धांधली के विरोध में शुरू हुआ यह आंदोलन ‘भटक गया’, क्योंकि इसमें बाद में अलग-अलग स्वार्थ वाले गुट, राजनीतिक दल शामिल होने लगे।
सीजेपी का मंच कुणाल कामरा जैसे व्यक्ति को खुली छूट देता नजर आया जो सरकार पर तंज कसता है, ‘ये लोग सीता के पति का नाम लेकर नीता के पति का काम करते रहते हैं’। वहां खड़े युवाओं ने इस पर ठहाके लगाए। यहां सबसे बड़ा सवाल है कि शिक्षा के आंदोलन की कथित पुरोधा बनी यह जमात क्या वाकई शिक्षा के लिए प्रदर्शन कर रही थी? ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की कार्यकर्ता नेहा बोरा पर भी गौर करने की जरूरत है।
देश के लोगों को सोचना होगा कि सीजेपी मंच पर नीट-यूजी 2026 परीक्षा रद्द होने के कारण उपजे तनाव से आत्महत्या करने वालों की तस्वीरों और घायल प्रदर्शनकारी को मंच पर ‘डिस्प्ले’ की तरह इस्तेमाल करने वाली नेहा बोरा पुलिस को बर्बर बताती हुई बुलंद आवाज में सरकार को ‘हिसाब देना होगा’ कहकर खूब तालियां बटोरती है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद जमकर पार्टी और डांस करती है। दिलचस्प बात यह है कि जहां वह डांस कर रही है वहां पीछे दीवार पर सीपीआई का निशान साफ नजर आता है।
मंच से अचानक परीक्षा की पारदर्शिता का मुद्दा पीछे छूट गया। राज्य व्यवस्था, प्रशासनिक ढांचे और सामाजिक व्यवस्था पर आक्रामक हमले होने लगे। प्रश्न यह उठता है कि क्या यह भटकाव सहज था? या फिर यह भी सुनियोजित और बहुस्तरीय रणनीति का हिस्सा था? वर्ना इस आंदोलन का कश्मीर से अनुच्छेद-370 से क्या रिश्ता? इसका एसआईआर से क्या मतलब? एफसीआरए बिल से क्या मतलब? मतलब है और गहरा मतलब है। यह एक इको सिस्टम है जो लगातार उस चक्रव्यूह के घेरों को मजबूत करने का प्रयास कर रहा है जिसके बूते भाजपा की सरकार को सत्ता से हटाया जा सके। इसीलिए इसे सत्ता विरोधी हर तरह की आवाज का मंच बनने दिया गया। यह अनायास नहीं था और बेशक इस आंदोलन का तात्कालिक कारण नीट परीक्षा के प्रश्नपत्र का लीक होना था, लेकिन लक्ष्य तो कुछ और था।
अगर हम आज भी एक संगठित अराजकता को ‘छात्रों का निर्दोष असंतोष प्रदर्शन’ समझकर आंखें मूंद कर बैठे रहे, तो एक खतरनाक कल हमारा इंतजार करता मिलेगा।
https://panchjanya.com/2026/08/02/484216/analysis/empty-in-the-name-of-thoughts-only-curses-on-the-lips/
















